बिजनेस स्टैंडर्ड - दिवालिया संहिता में और ज्यादा सुधार की दरकार
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दिवालिया संहिता में और ज्यादा सुधार की दरकार

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  04 29, 2018

दिवालिया प्रक्रिया का दौर जारी है। चाहे कारोबारी अखबारों के शुरुआती पन्ने हों या कंपनी लॉ पंचाट, अपीली पंचाट और सर्वोच्च न्यायालय में इन मामलों की सुनवाई कर रहे पीठों की विषय सूची, हर जगह ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता, 2016 सुर्खियों में नजर आ रही है।  करीब दो साल पुराने हो चुके इस कानून में सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों से लगातार परिपक्वता आ रही है। अदालत के स्पष्टïीकरण तमाम कमियों को दूर कर रहे हैं और उस अनिश्चितता को कम कर रहे हैं जो इस व्यवस्था को लेकर उठते रहे हैं। निस्तारण योजना के प्रयास कुछ अरसे में समाप्त हो जाएंगे और फिर जो संस्थान निस्तारण नहीं कर पाएंगे उनके नकदीकरण की अपरिहार्य प्रक्रिया की शुरुआत होगी। 

 
अब वक्त है कि हम इस बात की समीक्षा करें कि इस कानून का प्रदर्शन कैसा रहा है और इसकी कमियों को दूर करने के लिए क्या कुछ करना होगा। भारतीय ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया बोर्ड (आईबीबीआई) ने दिवालिया पेशेवरों की एक पेशेवर श्रेणी तैयार करने का काम किया है। अभी बड़े सवाल उन विधिक मानकों को लेकर हैं जिनका पालन इन पेशेवरों को करना चाहिए। खासतौर पर उनको जो दिवालिया कंपनियों के बोर्ड निदेशकों के अधिकार अपने पास लेते हैं। इनकी कानूनी जवाबदेहियों और उत्तरदायित्वों के बारे में कुछ भी स्पष्टï नहीं किया गया है। इस समस्या को हल किया जाना चाहिए। 
 
पहली बात, मान लेते हैं कि एक दिवालिया पेशेवर ऐसी कंपनी चला रहा है जिसका ताल्लुक नुकसानदेह पदार्थ (यूनियन कार्बाइड के समान) से है और वहां कोई भीषण पर्यावरण संबंधी त्रासदी हुई हो। क्या भंग किया गया निदेशक मंडल जवाबदेह होगा या दिवालिया पेशेवर को इसके लिए जवाबदेह माना जाएगा? क्या ऐसी कंपनी के बीमा कवरेज के प्रावधान अभियोग को रोक कर दिवालियापन से बकाये की वसूली की अभियोग प्रक्रिया को रोका जा सकेगा? इन सवालों का कोई जवाब नहीं है और इस मामले में न्यायाधीश द्वारा बनाए गए कानूनों की प्रतीक्षा करनी होगी।
 
दूसरी बात एक दिवालिया कंपनी के बकाया निस्तारण प्रक्रिया को खंगालने में दिवालिया पेशेवर के अपने रुख की बात करते हैं। अंशधारकों, ऋणदाताओं और हिस्सेदारों के प्रति उसका क्या कर्तव्य है? क्या ऐसे निर्णयों को अंजाम दिया जाना चाहिए जो उपेक्षापूर्ण, लापरवाही भरे या खराब नजर आते हैं? क्या कंपनी के खिलाफ ऋण स्थगन से निस्तारण पेशेवर को संरक्षण मिलना चाहिए जबकि गलत व्यवहार के प्रमाण मौजूद हों? निस्तारण के आवेदन के आकलन की वस्तुपरकता अभी भी काफी ऊंची है। निस्तारण आवेदकों के बीच विवादों के सामान्य और स्पष्टï निस्तारण की स्थिति अभी नहीं है जहां ऑनलाइन नीलामी जैसे काम कुछ घंटे में पूरे किए जा सकें। निर्णय लेने संबंधी निस्तारण पेशेवर की जवाबदेही का मुद्दा अब तक सुलझा नहीं है। यह कहना पर्याप्त नहीं है कि आईबीबीआई उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई कर सकता है। 
 
