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फंसी संपत्तियों की नीलामी में बोली लगाएंगे पीई फंड!

सुरजीत दास गुप्ता / नई दिल्ली 04 23, 2018

पहले चरण में फंसी संपत्तियों की नीलामी में बड़े पीई फंडों ने नहीं दिखाई दिलचस्पी
एयर इंडिया को लेकर भी पीई फंडों की ठंडी प्रतिक्रिया
पीई फंडों के पास स्थानीय स्तर पर विशेषज्ञता नहीं होना है इसकी एक वजह

बिजनेस स्टैंडर्ड फंसी संपत्तियों की नीलामी में बोली लगाएंगे पीई फंड!ऋणशोधन निपटान प्रक्रिया में जाने वाली फंसी संपत्तियों के वास्ते बोली लगाने के लिए वैश्विक निजी इक्विटी (पीई) फंडों के पास नया अवसर होगा। इसके साथ ही विमानन मंत्रालय भी एयर इंडिया की बोली के लिए पीई को लुभाने का प्रयास कर रही है। हालांकि 12 बड़े कॉरपोरेट डिफॉल्टर के निपटान प्रक्रिया में पीई फंडों की ओर से अब तक ठंडी प्रतिक्रिया ही देखी गई।

बेन कैपिटल, टीपीजी, ब्लैकस्टोन और केकेआर ने शुरुआती स्तर पर दिलचस्पी दिखाई थी और इनमें से कुछ ने अभिरुचि पत्र भी सौंपा था। लेकिन अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट और आईसीआईसीआई वेंचर का संयुक्त उपक्रम एआईऑन ही एकमात्र पीई रहा जिसने मोनेट इस्पात के लिए जेएसडब्ल्यू समूह के साथ बोली लगाई।

अधिकांश पीई फंडों ने कहा कि वे अगले चरण में बढ़-चढ़कर बोली लगाएंगी जब भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा चिह्नित 28 कंपनियां निपटान प्रक्रिया में जाएंगी। लेकिन वे चाहते हैं कि मौजूदा 12 कंपनियों में से कम से कम दो या तीन का मामला पूरा हो।

अग्रणी पीई फंड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'हम चाहते हैं कि कुछ सौदे पूरे हों ताकि यह पता चल सके कि प्रक्रिया उपयुक्त और टिकाऊ है। अगर ऐसा होता है तो हम अगले चरण में बोली लगाएंगे। लेकिन कानूनी पेच चलता रहा तो इससे चिंता बढ़ सकती है।' शुरुआती हिचकिचाहट की कई वजहें हैं। अधिकतर बड़े पीई फंडों के पास फंसी संपत्तियों में विशेषज्ञता वाली स्थानीय टीम नहीं है और अभी वे इसका गठन कर रहे हैं।

बेन (पीरामल के साथ) और अपोलो (आईसीआईसीआई वेंचर) को छोड़कर अधिकांश बड़े पीई फंड साझेदारी मॉडल से दूर ही रहे। इसके साथ ही अधिग्रहण के लिए जिस तरह के आंकड़े की जरूरत होती है, वे निपटान पेशेवरों से नहीं मिल पा रहे हैं। हालांकि पीई फंडों ने कहा कि वे दूसरे चरण में सक्रियता से बोली लगाएंगे। अगले तीन महीने में 50 अरब से 100 अरब रुपये के कर्ज वाली कंपनियां इस प्रक्रिया के तहत नीलामी के लिए आएंगी।

करीब 7 से 9 पीई फंड और ऐसेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनियों के साथ ही कुछ नए नाम जैसे ओकट्री कैपिटल, एडलवाइस भी शामिल हो सकती हैं। एऑन ने इस सूची में करीब दर्जन भर कंपनियों को चिह्निïत किया है और उनका अध्ययन कर रही है। पीई फंडों ने कहा कि वे अपनी ऐसेट रीकंस्ट्रक्शन फर्मों के साथ भी साझेदारी कर सकती है, जिनमें से कई के पास भारत में परिचालन का लाइसेंस है।

ये फंसी संपत्तियों का बैंकों से कम कीमत पर कर्ज खरीद सकती हैं और ऋणदाताओं की समिति का हिस्सा बनकर बैंकों को बेहतर निपटान योजना के लिए राजी कर सकती हैं। हालांकि इससे हितों के टकराव का मुद्दा खड़ा हो सकता है जिसे जरूरत पडऩे पर सरकार सुलझा सकती है। भारतीय रिजर्व बैंक ने फरवरी में सख्त दिशानिर्देश जारी किया था जिसके तहत ब्याज भुगतान में एक दिन भी चूक होने पर कंपनी को डिफॉल्टर माना जाएगा और कर्जदाता 180 दिनों के अंदर ऋण निपटान करेंगे। ऐसा नहीं होने पर मामला एनसीएलटी में जाएगा।

नकदी संकट से जूझ रही सार्वजनिक क्षेत्र की विमानन कंपनी एयर इंडिया का मामला दूसरा है। सॉवरिन एवं सरकार समर्थित फंडों जैसे टेमासेक होल्डिंग्स, जिसके पास सिंगापुर एयरलाइंस में 50 फीसदी हिस्सेदारी है और कतर इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी, जिसके पास कतर एयरवेज और ब्रिटिश एयरवेज में हिस्सेदारी है, इसके साथ ही वारेन बफेट जैसे निवेशकों ने भी संकट में फंसी विमानन कंपनियों में निवेश किया है।  

सेरबेसर कैपिटल मैनेजमेंट ने पिछले साल अलिटालिया के लिए फंड देने की पेशकश की थी, जिससे यह स्वतंत्र रूप से परिचालन कर सके।लेकिन अधिकांश बड़े निवेशकों ने एयर इंडिया के प्रति ठंडी प्रतिक्रिया दिखाई है। टीपीजी और केकेआर जैसे पीई फंडों ने एयर इंडिया में अपनी दिलचस्पी के बारे में कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, वहीं बेन कैपिटल ने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सूत्रों ने कहा कि ये स्पष्ट तौर पर बोली नहीं लगाने जा रही हैं।

अमेरिकी पीई दिग्गज के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'यह काफी जटिल सौदा है और हमारे पास स्थानीय विशेषज्ञता नहीं है तथा अधिकांश घरेलू निजी विमानन कंपनियां, जिनके साथ हम साझेदारी कर सकते हैं, इनमें दिलचस्पी नहीं दिखा रही हैं।'  हालांकि उन्होंने विशेषीकृत पीई फंडों द्वारा इसमें निवेश की संभावना से इनकार नहीं किया, लेकिन कहा कि वे तभी निवेश करेंगे जब व्यापक पुनर्गठन पर सहमति बनेगी।

इसके साथ ही सॉवरिन और सरकार समर्थित फंड एयर इंडिया की बोली के लिए अन्य विमानन कंपनियों के साथ साझेदारी कर सकते हैं। हालांकि यह उस पर निर्भर करेगा कि बिक्री की शर्तों में संभावित खरीदार के अनुकूल कितना बदलाव किया जाता है।

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