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न्यायपालिका के समक्ष फैसले की घड़ी

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  04 29, 2018

न्यायाधीशों के बीच आपस में ही बहस छिड़ी हुई है और इस संस्थान में आम जनता का भरोसा कम हुआ है। यह सारा कुछ अत्यंत नाटकीय प्रतीत होता है। मैं इन बातों को और स्पष्ट करना चाहता हूं। एक आम नागरिक को अगर सरकार की ओर से अधिकार हासिल नहीं होते हैं तो वह न्यायालय की शरण में नहीं जाएगा तो कहां जाएगा? जब उसे यह नजर आता है कि देश की शीर्ष अदालत को भी उसी सरकार से संरक्षण चाहिए तब उसके आत्मविश्वास को कितनी चोट पहुंचती है? बहरहाल पिछले सप्ताह सरकार ने देश के प्रधान न्यायाधीश के बचाव में कदम उठाया। इस दौरान उसका पवित्रताबोध और नाराजगी दोनों मुखर थे।

 
ऐसे में अगर आपको सरकार की भूमिका में यह बदलाव अपर्याप्त लगता है तो बीते सप्ताह कानून मंत्री ने प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखकर लंबे समय से लंबित सर्वोच्च न्यायालय की दो नियुक्तियों में से एक को मंजूरी दी और दूसरी को पुनर्विचार के लिए लौटा दिया। सरकार का यह कहना कि केरल से बहुत अधिक न्यायाधीश हैं या वरिष्ठता का मसला आदि बातें, विश्वास करने लायक नहीं हैं। सरकार न्यायपालिका को केवल यह याद दिला रही है कि स्पष्ट बहुमत के साथ वह जो चाहेगी वही होगा।
 
प्रभावी तौर पर देखा जाए तो राजनेता जानते हैं कि न्यायाधीशों के पास राजनीतिक पूंजी शेष नहीं है और उन्होंने कुछ उचित नैतिक जगह भी खाली की है। राजनेता उस पर काबिज होना चाहते हैं। बात केवल सत्ताधारी दल तक सीमित नहीं है। यह न्यायपालिका की खस्ता हालत ही है जिसने लोकसभा में 10 फीसदी सांसदों वाले दल को यह साहस दिया कि वह विचारहीन और बेतुके ढंग से महाभियोग प्रस्ताव लाने की कोशिश करे। प्रस्ताव से कोई राजनीतिक हित भी नहीं सध रहा था। इसने केवल सर्वोच्च न्यायालय को कमजोर किया, खासतौर पर प्रधान न्यायाधीश को। इस मोड़ पर जब उनको कुछ सवालों के जवाब देने थे, उन्हें सरकार की मदद और बचाव की दरकार थी। भाजपा और कांग्रेस एक दूसरे की चाहे जितनी मुखालफत करें लेकिन न्यायपालिका को उसकी जगह दिखाने के मामले में दोनों एकमत हैं। याद कीजिए कि इस बिखरी हुई संसद ने एक कानून लगभग सर्वसम्मति से और जबरदस्त गति से बनाया था। वह था उच्च न्यायपालिका द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति के अधिकार को सीमित करना और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के जरिये उन्हें जवाबदेह बनाना।
 
हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने भी उतनी ही सक्रियता दिखाते हुए इसे असंवैधानिक ठहराया और खारिज कर दिया। सत्ताधारी वर्ग झुंझला कर रह गया। अब एक दूसरे से लड़ते हुए भी राजनीतिक दल साझा शत्रु न्यायपालिका के खिलाफ एकजुट हैं। याद रहे कि पांच न्यायाधीशों के पीठ ने 4-1 से आयोग को खारिज करते हुए कहा कि न्यायपालिका को कार्यपालिका के अधीन नहीं किया जा सकता है। अब सरकार यही काम बिना आयोग के करने जा रही है। 
 
कॉलेजियम के ही चार सदस्यों ने प्रधान न्यायाधीश पर सवाल उठाए, लोया मामले और मेडिकल कॉलेजों से जुड़े फैसले को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं और ऐसे अधिवक्ताओं ने उनकी आलोचना की, कांग्रेस ने उन पर महाभियोग लाने की धमकी दी और भाजपा सरकार ने उन्हें बचाया। जाहिर है वह रक्षात्मक मुद्रा में हैं। क्या उनसे अपेक्षा की जाए कि वह इस गड़बड़ी से बाहर निकलने का संघर्ष करेंगे? वह भी तब जबकि वह अपने असहमत न्यायाधीश बंधुओं के साथ संवाद में नहीं नजर आते?
 
