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संचयी फंडों पर लगा सकते हैं दांव

संजय कुमार सिंह और तिनेश भसीन /  04 22, 2018

पिछले कुछ महीनों के दौरान 10 साल के सरकारी बॉन्ड पर प्रतिफल बहुत उतार-चढ़ाव भरा रहा है। यह 24 जुलाई, 2017 को 6.41 फीसदी तक गिर गया था, जो 6 मार्च 2018 को बढ़कर 7.78 फीसदी तक पहुंच गया। हालांकि 6 अप्रैल को गिरकर फिर  7.18 फीसदी पर आ गया। उसके बाद यह फिर चढ़कर 7.47 फीसदी के आसपास पहुंच गया है। ऐसे वर्ष में जिसमें बॉन्ड प्रतिफल उतार-चढ़ाव भरा रहने के आसार हैं, उसमें निवेशकों को अपने निश्चित आय निवेश के लिए सोच-समझकर रणनीति अपनाने की जरूरत है। 

 
इस समय क्या स्थिति है? पिछले साल जुलाई से लेकर इस साल मार्च के प्रारंभ तक बॉन्ड प्रतिफल में बढ़ोतरी की मुख्य वजह ऊंची महंगाई की चिंताएं रही हैं। पिछले कुछ समय से ये चिंताएं खत्म हो गई हैं क्योंकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई की दर अनुमान से नीचे बनी हुई है। बॉन्ड प्रतिफल में बढ़ोतरी की एक अन्य मुख्य वजह केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ से बॉन्डों की भारी आपूर्ति रही। बैंकों द्वारा होल्ड-टू-मैच्योरिटी (एचटीएम) श्रेणी में रखे जा सकने वाले बॉन्डों का हिस्सा भी कम हुआ है। बॉन्ड प्रतिफल बढऩे और सरकारी बैंकों के पास बड़ी मात्रा में बॉन्ड होने से वे और ज्यादा बॉन्ड नहीं खरीद रहे हैं क्योंकि उन्हें इन बॉन्ड को मार्क-टू-मार्केट श्रेणी में रखना होगा। अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर अमेरिका का केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व लगातार दरें बढ़ा रहा है, जबकि अन्य केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था में नकदी डालने के अपने कार्यक्रमों में कटौती कर रहे हैं। 
 
बॉन्ड प्रतिफल का 7.78 फीसदी के स्तर से नीचे आना सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के सोच-समझकर उठाए गए कदमों का नतीजा था। सरकार ने वित्त वर्ष के पहले 6 महीनों में कम उधारी लेने का फैसला किया था। आरबीआई ने हस्तक्षेप करते हुए बैंकों को अपने बॉन्ड पोर्टफोलियो के घाटे को चार तिमाहियों में बांटने की मंजूरी दी। इसके बाद क्रेडिट पॉलिसी जारी की गई, जो काफी नरम थी। इसमें अनुमानित महंगाई में कमी की गई, जबकि केंद्रीय बैंक ने तेल की कीमतों में मजबूती और कृषि उपज के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी के जोखिम के आसार जताए थे। 
 
रिलायंस म्युचुअल फंड के सीआईओ (निश्चित आय निवेश) अमित त्रिपाठी कहते हैं, 'सरकार और नियामक ने उम्मीद से ज्यादा कदम उठाए हैं, लेकिन निवेशकों के स्तर पर कम जोखिम के कारण कम मांग आई है। यह उतार-चढ़ाव की प्रमुख वजह है। भूराजनीतिक तनाव और हाल में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के जोखिम से बचाव का रुझान और बढ़ा है।'  मौद्रिक नीति के तुरंत बाद बॉन्ड प्रतिफल फिर बढऩे लगा है। इसकी मुख्य वजह नीलामी में खरीदारों की कमी मुख्य वजह है। एचडीएफसी बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री अभीक बरुआ कहते हैं, 'इस साल बॉन्ड बाजार का उतार-चढ़ाव मुख्य मुद्दा रहेगा। आरबीआई के अर्थव्यवस्था में नकदी डालने की घोषणा करने और ऋण उठाव के लिए यह सीजन कमजोर होने से अगले एक-दो महीने में प्रतिफल घट सकता है। लेकिन बुनियादी चिंताएं पैदा होने से प्रतिफल बढ़ सकता है।'
 
