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साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  April 27, 2018

मैंने गत सप्ताह लिखा था कि नया वित्त वर्ष आर्थिक बहाली का वर्ष होगा। अब मुझे लग रहा है कि व्यापक आर्थिक बहाली को कारोबारी प्रदर्शन में अहम सुधार से भी मदद मिलेगी। 1,000 सबसे बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों का प्रदर्शन पहले ही अपने निम्रतम स्तर के बाद अब सुधार पर है। नया वर्ष इस बात की पुष्टि कर सकता है कि सुधार का यह परिदृश्य न केवल अधिकांश कंपनियों के लिए बहुप्रतीक्षित और लंबे समय से चली आ रही कठिनाई का अंत है बल्कि यह सुधार के एक चक्र की शुरुआत भी है। अभी भी यह कहा जा सकता है कि कारोबारी जगत का पूर्णरूपेण सुधरा हुआ प्रदर्शन एक या दो साल की दूरी पर है। ऐसा इसलिए क्योंकि जिंस चक्र में उछाल के चलते कई कंपनियों की लागत में इजाफा होगा।

 
जैसा कि हर कोई जानता है, वर्ष 2008 के वित्तीय संकट के वक्त कारोबारी जगत का प्रदर्शन कमोबेश उच्चतम स्तर पर था। उस वक्त 1,000 सबसे बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों का मुनाफा 30 फीसदी से अधिक की सालाना दर से बढ़ रहा था जबकि राजस्व वृद्धि 20 फीसदी और 30 फीसदी की दर से हो रही थी। इसे उस असामान्य ऊंचाई से तो नीचे ही आना था। परंतु बीते कुछ वर्ष के दौरान हमने जैसा प्रदर्शन किया उसकी अपेक्षा नहीं थी। खासतौर पर वर्ष 2012 के बाद जैसा प्रदर्शन, जब मुनाफा सिरे से नदारद हो गया और निजी कारोबारी पूंजी व्यय लगातार छह वर्ष गिरकर पहले के स्तर के पांचवें हिस्से के बराबर रह गया। इतना ही नहीं राजस्व वृद्धि तकरीबन शून्य हो गई। मोटे तौर पर यह अतिरिक्त तेजी के वर्षों की वजह से हुआ क्योंकि उस वक्त कंपनियों के पास फंड की प्रतिबद्धता अधिक थी। यहां तक कि बहुत बड़े पैमाने पर उन परियोजनाओं को ऋण दिया गया था जिनका मूल्य अनुमान अत्यधिक आशावादी था।
 
यह सब चरणबद्ध तरीके से समाप्त होना ही था। बड़ी कंपनियों की बिक्री अक्टूबर से दिसंबर तिमाही के दौरान दो अंकों में बढ़ी। मुनाफा वापस लौटा और ऋण तथा इक्विटी का अनुपात भी बीते दो साल से सुधर रहा है। माना जा सकता है कि ऐसा नया निवेश आने से हो रहा है। हालांकि क्षमता के इस्तेमाल के मामले में कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिल सकी है लेकिन सुधार यहां भी हो रहा है। कहा जा सकता है कि निवेश की कमी का दौर अब खत्म होने को है। कई अनुमानों में कहा गया था कि वर्ष 2018-19 में कारोबारी जगत में पूर्ण बहाली आ जाएगी। परंतु हाल के सप्ताहों पर ध्यान दें तो लगता है कि ऐसा शायद 2019-20 तक हो सकेगा। दिवालिया प्रक्रिया अभी गति पकड़ ही रही है और संकटग्रस्त कंपनियां जिनका मालिकाना बदला है उनमें एक अंतराल के बाद सुधार दिखने की आशा है। निवेश में सुधार में मुनाफा मार्जिन सुधार का भी असर देखने को मिलेगा। वर्ष 2008 के बाद इक्विटी पर प्रतिफल घटकर आधा रह गया था। इससे फंड की लागत और इक्विटी पर प्रतिफल का अंतर घट रहा था। अब हालात बदल रहे हैं।
 
कारोबारी जगत के प्रदर्शन और निवेश में सुधार का दौर कम से कम तीन साल तक तो चलना चाहिए। हो सकता है यह पिछले दशक के तेजी वाले दौर की तरह स्थायित्व भरा नहीं हो। उस वक्त 2003 से 2007 तक निरंतर पांच साल तेजी देखने को मिली थी। उससे पहले सन 1990 के दशक में केवल तीन साल सन 1994 से 1997 तक तेजी का दौर रहा। दोनों ही अवसरों पर वैश्विक या क्षेत्रीय स्तर पर घटी घटनाओं ने तो इसे प्रभावित किया ही, साथ ही भारत में कारोबारी असंयम भी इसकी वजह बना। आज वैश्विक स्तर पर अतिशय ऋण को लेकर कुछ चिंताएं हैं जिनकी वजह से अचानक झटके लग सकते हैं। घरेलू स्तर पर अगर अर्थव्यवस्था को संभालने वाले सतर्क रहें तो हम पिछली गलतियां दोहराने से बच सकते हैं।
 
इस बीच शेयर बाजार कारोबारी प्रदर्शन में वास्तविक सुधार के पहले ही उछाल पर है। सेंसेक्स नवंबर 2016 के नोटबंदी के झटके से उबर चुका है और नई ऊंचाइयों पर है। तीन महीने पहले यह उच्चतम स्तर पर पहुंचा। उसके बाद से विदेशों के बिकवाली दबाव के बीच वह मजबूत बना हुआ है। कुल मिलाकर देखा जाए तो सूचकांक चार साल पहले के मुकाबले 60 फीसदी ऊपर है। इससे यही संकेत मिलता है कि कारोबारी प्रदर्शन में अपेक्षित सुधार शेयर कीमतों में नजर भी आने लगा है।
Keyword: india, economy, IIP, GDP, share market,,
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