राजनेता न्यायपालिका की नई कमजोरी की पड़ताल कर रहे हैं। कॉलेजियम द्वारा मंजूर की गई नियुक्तियों में देरी अब आम हो चुकी है। एक मामले में तो सरकार ने कॉलेजियम द्वारा उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश की तय कार्यावधि को ही बदल दिया। अब उसने न्यायमूर्ति के एम जोसेफ की नियुक्ति को पुनर्विचार के लिए लौटा दिया है। अगर इस बार भी कॉलेजियम चुप रहता है या कोई ठोस रुख नहीं अपनाता तो सरकार अगला कदम भी उठाएगी। वह कदम क्या होगा इस बारे में केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। परंतु अगर सर्वोच्च न्यायालय यूंही झुकता रहा तो सरकार आगे चलकर वरिष्ठता के सिद्धांत को भी नकार सकती है और तब शायद वरिष्ठतम न्यायाधीश रंजन गोगोई अगले प्रधान न्यायाधीश न बन सकें।
 
सरकार का यह सोचना सही है कि न्यायपालिका जनता की सहानुभूति काफी हद तक गंवा चुकी है। तमाम लंबित मामलों के बीच जनहित याचिकाओं के जरिये सुर्खियां बटोरने का उसका रुख सबके जेहन में है। एनजेएसी को जिस तत्परता से खारिज किया गया उससे यही छवि बनी कि न्यायाधीश अपने हितों की रक्षा को लेकर सजग हैं।
 
अगर प्रधान न्यायाधीश लोया मामले पर दिए गए फैसले के आलोचकों के खिलाफ कार्रवाई से संबंधित जनहित याचिका पर पेशकदमी करेंगे तो यह धारणा और मजबूत होगी। एक बार फिर लगेगा कि न्यायपालिका अपने लिए लड़ रही है। इन बातों ने न्यायपालिका के देश के लोगों के साथ रिश्तों को गहरे तक प्रभावित किया है। अब वक्त आ गया है न्यायाधीश और विधिक क्षेत्र के अन्य विज्ञ जन खुद को बचाने के बजाय इस संस्थान को बचाने के लिए सामने आएं। 
 
न्यायपालिका के मौजूदा संकट के लिए अगर कोई रूपक तलाश करें तो मुझे स्वतंत्रता आंदोलन का शुरुआती दौर याद आता है। सन 1906-07 में ब्रिटिशों ने उपनिवेश अधिनियम पेश किया जिसने उन्हें लोगों की भूसंपत्ति पर असीमित अधिकार दे दिए। इस अधिनियम के एक प्रावधान ने उन्हें किसी भी ऐसे किसान की जमीन पर कब्जा करने का अधिकार दे दिया जो बिना वारिस के मर गया हो। लाला लाजपत राय और भगत सिंह के चाचा अजित सिंह ने इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया। इस विरोध प्रदर्शन में गाया जाने वाला गीत लायलपुर (अब फैसलाबाद) के बांके दयाल ने लिखा था: पगड़ी संभाल जट्टा, पगड़ी संभाल ओये / तेरा लुट न जाए माल जट्टा।  उसे इतिहास में पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन कह कर पुकारा गया। लाला लाजपत राय और अजित सिंह को मांडले भेज दिया गया परंतु ये पंक्तियां भगत सिंह से जुड़ गईं और बाद की कई पीढिय़ां उसे भगत सिंह से जोड़कर ही देखती आई हैं।
 
मैं बेहद दायित्व के साथ और खूब सोच विचार कर लिख रहा हूं कि यह भारतीय न्यायपालिका के लिए अपनी पगड़ी संभालने का वक्त है। इंदिरा गांधी के सन 1973 के दौर के बाद यह न्यायपालिका के लिए सबसे अधिक जोखिम वाला वक्त है। दो दशक से भी पहले कॉलेजियम जैसी ठोस व्यवस्था बनाकर न्यायपालिका को लगा होगा कि उसने खुद को सुरक्षित कर लिया है। परंतु बीच के वर्षों में उसने काफी गलतियां करके खुद को इतना कमजोर बना लिया। खराब नियुक्तियां, सुधारों में देरी, देरी को लेकर बढ़ती नाराजगी को संबोधित न कर पाना और न्यायाधीशों की सुर्खियां बटोरने की प्रवृत्ति ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं। हमने इन तमाम मुद्दों पर न्यायाधीशों की आलोचना की है।
 
परंतु यह ऐसा वक्त नहीं है कि हम उन्हीं बातों को दोहराएं। अगर न्यायपालिका अपनी लड़ाई हार जाती है तो इससे बहुत अधिक नुकसान होगा और देश के तमाम नागरिक पराजित होंगे। प्रधान न्यायाधीश को पसंद हो या नहीं लेकिन अब वह ऐसी स्थिति में फंस गए हैं जहां उन्हें सर्वोच्च न्यायालय और कॉलेजियम व्यवस्था के लिए लड़ाई लडऩी होगी। एक विचार यह भी हो सकता है कि वे खुद के लिए लडऩे और अपने संस्थान के लिए लडऩे के बीच चयन करें। हालांकि मैं इस पर किसी तरह की बहस करने से बचना चाहूंगा। जहां तक उनके अन्य न्यायाधीश बंधुओं की बात है तो सन 1973 से 1977 तक की बातों का स्मरण ही पर्याप्त होगा। इंदिरा गांधी की वजह से जिस न्यायाधीश को लाभ पहुंचा उसे कोई नहीं जानता लेकिन जिनको नुकसान पहुंचा और जिन्होंने विरोध स्वरूप इस्तीफा दिया वे भारतीय न्यायपालिका के चमकते सितारों में शामिल हुए। आज के कुछ न्यायाधीशों को भी उस परीक्षा से गुजरना पड़ सकता है। 
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