बिजनेस स्टैंडर्ड - किराये के मकान भी समस्या का समाधान
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किराये के मकान भी समस्या का समाधान

सुरेंद्र हीरानंदानी /  April 30, 2018

देश में आवास की कमी की समस्या को हल करने की हर कोशिश परिसंपत्ति खरीद तक सीमित है। किराये के मकान की दिशा में कुछ खास प्रगति नहीं हो सकी है। बता रहे हैं सुरेंद्र हीरानंदानी 

 
बीते कुछ वर्षों में वृद्घि और शहरीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है। यही वजह है कि शहरी आबादी भी बहुत तेजी से बढ़ी है। बहरहाल, तमाम विनिर्माण और बुनियादी विकास के बावजूद देश के शहरी इलाकों में आवास की समस्या बनी हुई है। तेजी से बढ़ती आबादी के समक्ष आवास का संकट है। इस समस्या को हल करने के लिए सरकार ने 2022 तक सबको आवास देने का लक्ष्य तय किया है। इसके बावजूद दुख की बात है कि हालात आज भी बुरे हैं। वर्ष 2016 से अब तक 36 लाख शहरी और 60 लाख ग्रामीण आवासों को मंजूरी दी गई थी जिनमें से केवल 3 लाख शहरी और 16 लाख ग्रामीण आवास ही बन सके हैं। 
 
अचल संपत्ति की खरीदारी के बारे में काफी कुछ कहा गया है लेकिन किराये के मकानों की दिशा में सोच अभी आगे नहीं बढ़ सकी है। आंकड़ों के मुताबिक करीब 40 करोड़ शहरी निवासी शहरी बस्तियों में रहते हैं और लाखों अन्य अपने कस्बों से शहरों का रुख करते हैं। ऐसे में उपनगरीय इलाकों में घनी आबादी देखने को मिलती है। देश आगे बढ़ रहा है और हमें इस समस्या का हल तलाश करना ही होगा।  सस्ते आवास के लिए निजी सार्वजनिक भागीदारी का मॉडल आकर्षक निजी पूंजी और सस्ती जमीन उपलब्ध कराने पर निर्भर है लेकिन इसमें भी शहरी गरीबों, युवाओं और स्वरोजगार वाले लोगों का ध्यान नहीं रखा जाता है। ये वे लोग हैं जो महंगा होने के कारण अपना मकान नहीं बना पाते। दरअसल वे ऋण हासिल करने की अहर्ता नहीं रखते। 
 
इसके अलवा लाखों लोग अपने कार्यस्थल के आसपास रहना सही समझते हैं ताकि समय की बचत हो सके। इसके अलावा शहरों में बढिय़ा जगह पर मकान और काम की जरूरत के मुताबिक जगह पर मकान मिलना भी आसान नहीं है।  यहां पर मूलभूत सुविधाओं वाले किराये के मकानों की बहुत अहम भूमिका हो सकती है। परंतु भारतीय संदर्भ में देखें तो विरोधाभास यह है कि लाखों लोगों को मकान की तलाश होने के बावजूद काफी ऐसे मकान हैं जो खाली पड़े हैं। अगर इन मकानों का समुचित इस्तेमाल किया जाए तो आवासीय दबाव कम हो जाएगा। 
 
किराये के मकान इसलिए भी बेहतर हैं क्योंकि असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों की आय की अस्थिरता और कम आय वर्ग के लोगों के जोखिम के प्रोफाइल को देखते हुए यह काफी अहम साबित हो सकता है। मकान का मालिकाना होने पर मासिक किस्त चुकानी होती है जो बाजार जोखिम के अधीन होती है। देश के अचल संपत्ति क्षेत्र में हाल के दिनों में कई नवाचारी सुधार अपनाए गए हैं। पहले काले धन के खिलाफ नोटबंदी हुई, उसके बाद रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा) का आगमन हुआ और फिर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था लागू हुई। इन सबने इस क्षेत्र की जवाबदेही और पारदर्शिता में इजाफा किया। बाजार ने इन सुधारों को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। आवासीय बाजारों को निस्संदेह इससे लाभ हुआ है और किराये के मकान भी पीछे नहीं रहे। 
 
