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खुद का भी आकलन करें देश के न्यायाधीश

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  04 22, 2018

बासु भट्टाचार्य ने वैवाहिक मतभेदों पर फिल्मों की जो त्रयी बनाई थी उनमें से सन 1971 में आई अनुभव नामक फिल्म में संजीव कुमार ने एक ऐसे संपादक की भूमिका निभाई जो काम में अत्यधिक व्यस्त रहता है। तनुजा उनकी पत्नी की भूमिका में थीं जो बहुत तन्हा रहती हैं। ढाई घंटे की इस उतार-चढ़ाव वाली फिल्म में दिनेश ठाकुर ने तनाव के तीसरे कोण की भूमिका निभाई। फिल्म के आखिर में तनुजा और संजीव कुमार के बीच एक नाटकीय संवाद है। तनुजा संजीव कुमार से पूछती हैं कि वह हर रोज दूसरों की समस्याओं पर संपादकीय लिखते हैं, क्या वह कभी उनकी आपसी समस्याओं पर भी लिखेंगे?

 
अब जरा सर्वोच्च न्यायालय के प्रतिष्ठित न्यायाधीशों को इस स्थिति में रखकर देखिए। गत सप्ताह देश की सबसे बड़ी अदालत ने न्यायमूर्ति बी एच लोया के निधन के मामले की स्वतंत्र जांच संबंधी जनहित याचिका को खारिज कर दिया। देश के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय पीठ की ओर से न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ ने याचियों तथा उनके अधिवक्ताओं को झाड़ लगाते हुए कहा कि वे बिना सबूत के अभद्र आरोप लगा रहे हैं, स्कैंडल खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं और पूरी न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं।  अदालत के फैसले में न्यायपालिका को अधिवक्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, मीडिया तथा अन्य से बचाने की चाह नजर आती है। ऐसा लग रहा है मानो हर कोई न्यायाधीशों के पीछे पड़ा है और वे किसी तरह अपना बचाव कर रहे हैं।
 
क्या हम अनुभव फिल्म की तनुजा की तरह न्यायाधीशों से यह पूछ सकते हैं कि वे हर समय न्यायपालिका को दूसरों से बचाने के फैसले देते रहते हैं, क्या वे कभी एक निर्णय इस पर भी लिखेंगे कि न्यायपालिका को न्यायाधीशों से कैसे बचाया जाए?  यह वक्त फैसले के गुणदोष पर बात करने का नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला बढिय़ा दलीलों के साथ अत्यंत संक्षेप में दिया है। ऐसा हाल के दिनों में कम ही निर्णयों में देखने को मिला है। इस ध्रुवीकृत वक्त में आप इसे कैसे देखते हैं, यह इस पर भी निर्भर हो सकता है कि आप राजनैतिक और वैचारिक रूप से कहां खड़े हैं। पत्रकार बरखा दत्त ने निर्ममतापूर्वक पूरे मामले को दो धु्रवों में बांटा। एक चमचे और दूसरा मोर्चे। उन्होंने कहा कि ऐसे में कुछ भी कहना जोखिम से भरा हुआ है क्योंकि तब दोनों पक्ष आप पर टूट पड़ेंगे। ऐसे में अगर उच्च स्तर की न्यायपालिका भी उतनी ही अधिक ध्रुवीकृत नजर आने लगे तो हालात और अधिक संकटपूर्ण हो जाते हैं। यह हमारे भीतर की सबसे बड़ी चुनौती है। न्यायाधीशों की नाराजगी इस बात पर होनी चाहिए। इसीलिए न्यायपालिका को न्यायाधीशों से बचाने की जरूरत है। यहां कोई एक व्यक्ति दुश्मन नहीं है। न्यायपालिका बाहरी वायरस तो चिह्नित कर रही है जबकि यह संस्था स्वयं आंतरिक बीमारी से ग्रस्त है। ऐसी बीमारी जो उसे भीतर से खोखला कर रही है। आप इस फैसले की अधिकांश बातों से सहमत होंगे। 
 
पहला, जनहित याचिका का दुरुपयोग हो रहा है। लोगों ने राजनीतिक, व्यक्तिगत और विचारधारात्मक लड़ाइयों को अदालतों में लड़कर अपना करियर बना लिया। दूसरा, न्यायाधीश झूठ नहीं बोलते। कम से कम चार लोग मिलकर तो नहीं ही बोलते। तीसरा, यह कहना गलत है कि एक व्यक्ति पूरी न्यायपालिका को नियंत्रित करता है। यह असंभव है। अब बात करते हैं तथ्यों की। जिस दिन यह फैसला दिया गया, उस सुबह अखबारों में खबर थी कि बंबई उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए महाराष्ट्र में होने वाले आईपीएल मैचों में पानी के इस्तेमाल की सीमा तय कर दी। एक खेल के मैदान से किसानों के लिए कितना पानी बचा होगा इसे भूल भी जाएं तो सवाल यह है कि क्या वाकई इतने अहम मामलों के होते हुए माननीय न्यायालय को एक क्रिकेट लीग से जुड़ी जनहित याचिका पर विचार करना चाहिए? आप कभी न्यायाधीश के इरादे पर सवाल नहीं उठा सकते क्योंकि ऐसा करके आप उनकी बुद्धिमता पर सवाल उठाएंगे। लोया से जुड़े फैसले में कहा गया कि जनहित याचिका लोगों के लिए सुर्खियां बटोरने का जरिया हो गई है। क्या न्यायाधीश आईने में देखेंगे और खुद से पूछेंगे कि क्या वे खुद इस आकर्षण के शिकार नहीं? मेरे सहयोगी मनीष छिब्बर उच्च न्यायपालिका पर करीब नजर रखते हैं। उनकी मदद से मैंने कुछ रोचक उदाहरणों की छोटी सी सूची बनाई है। 
 
