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संसाधनों के वितरण की मुश्किलों से भरी दुनिया

अजय छिब्बर /  April 19, 2018

राज्यों में संसाधनों के वितरण का आधार तय करने के लिए 15वें वित्त आयोग को जो विचारार्थ विषय दिए गए हैं, वे कई चिंताओं को जन्म दे रहे हैं। बता रहे हैं अजय छिब्बर

 
पंद्रहवें वित्त आयोग को अनगिनत समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। 'सहकारी संघवाद' की तरफ बढ़ाए गए कुछ सकारात्मक कदमों के बाद वित्त आयोग के समक्ष पीछे जाने का जोखिम मंडरा रहा है। 14वें वित्त आयोग ने राज्यों के बीच वित्त के बंटवारे का जो फॉर्मूला सुझाया था उसे सरकार ने जल्द और पूरी तरह स्वीकार कर लिया था। उससे सहकारी संघवाद की तरफ सकारात्मक कदम बढ़ाने के संकेत मिले थे। राज्यों को निर्देश देने वाली संस्था माने जाने वाले योजना आयोग का वजूद खत्म हो जाने और उसके स्थान पर नीति आयोग के गठन को भी सहकारी संघवाद की दिशा में एक और सकारात्मक कदम के तौर पर देखा गया था। उसके बाद वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के संचालन के लिए गठित जीएसटी परिषद ने भी सहकारिता की भावना को काफी मजबूती देने का काम किया।
 
लेकिन 15वें वित्त आयोग के विचारार्थ विषय ने सहकारिता की उस भावना पर ही संदेह पैदा कर दिया है। सबसे ज्यादा विवादास्पद मसला संसाधनों के बंटवारे का आधार 1971 के बजाय 2011 की जनगणना को बनाने का निर्देश है। पहली नजर में तो जनगणना के नवीनतम आंकड़ों का इस्तेमाल तर्कसंगत लगता है। दरअसल 14वें वित्त आयोग ने अपनी गणनाओं में 2011 की जनगणना के कुछ आंकड़ों का इस्तेमाल कर इसकी बुनियाद रख दी थी। लेकिन राज्यों के बीच संसाधनों के बंटवारे का समूचा आधार 2011 की जनगणना को ही बनाए जाने से दक्षिणी राज्यों में अधिक चिंता देखी जा रही है। उन राज्यों में उत्तरी राज्यों की तुलना में जनसंख्या वृद्धि दर कम रही है। उत्तर-पूर्वी राज्यों और पश्चिम बंगाल में भी जनसंख्या वृद्धि दर में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिली है। इस वजह से उनकी यह शिकायत काफी हद तक वाजिब लगती है कि इस तरह उन्हें तीव्र विकास और बेहतर शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के चलते जनसंख्या वृद्धि दर में कमी लाने की कीमत चुकाने को कहा जा रहा है।
 
तीव्र एवं धीमी जनसंख्या वृद्धि दर वाले राज्यों के बीच व्याप्त तनाव को कम करने के लिए कुछ रचनात्मक विकल्पों के बारे में विचार किया जा सकता है। एक विकल्प तो यह है कि जनसंख्या वृद्धि दर में कमी लाने वाले राज्यों को कुछ क्रेडिट दिया जाए। इससे वे राज्य भी जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रोत्साहित होंगे जहां प्रजनन दर अब भी अधिक है। दूसरा विकल्प यह है कि अपनी सीमा के भीतर अधिक प्रवासी श्रमिकों वाले राज्यों को क्रेडिट दिए जाएं। यह एक गलत धारणा है कि अंतरराज्यीय प्रवास की तुलना में अंत:राज्यीय प्रवास काफी अधिक होता है। वर्ष 2016-17 की आर्थिक समीक्षा की मानें तो अंतरराज्यीय प्रवास को बहुत ही कमतर करके आंका जाता है। वर्ष 2001-2011 के दशक में करीब छह करोड़ लोगों ने दूसरे राज्य में प्रवास किया और यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में 1971 से 2001 के बीच अंदरूनी प्रवास वाले राज्यों को क्रेडिट देने का तरीका अपनाया जा सकता है। इससे उन राज्यों को कुछ प्रोत्साहन मिलेगा जहां दूसरे राज्यों से प्रवासी आ रहे हैं। इस अतिरिक्त संसाधन से वे राज्य प्रवासियों को बेहतर सुविधाएं मुहैया करा सकते हैं।
 
