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वित्त आयोग के विचारार्थ मुद्दों से जन्मा विवाद

रथिन रॉय /  April 27, 2018

वित्त आयोग के विचार के लिए निर्धारित विषयों ने अप्रत्याशित विवाद और चर्चा को जन्म दिया है। इसके विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण कर रहे हैं रथिन रॉय 

 
वित्तीय संसाधनों के बंटवारे पर सुझाव देने के लिए गठित 15वें वित्त आयोग के विचार के लिए निर्धारित विषय (टीओआर) को लेकर देश भर में चर्चाओं का बाजार गर्म है। सर्वाधिक चर्चा का मुद्दा 1971 के बजाय 2011 की जनगणना को आधार बनाने से संबंधित है। आयोग केंद्र एवं राज्यों के बीच संसाधनों के बंटवारे के लिए अब तक 1971 की जनगणना को आधार बनाता रहा है लेकिन इस बार 2011 की जनगणना को आधार बनाने की बात कही जा रही है। तेरहवें वित्त आयोग में मेरे साथ काम कर चुके वी भास्कर का कहना है कि 2011 की जनगणना को संसाधन वितरण का आधार बनाने से दक्षिण भारत के राज्यों को नुकसान उठाना पड़ेगा। हालांकि मेरा मानना है कि इस अनुमान में अधिक दम नहीं है। एक राज्य की हिस्सेदारी पर असर उस मापदंड के भारांक और आधार से तय होता है। अगर जनसंख्या दर को काबू में कर चुके राज्यों के प्रयासों को स्वीकृति देने के लिए उस मापदंड को कम अहमियत दी गई है तो मापदंड के आधार में किए गए बदलाव के असर को निष्प्रभावी और प्रत्यावर्तित भी किया जा सकता है। दसवें वित्त आयोग के समय से ही संसाधनों के क्षैतिज वितरण में जनसंख्या को दिया जाने वाला भारांक 10 से लेकर 25 फीसदी तक रहा है। अगर 15वां वित्त आयोग जनसंख्या भारांक को निचले दायरे पर रखने का फैसला करता है तो पूरा विवाद ही अप्रासंगिक हो जाएगा।
 
दसवें वित्त आयोग से ही क्षैतिज वितरण फॉर्मूले में सबसे अहम अवयव आय विभेद मापदंड रहा है। किसी राज्य की प्रति व्यक्ति आय के प्रतिकूल उपायों ने ऐतिहासिक रूप से इस बात को साबित भी किया है। किसी राज्य की प्रति व्यक्ति आय जितनी कम होगी, उसकी हिस्सेदारी उतनी ही अधिक होगी। दसवें वित्त आयोग से ही इस मापदंड को 50-60 फीसदी भारांक दिया जाता रहा है। हमें ध्यान रखना होगा कि किसी भी राज्य ने प्रति व्यक्ति आय को अधिक भारांक दिए जाने को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई है। इससे पता चलता है कि हमारे राज्यों के बीच भाईचारे और जिम्मेदारी का अहसास रहा है। राज्य यह मानते हैं कि इस तरह की प्रगतिवादिता वांछनीय है और उसे विभाजनकारी विवाद का विषय नहीं बनाना चाहिए।
 
ऐसी सकारात्मक भावना के बीच 15वें वित्त आयोग के टीओआर का अंदाज अगर भाईचारे वाला ही रहता तो बेहतर होता। पिछले वित्त आयोगों के विचार के लिए निर्धारित मुद्दों में केंद्र सरकार की अपनी व्यय प्रतिबद्धताएं पूरा करने के लिए मांगे गए संसाधन और राज्य सरकारों की व्यय प्रतिबद्धताओं के लिए जरूरी संसाधनों का वितरण शामिल रहता था। 15वें वित्त आयोग के टीओआर में भी ये मुद्दे शामिल हैं और काफी विस्तार से उनका जिक्र किया गया है। लेकिन उसके साथ अनावश्यक रूप से एक विवादास्पद बिंदु भी जोड़ दिया गया है जिसके मुताबिक, '14वें वित्त आयोग के सुझावों  के अनुरूप राज्यों को अधिक संसाधन वितरित किए जाने पर केंद्र की राजकोषीय स्थिति पर पड़े असर पर भी गौर करना है'। जब वित्त आयोग समूचे वित्तीय परिदृश्य का विश्लेषण करता है तो यह अंतर्निहित होता है कि वह पिछली अनुशंसाओं के असर को भी ध्यान में रखेगा। पिछले वित्त आयोग अपनी सिफारिशों को सही ठहराने के लिए इस बारे में विस्तार से चर्चा करते रहे हैं। इस तरह टीओआर में यह बिंदु अनावश्यक जोड़ा गया है। जीएसटी से होने वाले नुकसान पर राज्यों को मुआवजा देने के प्रावधान की समीक्षा करने और कुछ उपकरों को खत्म करने के बारे में सुझाव देने का जो काम आयोग को सौंपा गया है वह भी व्यर्थ ही लग रहा है। प्रत्यक्ष करों पर उपकर लगाने का काम केंद्र ही करता है।
 
