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सुधार की राह

संपादकीय /  April 20, 2018

नया वित्त वर्ष हर लिहाज से सुधार का वर्ष होगा। अर्थव्यवस्था भी तमाम उथलपुथल के बाद सामान्य परिस्थितियों की ओर लौट रही है। उम्मीद की जा रही है कि अर्थव्यवस्था की वृद्घि दर वित्तीय संकट के बाद आम हो चली 7 फीसदी से बेहतर रहेगी। बीते 10 वर्ष में से पांच वर्ष के दौरान वृद्घि दर 7 फीसदी से कम रही है। तीन वर्षों के दौरान यह दर 8 फीसदी के स्तर पर या उससे अधिक थी। उन तीन वर्षों में से एक साल तो दो अंकों में वृद्घि देखने को मिली। आर्थिक नीति का लक्ष्य होना चाहिए स्पष्टï गतिशीलता के साथ बेहतर वृद्घि दर हासिल करना। 

बीते एक दशक के दौरान आर्थिक हालात का जिक्र वर्ष 2008 के वित्तीय संकट को संदर्भित करके किया जाता रहा है। उसके बाद हुआ तेज सुधार और तेल कीमतों में आया उतार-चढ़ाव जिसने पहले वृद्घि पर नकारात्मक असर डाला और बाद में इसे गति प्रदान की। हमें एक के बाद एक लगातार सूखे का सामना भी करना पड़ा जिससे कृषि पर असर पड़ा। केवल पिछले एक साल की मंदी को ही सरकार के कदमों की वजह से उत्पन्न माना जा सकता है। इस परिदृश्य में देखें तो वर्ष 2018-19 सामान्य से बेहतर हो सकता है और इस वर्ष आर्थिक वृद्घि सामान्य से बेहतर होनी चाहिए। 


मुद्रास्फीति भी मौद्रिक नीति द्वारा तय दायरे के भीतर है। मॉनसून के सामान्य रहने का अनुमान जताया गया है। तेल कीमतों में इजाफा हुआ है लेकिन इसमें और अधिक बढ़ोतरी होने की आशंका नहीं है। राजकोषीय मोर्चे पर कुछ शिथिलता देखने को मिली है लेकिन बहुत अधिक नहीं। व्यापार घाटा बढ़ रहा है और पूंजी की आवक में कमी आई है। रुपये पर कुछ दबाव है लेकिन चूंकि मुद्रा स्पष्टï रूप से अधिमूल्यित है इसलिए इस दबाव को भी बहुत असहज नहीं माना जा सकता। चाहे जो भी हो लेकिन कुल मिलाकर आवक ऐसी बनी हुई है कि विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ता रहेगा।   

इस बीच औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ों में पहले ही सुधार देखने को मिला है। नवंबर के बाद से इसमें 7 फीसदी से अधिक की दर से वृद्घि हो रही है जबकि इससे पहले यह दर तकरीबन आधी थी। गैर तेल निर्यात पिछले पांच-छह साल में पहली बार बढ़ा है। ऐसे में यह उम्मीद की जानी चाहिए कि अच्छी खबरों का सिलसिला जारी रहेगा और नए साल में हमें 8 फीसदी के आसपास की वृद्घि दर देखने को मिलेगी। खासतौर पर तब जबकि दुनिया भर में माहौल अच्छा नजर आ रहा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्घि दर 4 फीसदी के आसपास है और वैश्विक व्यापार गिरावट से अच्छी तरह उबर चुका है।

फिर भी अगर 8 फीसदी की वृद्घि की बात नहीं हो रही है तो इसके लिए बैंकों और कंपनियों की समस्याएं जिम्मेदार हैं। वर्ष 2015 के बाद से अत्यधिक ऋण की दोहरी बैलेंस शीट की समस्या पर बहुत अधिक ध्यान दिया गया है। नई दिवालिया प्रक्रिया के जरिये इसे निपटाने की अभी बस शुरुआत ही हुई है। इस काम को सुचारु होने में अभी कुछ वर्ष का समय लगेगा। शुरुआती संकेत कहते हैं कि बड़ी कंपनियों द्वारा लिए गए संकटग्रस्त ऋण का करीब आधा हिस्सा बट्टे खाते में जा सकता है। 

छोटी कंपनियों के मामले में यह प्रतिशत और बड़ा होगा। अगर कर्ज की प्रोविजनिंग सही ढंग से हुई तो बैंकों को मौजूदा ऋण की समस्या में अब अतिरिक्त परेशानी का सामना शायद ही करना पड़े। कंपनियों की बात करें तो कहा जा रहा है कि 10 में से 4 कंपनियां अपने ऋण का ब्याज तक चुकाने की स्थिति में नहीं हैं। उनकी तकदीर आर्थिक स्थिति में सुधार, राजस्व वृद्घि और सुधरे हुए मार्जिन पर निर्भर करती है। इनके बारे में काफी समय से चर्चा चल रही है और शायद नए साल में ये फलीभूत हों।

इस बीच, बैंकों के प्रबंधन के मसले, खासतौर पर सरकारी बैंकों के प्रबंधन के मसले हल होने हैं। गत वित्त वर्ष के अंत में बैंकों ने कुछ सुधार करते हुए ऋण वृद्घि के 10.3 फीसदी होने की बात कही लेकिन फरवरी के मध्य में यह दर तकरीबन इससे आधी थी। इससे पता चलता है कि ऋण के मोर्चे पर वास्तविक स्थिति क्या है। ऋण में होने वाली वृद्घि कंपनियों के नहीं बल्कि व्यक्तिगत ऋण में हो रही है। जाहिर सी बात है कि वित्तीय व्यवस्था अभी भी अर्थव्यवस्था की राह में बाधा है। बैंकिंग व्यवहार, नियमन और निगरानी में सुधार की सख्त आवश्यकता है। इसके अलावा वह सांठगांठ खत्म करनी होगी जो समस्या की वजह है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो 8 फीसदी की दर की उम्मीद छोडऩी होगी।
Keyword: वित्त वर्ष, अर्थव्यवस्था, आर्थिक हालात,
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