आयोग के विचारार्थ विषय से पैदा दूसरी समस्या आयोग को किया गया वह अनुरोध है जिसमें 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों से बढ़े संसाधन वितरण के बोझ का केंद्र सरकार के वित्त पर पड़े प्रभाव का आकलन करने को कहा गया है। न्यू इंडिया 2022 और राष्ट्रीय विकास कार्यक्रम की मौजूदा योजनाओं के संदर्भ में केंद्र पर पडऩे वाले वित्तीय बोझ की भी समीक्षा वित्त आयोग को करनी है। क्या इससे यह अहसास होता है कि सरकार पहले स्वीकृत किए जा चुके संसाधन वितरण पर पुनर्विचार कर रही है? ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे कुछ देशों ने कुछ हद तक विकेंद्रीकरण को बहाल करने की कोशिशें की हैं।
 
भारत में इस तरह का रवैया अपनाना अनुत्पादक होगा क्योंकि 2014 के संसाधन वितरण से राज्यों को आवंटित कुल फंड में कोई बदलाव नहीं हुआ था, केवल बंटवारे का तरीका बदला था। जहां पहले फंड को केंद्र की प्रमुख योजनाओं से जोड़ा गया था वहीं अब उसे बिना किसी बंधन के राज्यों को सौंप दिया जाता है ताकि वे अपने हिसाब से उसे खर्च कर सकें। 15वें वित्त आयोग के विचारार्थ विषयों में जिस तरह न्यू इंडिया 2022 अभियान का जिक्र है वह इसे एक बार फिर केंद्र-प्रायोजित योजनाओं की तरफ जाने का इशारा करता है। यानी नई बोतल में पुरानी शराब परोसने की तैयारी है। 
 
तीसरी चिंता, वित्त आयोग से यह अनुरोध किया गया है कि वह 'लोकलुभावन' उपायों पर किए जाने वाले व्यय पर नियंत्रण का परीक्षण करे। बिहार और पंजाब जैसे राज्यों में बढ़ते राजकोषीय घाटे से जन्मी चिंताओं को देखते हुए राज्यों का जरूरत से अधिक खर्च करना निश्चित रूप से बड़ी चिंता का विषय है। हालांकि आयोग के विचारार्थ जो मुद्दा दिया गया है उसमें लोकलुभावन कदमों की कोई व्याख्या नहीं की गई है लिहाजा यह काफी हद तक व्यक्तिपरक ही होगा। कौन फैसला करेगा कि अमुक कार्यक्रम लोकलुभावन है या वास्तव में उसकी आवश्यकता है? इसके साथ ही केंद्रीय बजट में मौजूद लोकलुभावन प्रावधानों के बारे में क्या रुख होगा? क्या आयोग उसके बारे में भी विचार करेगा? पहले भी जब राज्यों को वित्त व्यय करने के तरीके बताने की कोशिश की गई है तो उसके नतीजे अच्छे नहीं रहे हैं। सहकारी संघवाद की भावना के तहत राज्य सरकारों को अपनी पसंद के मुताबिक ही व्यय करने की छूट दी जानी चाहिए ताकि मतदाता उसके प्रदर्शन के आधार पर उसका मूल्यांकन कर सके।
 
आखिरकार, वित्त आयोग को कारोबारी सुगमता को बढ़ावा देने के तरीके सुझाने को भी कहा गया है। सुगमता सूचकांक के साथ कई समस्याएं जुड़ी हुई हैं क्योंकि इसमें हमेशा कारोबारी गतिविधियों पर कम-से-कम नियमन को तरजीह दी जाती है। जहां निवेश आकर्षित करने के लिए राज्यों के बीच प्रतिस्पद्र्धा का होना स्वागत-योग्य है वहीं सभी तरह के नियमन को खत्म करने की राज्यों के बीच होड़ लगना भारत के व्यापक हित में नहीं है। व्यवसाय एवं उद्योग जगत के सर्वेक्षणों पर अधिक सतर्क नजर से पता चलता है कि कारोबारी सुगमता सूचकांक को सुधारने से बेहतर है कारोबार की राह में आ रही अड़चनों को दुरुस्त करना। ये सूचकांक देश के कुछ बड़े शहरों में वकीलों और व्यवसाय सलाहकार ही तैयार करते हैं।
 
मुझे उम्मीद है कि वित्त आयोग के अनुभवी एवं बुद्धिमान सदस्य इन समस्याओं का समाधान निकाल लेंगे और सहकारी संघवाद की भावना को पुष्ट करने में मदद करेंगे। समस्याओं से भरी इस खदान से बच निकलने की रचनात्मक सोच वर्ष 2026 की बड़ी लड़ाई के लिए जमीन भी तैयार करेगी। उस समय राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मसला भी सुलझाने की जरूरत पड़ेगी। फिलहाल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आधार 1971 की जनगणना ही है।
 
(लेखक एनआईपीएफपी के प्रतिष्ठित विजिटिंग प्रोफेसर हैं)
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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