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सरकारी बैंकों पर क्या हैं आरबीआई के अधिकार

देवाशिष बसु /  04 25, 2018

रिजर्व बैंक को सरकारी बैंकों पर व्यापक अधिकार प्राप्त हैं और वे एकदम स्पष्टï हैं। अब यह बताने की बारी आरबीआई की है कि उसने फंसे हुए कर्ज को 10 लाख करोड़ रुपये तक कैसे पहुंचने दिया। बता रहे हैं देवाशिष बसु

 
अपने पिछले आलेख में मैंने एक एक कर उन तमाम विधायी प्रावधानों का जिक्र किया था जिनके बारे में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर का मानना था कि वे आरबीआई को सरकारी बैंकों के खिलाफ कोई कदम उठाने से रोकते हैं। मैंने विस्तार से यह बताया कि कैसे उनमें से कोई भी नियम या प्रावधान सरकारी और निजी क्षेत्र के बैंकों में भेद नहीं करता। इस आलेख में मैं यह बताऊंगा कि आरबीआई को वास्तव में कितनी शक्तियां और अधिकार प्राप्त हैं। इसकी शुरुआत मैं मई 2014 में जारी आरबीआई के दस्तावेज से करूंगा जिसका शीर्षक है रिपोर्ट ऑफ द वर्किंग ग्रुप ऑन रिजॉल्युशन रिजीम फॉर फाइनैंशियल इंस्टीट्यूशंस। आरबीआई की इस रिपोर्ट के तीसरे खंड में कहा गया है, 'आरबीआई को यह अधिकार है कि वह जनहित में बैंकों (बैंकिंग कंपनियों और सरकारी बैंकों) को निर्देश दे सके और किसी बैंक में ऐसे कामकाज को रोक सके जो जमाकर्ताओं के हित के खिलाफ हो या खुद उसके हितों के प्रति पूर्वग्रह से ग्रस्त हो। आरबीआई बैंकों को किसी खास लेनदेन को अंजाम देने से रोक सकता है या उनको इस संबंध में चेतावनी जारी कर सकता है।' अब भला आरबीआई की शक्तियों को लेकर इससे स्पष्ट और क्या लिखा जा सकता है?
 
दूसरे तर्क के लिए मैं एक नई किताब का सहारा लूंगा। टी आर भट्ट की इस किताब का शीर्षक है रिफॉर्मिंग द इंडियन पब्लिक सेक्टर बैंक्स। भट्ट कॉर्पोरेशन बैंक अधिकारी संगठन का नेतृत्व कर चुके हैं जो एक जवाबदेह और सक्रिय यूनियन है। इस यूनियन ने कॉर्पोरेशन बैंक के वरिष्ठ प्रबंधन की कई गड़बडिय़ों को सार्वजनिक करने का काम किया था। बतौर बैंकर 33 वर्ष का अनुभव रखने वाले भट्ट कहते हैं कि आरबीआई को सरकारी बैंकों से नियमित रूप से निपटने के लिए कम से कम चार तरह के निगरानी अधिकार हासिल हैं।
 
बैंक के बोर्ड में उसका एक नामित सदस्य होता है। बैंक के आकार के मुताबिक उसका दर्जा छोटा या बड़ा हो सकता है। हर्षद मेहता घोटाले के वक्त आरबीआई के डिप्टी गवर्नर आर जानकीरामन बोर्ड के सदस्य थे। यह बोर्ड तमाम बड़े फैसलों के लिए जवाबदेह होता है और आरबीआई को इनकी जानकारी होती है। आरबीआई नियमित रूप से सरकारी बैंकों के बही खातों की जांच करता है। आरबीआई जरूरत पडऩे पर एक विशेष अंकेक्षण करा सकता है। निगरानी की इन रिपोर्ट के बारे में आवश्यकता पडऩे पर बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों और ऑडिट कमेटी ऑफ द बोर्ड (एसीबी) से चर्चा की जा सकती है।
 