बीसीसीआई ने तकरीबन साल भर पहले भारतीय क्रिकेट का संचालन सर्वोच्च न्यायालय के हाथ में छोड़ दिया है। हाल ही में देश के प्रधान न्यायाधीश जो क्रिकेट पीठ के अध्यक्ष भी हैं, उन्होंने एक अन्य जनहित याचिका स्वीकार कर ली जो खेल में सट्टेबाजी और जुए को वैध करने से संबंधित है। प्रधान न्यायाधीश बनने से पहले वह यह निर्णय दे चुके हैं कि सिनेमा हॉल में अनिवार्य तौर पर राष्ट्रगान बजाया जाएगा। बाद में इस फैसले को रोक दिया गया। ये सभी घटनाएं सुर्खियों में रहीं। किसी को याचियों का नाम याद नहीं। तो सुर्खियों में आने की कोशिश का आरोप उन पर ही क्यों? लोया मामले पर फैसले के अगले दिन भी प्रधान न्यायाधीश के समक्ष मौजूद 43 मामलों में से 12 जनहित याचिकाएं थीं। कुछ और: एक जनहित याचिका कोहिनूर को ब्रिटेन से बाहर लाने से संंबंधित है, एक अन्य संता-बंता के चुटकुलों पर रोक से। पोर्न देखने को अपराध घोषित करना, स्कूलों में योग अनिवार्य करना आदि सब जनहित याचिका के विषय हैं। इन्हें क्यों स्वीकार किया गया? देश के नागरिकों के लिए अंतिम बचाव के रूप में जनहित याचिका सन 1980 के दशक के मध्य में अस्तित्व में आई। तब से अब तक कई न्यायाधीशों ने इसके दायरे और पहुंच में विस्तार किया है। इसके साथ ही उनका क्षेत्राधिकार और शक्तियां भी बढ़ी हैं। इसका असर रोजमर्रा के कामकाज पर हुआ है। 
 
राजधानी नई दिल्ली में हवा की गुणवत्ता सुधारने संबंधी अधिकारप्राप्त समिति करीब 20 वर्ष पहले गठित की गई थी। 18 प्रधान न्यायाधीशों से होता हुआ यह सिलसिला अब तक जारी है और हवा की गुणवत्ता और खराब हुई है। अवैध निर्माण से जुड़ी समिति का भी यही हश्र हुआ। परंतु लोग इनका दोष राजनेताओं पर डालते हैं। लब्बोलुआब यह है कि जनहित याचिकाओं का अत्यधिक इस्तेमाल किया जा रहा है लेकिन इसमें न्यायाधीश भी बराबर दोषी हैं। दूसरी दलील यह थी कि न्यायाधीश झूठ नहीं बोलते। कम से कम चार वरिष्ठ जिला न्यायाधीश एकसाथ तो झूठ नहीं ही बोलते। क्या यही बात सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों पर लागू नहीं होती जिन्होंने देश के न्यायिक क्षेत्र को लेकर कुछ गंभीर टिप्पणियां की थीं। क्या उनकी बातों और चिंताओं को खारिज कर दिया जाना चाहिए जबकि महाराष्ट्र के न्यायधीशों की बात मान ली जाए? मैं यह नहीं कह रहा हूं कि जिला न्यायाधीश झूठ बोल रहे हैं। परंतु मैं यह कैसे मानूं कि सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों की चिंता गलत है। उनके सवालों पर बहस होनी चाहिए और आत्मावलोकन किया जाना चाहिए। 
 
न्यायिक अधिकार क्षेत्र का यह विस्तार, न्यायपालिका की उसी जनहित याचिका की मदद से सुर्खियों में बने रहने की प्रवृत्ति और अपना घर ठीक करने में उसकी नाकामी, इन सभी ने मिलकर इस संस्थान को बाहरी लोगों से अधिक नुकसान पहुंचाया है। जब न्यायाधीश ही बंटे हुए हैं तो अधिवक्ताओं और वादियों से क्या अपेक्षा की जाए। अहम बात यह है कि आप हवा की गुणवत्ता सुधारने और क्रिकेट का संचालन करने में व्यस्त हैं और कार्यपालिका आपकी नियुक्तियों को लंबित करके आपके साथ खेल कर रही है। संस्थानों के बीच मामूली तनाव ठीक है लेकिन अगर उनमें से एक बेहद कमजोर हो जाए तो दूसरा उसकी जगह हथियाने लगता है। यही हो रहा है। न्यायाधीश लड़ रहे हैं और नेता हंस रहे हैं। यहां बात आती है फैसले के तीसरे बिंदु की। यह कहना गलत है कि एक व्यक्ति न्यायपालिका को नियंत्रित कर सकता है। सैद्धांतिक तौर पर इसमें विवाद नहीं, पर हकीकत में हम ऐसे हालत से गुजर चुके हैं। बस वह पुरुष नहीं एक महिला इंदिरा गांधी थीं। उस वक्त एच आर खन्ना के रूप में एक महान न्यायाधीश के साहस ने हमें उस स्थिति में पहुंचने से बचाया था जिसमें आज तुर्की है। वर्ष 2018 के भारत को ऐसे कई न्यायाधीशों की आवश्यकता है क्योंकि चुनौतियां केवल बाहर से नहीं भीतर से भी हैं।
 
Keyword: supreme court, justice, dipak mishra,,
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