ऊंचे प्रतिफल के लिए रहें तैयार 
 
केंद्र सरकार की उधारी दूसरी छमाही में ज्यादा रहेगी। राज्यों की उधारियां भी उम्मीद से अधिक रहने के आसार हैं। भूराजनीतिक तनाव के कारण तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं। बरुआ कहते हैं, 'प्रतिफल में बढ़ोतरी का एक बड़ा कारक आगामी चुनाव हो सकते हैं, जो सरकारी खर्च में बढ़ोतरी की वजह बन सकते हैं। बजट में एमएसपी को लेकर की गई घोषणा भी महंगाई में बढ़ोतरी की वजह बनेगी।'
 
अवधि का खेल न खेलें  
 
सरकारी बॉन्ड बाजार में उतार-चढ़ाव बने रहने के आसार हैं, इसलिए निवेश सलाहकार संचयी फंडों की सलाह दे रहे हैं। ऐसे फंड चुनें, जिनका ज्यादातर निवेश एएए और एए रेटिंग प्राप्त बॉन्ड में हैं और जिनकी लंबी अवधि है। आपकी धनराशि का एक हिस्सा क्रेडिट अपॉच्र्युनिटी फंडों में भी जा सकता है। सैंक्टम वेल्थ मैनेजमेंट के सीआईओ सुनील शर्मा कहते हैं, 'अर्थव्यवस्था के अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद है। इसलिए हमें कॉरपोरेट क्रेडिट रेटिंग में और सुधार देखने को मिल सकता है। ऐसा पहले से हो रहा है। क्रेडिट अपॉच्र्यूनिटी फंड आकर्षक प्रतिफल देंगेे।'
 
इनमें अपने डेट पोर्टफोलियो का 10-20 फीसदी से ज्यादा निवेश नहीं करें क्योंकि ये जोखिमभरे साबित हो सकते हैं।  अगर आपने हाल में अपना निवेश सावधि जमा (एफडी) से निकालकर डेट फंडों में किया है या आपके निवेश की अवधि तीन साल से कम है तो अल्ट्रा शॉर्ट टर्म फंडों पर दांव लगाने पर विचार किया जा सकता है। ये फंड अल्पावधि के बॉन्ड में निवेश करते हैं और ब्याज दरों में घटत-बढ़त से ज्यादा प्रभावित नहीं होते हैं। शर्मा कहते हैं कि अगर ऐसे निवेेशक एक साल या अधिक समय के लिए निवेश करना चाहते हैं तो वे आर्बिट्राज फंडों पर भी विचार कर सकते हैं। सर्टिफाइड फाइनैंशियल प्लानर पंकज मालदे का सुझाव है कि अगर आपके निवेश की अवधि तीन साल से अधिक है तो फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लान (एफएमपी) में निवेश करें। 
 
सावधि जमाओं पर भी करें विचार  
 
भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) समेत कई बैंकों ने हाल में अपनी जमा दरें बढ़ाई हैं। इस समय एसबीआई एक साल की जमाओं पर 6.40 फीसदी ब्याज दे रहा है, जो वरिष्ठ नागरिकों के लिए 6.90 फीसदी है। कर्नाटक बैंक जैसे कुछ बैंक इतनी अवधि के लिए 7.10 फीसदी ब्याज दे रहे हैं। छह महीने से एक साल के लिए निवेश करने वाले निवेशक एफडी के बारे में विचार कर सकते हैं। सेबी में पंजीकृत निवेश सलाहकार अरविंद ए राव कहते हैं, 'इस समय छोटी अवधि के लिए निवेश करें। अगर ब्याज दरें आगे बढ़ जाएं तो ऊंची दरों पर लंबी अवधि के लिए निवेश करें।'
 
अन्य विकल्पों में वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (एससीएसएस) 8.3 फीसदी ब्याज देती है। भारतीय जीवन बीमा निगम की प्रधानमंत्री वय वंदना योजना 10 वर्षों के लिए 8 फीसदी सुनिश्चित प्रतिफल देती है।  सुकन्या समृद्धि योजना में 8.1 फीसदी ब्याज मिलता है। इनके अलावा 7.6 फीसदी कर मुक्त प्रतिफल के साथ सार्वजनिक भविष्य निधि भी आकर्षक विकल्प है। मालदे ने कहा, 'निश्चित आय योजनाओं को इस आधार पर चुना जाना चाहिए कि आप कितने समय के लिए निवेश करना चाहते हैं और आपको कर के बाद कितना प्रतिफल मिलेगा।'
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