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बाहरी मोर्चे पर चेतावनी

संपादकीय /  04 23, 2018

सरकार बार-बार यह दलील देती आई है कि उसकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह भी है कि वह देश की अर्थव्यवस्था को 2013 की गर्मियों में चिह्निïत पांच सबसे दुर्बल अर्थव्यवस्थाओं की श्रेणी से बाहर निकाल लाई है। उस दौर में देश का चालू खाते का घाटा (सीएडी) अत्यंत खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका था। बहरहाल सरकार उसे नियंत्रित करने में कामयाब रही। खासतौर पर सोने के आयात को नियंत्रित करके सरकार वर्ष 2013-14 के दौरान सीएडी को सकल घरेलू उत्पाद के 1.7 फीसदी के स्तर पर लाने में कामयाब रही। इससे ठीक एक वर्ष पहले यह 4.8 फीसदी के स्तर पर था। तब से अब तक सीएडी में लगातार कमी आई और वर्ष 2016-17 में यह जीडीपी का महज 0.7 फीसदी रह गया। परंतु वर्ष 2017-18 में इसमें काफी बढ़ोतरी होने की आशंका है। विभिन्न संस्थागत विश्लेषकों के मुताबिक इस वर्ष यह जीडीपी के 1.6 फीसदी से 1.8 फीसदी के बीच रह सकता है। एक संस्थान ने तो यह तक कहा है कि कच्चे तेल की कीमतों के आधार पर वर्ष 2018-19 के दौरान सीएडी जीडीपी के 2.4 फीसदी से 2.9 फीसदी के बीच भी रह सकता है। 

 
निश्चित तौर पर सीएडी की इस समस्या के पीछे कच्चे तेल की कीमत काफी हद तक जिम्मेदार है और यह सरकार के नियंत्रण से भी परे है। परंतु यह भी स्पष्टï है कि कुछ और भी घटित हो रहा है। बीते एक साल में देश के आयात में काफी बढ़ोतरी हुई है और यह पूरी तरह तेल से जुड़ा हुआ नहीं है। रत्न एवं आभूषण में भी इजाफा हुआ है। कहा जाता रहा है कि यह पूंजी के पलायन का शुरुआती संकेत हो सकता है। कुल मिलाकर बीते वित्त वर्ष में आयात में होने वाला इजाफा निर्यात की तुलना में तकरीबन दोगुना रहा। सोने के आयात पर लगाई गई खपत संबंधी सीमा जैसे उपायों को छोड़ दें तो सरकार के पास इस आयात को कम करने के कोई खास उपाय मौजूद नहीं हैं। निर्यात के बारे में यह नहीं कहा जा सकता है। हकीकत में बढ़ते व्यापार घाटे को आयात बढऩे के बजाय निर्यात बढ़ाने में मिली विफलता के रूप में भी देखा जा सकता है। जब तेल कीमतें स्थिर थीं और वृहद आर्थिक संकेतक भी एक जगह स्थिर थे तब सरकार ने हालात का लाभ नहीं लिया। जबकि उस वक्त इसका इस्तेमाल आयात बढ़ाने में किया जा सकता था। वर्ष 2011 से ही निर्यात 300 अरब डॉलर के आसपास या उससे कमजोर बना रहा। यहां तक कि प्रतिद्वंद्वी निर्यातक देश मसलन बांग्लादेश और वियतनाम ने अपने निर्यात राजस्व में जमकर इजाफा किया। यहां तक कि वर्ष 2017-18 में भी निर्यात वृद्घि एक अंक में रही जबकि वर्ष 2011-12 के बाद यह विश्व व्यापार वृद्घि का सबसे मजबूत वर्ष था।
 
बाहरी खाते के मोर्चे पर इकलौती स्थायी राह एक जीवंत और वैश्विक स्तर पर एकीकृत निर्यात क्षेत्र से जुड़ी है। इसके बावजूद इस क्षेत्र को लेकर सरकार का रवैया बहुत सकारात्मक नहीं रहा। जब निर्यात वृद्घि की आवश्यकता होती है तब क्षेत्र आधारित पैकेज घोषित किए जाते हैं जो कर प्रोत्साहन से अधिक होते हैं। परंतु कुल मिलाकर कर की हालत में सुधार नहीं हुआ। वस्तु एवं सेवा कर के कमजोर क्रियान्वयन के चलते नकदी का संकट उत्पन्न हो गया। निर्यातकों की अधिकांश पूंजी सरकार की ओर से रिफंड के इंतजार में फंस गई। अगर भुगतान संतुलन बिगड़ता है तो कम से कम रुपये की कीमत में उसके मौजूदा अधिमूल्यित स्तर से गिरावट आएगी। इससे निर्यात सस्ता होगा। सरकार को निर्यात की आपूर्ति शृंखला को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए तमाम पहलुओं पर जमकर काम करना होगा। पुरानी शैली के संरक्षणवादी और टैरिफ आधारित कदम काम नहीं आएंगे।
Keyword: economy, narendra modi, CAD,,
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