नए किराया सुधार के बाद वेतनभोगी कर्मचारियों द्वारा लगाई जाने वाली फर्जी रसीद को आसानी से पकड़ा जा सकता है जिसका इस्तेमाल वे कर रियायत हासिल करने के लिए करते आ रहे थे। नए नियमों में इसके लिए लाइसेंस समझौते, बिजली, पानी बिल और तमाम अन्य चीजों को लगाना जरूरी कर दिया गया है। जिन मकान मालिकों को किराये से बड़ी राशि मिल रही है उनको कर रिटर्न में किराये से होने वाली पूरी आय का ब्योरा देना होता है। तभी वे टीडीएस का फायदा ले सकते हैं।  इसके बावजूद कई ऐसी बातें हैं जो किराया क्षेत्र के विकास को बाधित कर रही हैं। सबसे पहले तो किराया नियंत्रण के लिए बनाए गए कई अधिनियमों ने मकान मालिकों को अपना मकान किराये पर देने से रोक रखा था क्योंकि किराये को स्थिर किया जा सकता था और किरायेदार को मकान से निकालना मुश्किल हो जाता था। इन बातों के चलते मकान मालिकों को अपनी परिसंपत्तियों का रखरखाव करना अव्यवहार्य लगता है और वे यूं ही कमजोर पडऩे लगती हैं। 
 
दूसरी बात, कम किराया भी मकान मालिकों को हतोत्साहित करता है। उन्हें इतनी कम राशि के लिए मकान किराये पर उठाने जैसा जोखिम लेना सही नहीं लगता। उदाहरण के लिए अधिकांश बड़े शहरों में किराये में तीन से पांच फीसदी ही बढ़ोतरी होती है जो दुनिया में सबसे कम बढ़ोतरियों में शामिल है। यह बढ़ोतरी तो जोखिम रहित बाजार आधारित योजनाओं तक से कम है। सरकार को एक ऐसा माहौल तैयार करना चाहिए जहां खाली पड़े मकानों को किराये के प्लेटफॉर्म में बदला जा सके।  इस मामले में किराया प्रबंधन कंपनियां मददगार साबित हो सकती हैं। वे मकान मालिकों की जगह इन मकानों का पेशेवर ढंग से प्रबंधन कर सकते हैं। 
 
मकान खरीदने पर जो कर राहत मिलती है वह मकान से आने वाले किराये पर हासिल नहीं होती। इस बात ने भी इस क्षेत्र पर नकारात्मक असर डाला है। देश के कई राज्यों में किराया कानून ऐसे हैं कि किरायेदार के मकान पर काबिज हो जाने का जोखिम बढ़ जाता है। ऐसे में मकान मालिकों को उचित ही यह आशंका होती है कि किरायेदार मकान खाली नहीं करेगा या अपनी मर्जी के मुताबिक लंबे समय तक मकान पर काबिज रहेगा।  सरकार ने इस समस्या से निपटने का मन बना लिया है लेकिन अभी भी लंबा सफर तय करना है। राष्ट्रीय शहरी किराया आवासीय नीति का लक्ष्य शहरी क्षेत्रों में आवास की कमी को दूर करने के लिए खाली पड़े मकानों को किराये पर देने को प्रोत्साहित करना है। आवासीय अचल संपत्ति निवेश न्यास इन खाली पड़े मकानों का इस्तेमाल भी सुनिश्चित कर सकते हैं। विकसित देशों में यह सफलतापूर्वक हो चुका है। वहां ये न्यास परिसंपत्ति खरीदते हैं और फिर उसे किराये पर देते हैं। इस तरह निवेशकों का मूल्यवर्धन होता है और किराया भी मिलता है। 
 
केंद्र सरकार अब राष्ट्रीय शहरी किराया आवासीय नीति के तहत 'किराये से मालिकाना' योजना शुरू करने की योजना बना रही है। इसके तहत लोगों को सरकारी संस्थानों से मकान किराये पर लेने का अवसर दिया जाएगा। इस योजना के तहत लोगों के पास यह विकल्प होगा कि वे आसान किस्तों में पूरी कीमत चुकाकर उस आवास को अपने नाम करवा सकें। यह बात सराहनीय है कि सरकार ने इस क्षेत्र में ऐसी नीतियों के साथ इस क्षेत्र को जरूरी गति देने का प्रयास किया है। इसकी मदद से हम देश में किराये के मकानों के संभावनाशील क्षेत्र का पूरा इस्तेमाल कर सकते हैं। 
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