तीसरा, सभी कानून नेकनीयती के अनुमान के आधार पर बनाए गए हैं। कर्ज देने वालों के कदमों में नेकनीयती का अनुमान तो और भी ज्यादा है। अब अगर वह विश्वास भंग हो रहा है तो क्या साहूकारों का अंशधारकों के प्रति कर्तव्य बनता है कि वे उनके आचरण का आकलन करें? कर्ज देने वालों की समिति आसानी से निर्णय प्रक्रिया और अधिकार हासिल कर सकते हैं। उदाहरण के लिए एक तकनीकी दिवालिया प्रक्रिया में जहां मामला दिवालिया से अधिक नकदीकरण का हो, और जहां वित्तीय ऋणदाता रिकवरी की अपनी पात्रता में कटौती न चाहे वहां क्या निस्तारण विलय एवं अधिग्रहण लेनदेन का रूप नहीं ले लेगा? बीते एक दशक में दुनिया भर में बैंकरों को कोई बहुत ख्याति नहीं हासिल हुई है। ऐसे में उनकी ओर से सद्भाव का अनुमान भी उपयुक्त जांच परख की मांग करता है। 
 
चौथी बात, दिवालिया प्रक्रिया को कलंकित करना इस कानून की आगे की राह की सबसे बड़ी चुनौती है। दुनिया में किसी भी जगह किसी भी तरह की नाकामी के शिकार हुए लोगों की भागीदारी पर रोक लगाना इस कानून को एक बड़ा झटका है। सरकार गत वर्ष के आखिर में हड़बड़ी में बिना गहराई से सोचे विचारे अध्यादेश लाई और इस वर्ष के आरंभ में बिना किसी खास बहस के उसे कानून में तब्दील कर दिया गया। कारोबारी दिवालियापन के इतिहास वाले किसी व्यक्ति को कलंकित करना अब अधिकांश कानूनी कदमों के केंद्र में है। इस बारे में हम पहले लिख चुके हैं इसलिए इस पर अधिक चर्चा नहीं करेंगे। यह चुनावी साल है इसलिए इस कानून को पलटने के बारे में तो विचार भी नहीं किया जा सकता है। समाज का माहौल ऐसा है कि राजनेता ऐसे किसी कदम के बारे में सोच भी नहीं सकते जो ऋण डिफॉल्ट करने वालों की मदद के रूप में देखा जाए। 
 
आखिर में, इन मामलों को देखने वाली पंचाटों का बुनियादी ढांचा भी दबाव में है। पंचाटों के सदस्य देर-देर तक काम कर रहे हैं और उन्हें गुणवत्तापूर्ण निर्णयों के बजाय मामलों के निस्तारण पर ध्यान देना पड़ रहा है। इकलौती उम्मीद की किरण यह है कि मामले नियमित अदालतों के बजाय पंचाटों के जरिये निपटाए जा रहे हैं। अब मामले सर्वोच्च न्यायालय तक काफी जल्दी पहुंच रहे हैं।  केंद्रीय जांच एजेंसियां तत्पर हैं कि उनको पेशकदमी का अवसर मिले। दिवालिया पेशेवरों को लोक सेवक मानने का दबाव बढ़ रहा है। अगर निजी क्षेत्र के किसी बैंक में जहां बहुलांश हिस्सेदारी विदेशी भागीदार के पास हो तो ऐसा मामला आसानी से केंद्रीय जांच एजेंसी के दायरे में आ सकता है। ऐसे मामलों में वे आसानी से सफलता हासिल कर सकते हैं। अब वक्त आ गया है कि अगले पांच वर्ष इस कानून पर गंभीरता से मनन किया जाए। हालांकि इस कानून में संशोधन संबंधी समिति ने अभी हाल ही में अपनी अनुशंसा दी है। 
Keyword: insolvency, defaulter, NCLT,
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