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व्यापक नीतिगत नजरिये के साथ काम करे सूचना प्रसारण मंत्रालय

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  April 27, 2018

हाल के दिनों में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक के बाद एक कई घोषणाएं की हैं। उनमें से कुछ प्रमुख घोषणाएं इस प्रकार हैं।  वह आपके डीटीएच बॉक्स में चिप लगाना चाहता है ताकि जान सके कि आप क्या देखते हैं? वह चाहता है कि ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) इस आकलन के लिए किसी चैनल के लैंडिंग पेज का इस्तेमाल बंद कर दे। मीडिया में आई खबरों की मानें तो बार्क की अंशधारिता को लेकर इस पर सवाल उठे जो कि लाजिमी है। मंत्रालय ने फेक न्यूज (फर्जी खबरें) रोकने के लिए दोषी पाए जाने वाले पत्रकारों की अधिमान्यता समाप्त करने की बात कही। वह ऑनलाइन सामग्री को नियंत्रित करना चाहता है। मंत्रालय चाहता है कि दूरदर्शन का नि:शुल्क डिश टीवी निजी चैनलों की सब्सिडी बंद करे।

 
इनमें से कुछ बातें मसलन फेक न्यूज से संबंधित घोषणा को वापस ले लिया गया। अन्य घोषणाओं को लेकर औद्योगिक संस्थाओं अथवा अन्य के साथ चर्चा चल रही है। इनके पक्ष और विपक्ष में कई दलील दी जा रही हैं।  सबसे अहम बात यह है कि इन कदमों का उद्देश्य 1,473 अरब रुपये के फलते-फूलते उद्योग का सूक्ष्म प्रबंधन करना है। आखिर वह बड़ी नीति कहां है जो देश के इस महत्त्वपूर्ण लेकिन सीमित मुद्रीकरण वाले मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र के लिए उत्प्रेरक का काम कर सके और उसे ऐसी क्षमता प्रदान कर सके कि वह जीडीपी के मौजूदा आधा फीसदी के स्तर से आगे बढ़ सके? 
 
टेलीविजन की बात करें तो संख्या के मामले में भारत दूसरा सबसे बड़ा बाजार है लेकिन यहां भी उतना मुद्रीकरण नहीं हुआ है जितना होना चाहिए था। किसी भी अन्य बाजार में मसलन अमेरिका, ब्रिटेन या यूरोप में केवल आकार का मतलब यह होगा कि सरकार रोजगार और कारोबार की कर उत्पादक क्षमताओं पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करेगी। वे इस बात पर तमाम अध्ययन कराते कि कैसे मंत्रालय बेहतर मुद्रीकरण की सुविधा प्रदान कर सकता है। भारत में 29.7 करोड़ घर हैं जिनमें से 18.3 करोड़ घरों में टीवी है। डेलॉयट द्वारा कराए गए एक हालिया अध्ययन के मुताबिक भारतीय टेलीविजन उद्योग से 5 लाख लोगों को सीधा रोजगार मिलता है जबकि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मिलाकर करीब 16.5 लाख लोगों को रोजगार मिलता है। इसका सकल उत्पादन या इस उद्योग के तमाम प्रतिभागियों का मिलाजुला राजस्व टेलीविजन उद्योग के 660 अरब रुपये के आकार से दोगुना है। 
 
अब जरा कल्पना कीजिए कि अगर ऐसे उद्योग को वृद्घि मुहैया कराने की नीति उपलब्ध हो तो इससे कितना अधिक लाभ पहुंचेगा। इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि ऐसी नीति के न होने का क्या अर्थ है। पिछले एक दशक में मंत्रालय ने दो बड़े निर्णय लिए। पहला केबल डिजिटलीकरण और दूसरा रेडियो स्पेक्ट्रम की नीलामी। पहले कदम के चलते टेलीविजन क्षेत्र में अरबों डॉलर की रकम आई और प्रसारक विज्ञापन राजस्व आधारित कार्यक्रमों की पकड़ से बाहर आए। परंतु डिजिटलीकरण की प्रक्रिया अभी भी पूरी नहीं हो सकी है।
 
क्या यह उचित है कि इतने बड़े टेलीविजन बाजार वाली सरकार इस बात को लेकर परेशान हो कि बार्क दर्शकों का आकलन कैसे करता है या डीटीएच बॉक्स पर चिप लगाई जाए या नहीं। गत वर्ष विज्ञापनदाताओं ने देश के करीब 800 टेलीविजन चैनलों पर विज्ञापन देने में 267 अरब रुपये खर्च किए। विज्ञापनदाता और प्रसारक दोनों ही डेटा के उपयोगकर्ता और सबस्क्राइबर दोनों हैं। साथ ही वे बार्क के सहमालिक भी हैं। बोर्डों और तकनीकी समितियों पर काबिज हैं और वे आसानी से मसलों को सुलझा सकते हैं। 
 
बीते चार महीने से अधिक वक्त से करीब 100 चैनल अपनी शुरुआत के लिए लाइसेंस की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अगर इन्हें इजाजत मिल जाए तो रेटिंग पर तवज्जो देने से कहीं ज्यादा सकारात्मक असर टेलीविजन उद्योग पर होगा।  एक अन्य उदाहरण हमारे सामने है। भारत में सबसे अधिक फिल्में बनती हैं। हमारा देश फिल्मों के चहेतों का देश है लेकिन राजस्व के मोर्चे पर हमारा बाजार कहीं छोटे बाजारों से भी पीछे है। वर्ष 2017 में देश के फिल्म उद्योग ने 156 अरब रुपये की जो आय हासिल की उसका तीन चौथाई हिस्सा बॉक्स ऑफिस से हासिल हुआ। इसके बावजूद देश में केवल 9,000 स्क्रीन हैं जबकि मल्टीप्लेक्स हर साल 150-200 नई स्क्रीन का इजाफा कर रहे हैं जबकि सिंगल स्क्रीन इससे दोगुनी गति से बंद हो रहे हैं। इसकी वजह से पिछले तीन वर्ष से बॉक्स ऑफिस एक जगह ठहरा हुआ है।
 
इन स्क्रीन के विस्तार में पैसे की कमी रुकावट नहीं है बल्कि इसके लिए नौकरशाही जवाबदेह है। एक नया थिएटर खोलने की इजाजत मिलने में छह महीने से दो वर्ष तक का समय लगता है। देश के तमाम हिस्सों में दर्जनों थिएटर तैयार हैं और लाइसेंस की प्रतीक्षा कर रहे हैं। स्क्रीन की तादाद में इजाफा वृद्घि का अहम कारक है। वर्ष 2011 में 9,000 स्क्रीन वाला चीन इस क्षेत्र में निवेश करके अब 50,000 स्क्रीन तक पहुंच गया है। इसी की बदौलत वह वर्ष 2017 में 7.9 अरब डॉलर के साथ दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बॉक्स ऑफिस बन गया। 
 
अगर मंत्रालय एक ऐसी नीति लाए जो शीघ्र थिएटर खोलने को बढ़ावा दे तो शायद अधिक बेहतर होगा। डेलॉयट की रिपोर्ट से आंकड़े लें तो फिल्में 2.5 लाख लोगों को सीधे रोजगार देती हैं और कुल मिलाकर करीब 7 लाख लोगों को। अगर ज्यादा थिएटर होंगे तो ज्यादा रोजगार मिलेंगे, ज्यादा कर आएगा और शायद ज्यादा वोट भी मिलेंगे। 
Keyword: DTH, chip, bark,,
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