टीओआर में शामिल एकदम नया खंड राज्यों के गुस्से का सबब बन रहा है। इस खंड में आयोग से 'राज्यों को प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन उपायों' के बारे में सुझाव देने को कहा गया है। केवल राज्यों के लिए निर्धारित इस खास बिंदु में अगर गैरजरूरी ब्योरे नहीं दिए गए होते तो यह उतने विवाद का विषय नहीं बनता। इसमें प्रगति के कई संकेतकों का जिक्र है जिन पर राज्यों को खरा उतरना होगा। 'भारत सरकार की प्रमुख योजनाओं के क्रियान्वयन में उपलब्धियां' और 'खुले में शौच पर रोक के लिए लोगों की आदत बदलने की कोशिश' जैसे कुछ संकेतकों के चलते मानदंड संबंधी पूर्वाग्रहों के आरोप लग रहे हैं। सवाल उठता है कि केंद्रीय योजनाओं के क्रियान्वयन को किसी राज्य की प्रगति का संकेतक क्यों माना जाना चाहिए? इसी तरह स्वास्थ्य या शिक्षा जैसे राज्य सूची के विषय में मिली सफलता संकेतक क्यों न बनाई जाए? प्रत्यक्ष लाभ अंतरण योजनाओं का लागू होना और डिजिटल अर्थव्यवस्था के प्रोत्साहन जैसे वैचारिक बिंदु भी हैं। कुछ बिंदु तो आलोचनात्मक हैं, मसलन; कारोबारी सुगमता की दिशा में प्रगति और श्रम प्रधानता वाली प्रगति को प्रोत्साहन। टीओआर में इस तरह के विशिष्ट बिंदुओं को शामिल करने के पीछे मुझे कोई ठोस कारण नहीं नजर आ रहा है। पिछले आयोगों की तरह इस तरह के मामले आयोग के निर्णय के लिए छोड़ दिए जाने चाहिए थे। आखिर आजादी के बाद गठित 14 वित्त आयोगों ने इस काम को बखूबी अंजाम दिया है। 
 
इस तरह के हालात निश्चित रूप से 15वें वित्त आयोग के काम को मुश्किल बना रहे हैं लेकिन वित्तीय संसाधनों के क्षैतिज एवं ऊध्र्वाधर वितरण के बारे में सुझाव देने का मौलिक कार्य तो वह संविधान से हासिल अपने प्राधिकार से ही पूरा करेगा। वित्त आयोग को संविधान ने यह अधिकार दिया है कि वह क्षैतिज एवं ऊध्र्वाधर वितरण के लिए जरूरी समझे जाने वाले मापदंडों के लिए अलग भारांक निर्धारित कर सके। इस तरह आयोग केंद्र एवं राज्यों के लिए राजकोषीय मजबूती का रोडमैप भी निर्धारित कर देगा। यह दोनों स्तरों पर और अलग-अलग राज्यों की आनुपातिक हिस्सेदारी से संबंधित सुझाव भी दे सकता है। वित्त आयोग को मिला संवैधानिक दर्जा उसे समुचित स्वायत्तता प्रदान करता है।
मुझे पूरा यकीन है कि 15वां वित्त आयोग पिछले आयोगों की तरह अपने संवैधानिक दायित्वों को पूरी सक्षमता से पूरा कर पाएगा। यह महत्त्वपूर्ण है कि राज्य इस बात को स्वीकार करें कि आयोग के विचार के लिए निर्धारित विषयों को लेकर खड़ा हुआ विवाद काफी हद तक खराब ढंग से तैयार मसौदे की उपज है और संवैधानिक जिम्मेदारियों के संदर्भ में यह पिछले आयोगों की तरह ही है। ऐसे में 15वें वित्त आयोग पर अपना दायित्व पूरा कर पाने की क्षमता पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। राज्यों से मेरा अनुरोध है कि इस बेहद अहम संवैधानिक संस्था में अपना विश्वास बनाए रखें।
 
(लेखक एनआईपीएफपी के निदेशक हैं। वह 13वें वित्त आयोग के आर्थिक सलाहकार रहे थे।)
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