आरबीआई एक संस्थागत व्यवस्था लाकर कामकाज की निगरानी कर सकता है, बैंकों को सामूहिक रूप से नीतिगत निर्देश दे सकता है और बैंकों को व्यक्तिगत रूप से भी निर्देश दे सकता है। उदाहरण के लिए भट्ट बताते हैं कि सन 1994 में आरबीआई ने बैंकों, वित्तीय संस्थानों और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की निगरानी के लिए बोर्ड ऑफ फाइनैंशियल इंस्टीट्यूशंस (बीएफआई) का गठन किया। सन 2002-03 में आरबीआई ने वृहद आंकड़ों के अध्ययन और उनके आधार पर जरूरी कदम सुझाने के लिए मैक्रो-प्रूडेंशियल इंडिकेटर्स (एमपीआई) की व्यवस्था की। कमजोरी को चिह्निïत करने के लिए तत्काल उपाय करना और पेशकदमी करना भी उसका हिस्सा था। एक और उदाहरण देता हूं: आरबीआई ने कर्ज के पुनर्गठन के अलग-अलग तरीकों का जिक्र बार-बार किया है। इनका सबसे बड़ा असर सरकारी बैंकों पर है। भट्ट के मुताबिक, 'आरबीआई ने नियमित रूप से अपने इस अधिकार का इस्तेमाल करके बैंकों के परिचालन संबंधी मसलों यानी कि जोखिम प्रबंधन, परिसंपत्ति जवाबदेही प्रबंधन, कॉर्पोरेट संचालन और धोखाधड़ी पर नियंत्रण आदि को संबोधित किया है। बैंकों को आरबीआई की सलाह सुननी ही थी।' आखिरकार आरबीआई ने बैंकों पर निगरानी की अपनी शक्ति को विविध मसलों पर समयबद्घ रिटर्न और वक्तव्यों के माध्यम से विस्तारित कर दिया। बैंकों को ये सब आरबीआई को भेजना होता है। हकीकत में हर बैंक की प्रबंधन सूचना प्रणाली मुख्य तौर पर आरबीआई को अहम जानकारी दिलाने के लिए ही होती है। 
 
तीसरी बात, मैं वित्त मंत्रालय द्वारा वित्तीय मामलों की स्थायी समिति के समक्ष प्रस्तुत एक जवाब को यहां उल्लिखित करना चाहता हूं जो दिखाता है कि आरबीआई बैंकों द्वारा फंसे हुए कर्ज के निपटाने के तरीके को लेकर गहराई से जुड़ा हुआ है। इसमें फंसी हुई परिसंपत्ति से जुड़ा ढांचा, ऋण का लचीला पुनर्गठन, सामरिक ऋण पुनर्गठन के जरिये प्रबंधन में बदलाव आदि शामिल हैं। इसके अलावा एक केंद्रीय बड़े ऋण से जुड़ी सूचना का एक केंद्रीय केंद्र (सीआरआईएलसी) गठित किया गया ताकि विशेष उल्लेख वाले खातों समेत तमाम तरह के ऋण से जुड़ी सूचना के संग्रह, भंडारण और उसकी छंटनी का काम किया जा सके। इतना ही नहीं आरबीआई सालाना वित्तीय निगरानी और जोखिम आधारित निगरानी के दौरान एनपीए प्रबंधन से जुड़े दिशानिर्देशों का क्रियान्यवन और प्रबंधन भी करता है। जिन मामलों में  अनुपालन नहीं होता उन्हें बैंक भेजा जाता है और बैंकों से कहा जाता है कि वे दिशानिर्देशों का अनुपालन कर उचित प्रावधान करें। 
 
इसके पश्चात आरबीआई बैंकों के अनुपालन की निगरानी करता है। इसके अतिरिक्त बैंक का आंतरिक अंकेक्षक, संयुक्त अंकेक्षक और सांविधिक अंकेक्षक आदि परीक्षण करते हैं और आय की पहचान, परिसंपत्ति वर्गीकरण और प्रोविजनिंग मानकों पर आरबीआई के निर्देश का अनुपालन करते हैं।  बैंकों की सालाना निगरानी के अलावा आरबीआई ने 2015-16 में एक व्यवस्था आधारित परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा भी की। इसमें सभी प्रमुख बैंक शामिल थे। वित्त मंत्रालय संसदीय समिति के समक्ष दिए आने उत्तर में कहता है कि आरबीआई अपनी नियामकीय क्षमताओं का इस्तेमाल करते हुए देनदारी चूकने के मामलों में बैंकों पर दंडात्मक कार्रवाई भी करता है और जून 2016 तक एक औपचारिक निगरानी प्रवर्तन ढांचा बनाने का निर्णय किया गया है।  जाहिर सी बात है यह दावा गलत है कि आरबीआई के पास अधिकार नहीं हैं और वह सरकारी बैंकों को गैरजिम्मेदाराना व्यवहार करने से रोक नहीं सकता। आरबीआई को सरकारी बैंकों पर व्यापक अधिकार प्राप्त हैं और वे एकदम स्पष्टï हैं। अब यह बताने की बारी आरबीआई की है कि उसने फंसे हुए कर्ज को 10,00,000 करोड़ रुपये तक कैसे पहुंचने दिया। 
Keyword: bank, loan, debt, RBI,,
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