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पेट्रोलियम पदार्थों का बढ़ता आयात घटता निर्यात चिंता की बात

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  04 17, 2018

वित्त वर्ष 2017-18 में भारत के वस्तु व्यापार के बारे में पिछले सप्ताह जारी आंकड़े बताते हैं कि भारतीय निर्यात एक साल पहले की तुलना में करीब 10 फीसदी की तेजी के साथ 303 अरब डॉलर तक पहुंच गया। वर्ष 2016-17 में भारतीय निर्यात की वृद्धि दर इसकी करीब आधी यानी पांच फीसदी रही थी। इसके उलट आयात के मोर्चे पर वर्ष 2017-18 में वृद्धि दर काफी अधिक रहते हुए 20 फीसदी तक पहुंच गई जबकि 2016-17 में केवल 0.5 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई थी। निर्यात की तुलना में आयात में हुई तीव्र बढ़ोतरी का ही नतीजा है कि वित्त वर्ष 2017-18 में व्यापार घाटा एक साल पहले की तुलना में 44 फीसदी की तीव्र वृद्धि के साथ 157 अरब डॉलर पर पहुंच गया।

 
व्यापार संबंधी आंकड़ों का अगर बारीकी से विश्लेषण किया जाए और लंबे समय में उनके प्रदर्शन को ध्यान में रखते हुए तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो कहीं अधिक गहरी बात पता चलेगी। मसलन, 2017-18 संबंधी व्यापार आंकड़ों की पिछले कुछ वर्षों से तुलना की जाए तो नीति-निर्माताओं को तीन अहम बातें पता चलेंगी।  पहली, पेट्रोलियम उत्पादों एवं रत्न एवं आभूषण को हटाकर देखें तो भारत का निर्यात प्रदर्शन पिछले वर्षों से बेहतर रहते हुए 200 अरब डॉलर की सीमा को पार कर गया है। तेल निर्यात कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों और रत्न एवं आभूषणों का निर्यात काफी हद तक कीमती पत्थरों, मोतियों एवं सोने की कीमतों के वैश्विक रुझान से निर्धारित होता है। ऐसी स्थिति में पेट्रोलियम उत्पादों और रत्न एवं आभूषण को अलग हटाने के बाद ही भारतीय निर्यात का असली चेहरा सामने आ सकता है। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि तेल एवं रत्न-आभूषण के अलावा अन्य उत्पादों का निर्यात करीब 200 अरब डॉलर का रहा है। वर्ष 2012-13 में यह 196 अरब डॉलर रहा था और उसके अगले दो वर्षों में यह क्रमश: 210 अरब डॉलर और 212 अरब डॉलर तक पहुंच गया। हालांकि वर्ष 2015-16 और 2016-17 के दौरान गैर-तेल एवं गैर रत्न-आभूषण निर्यात हल्की गिरावट के साथ क्रमश: 192 अरब डॉलर और 201 अरब डॉलर पर आ गया था।
 
लेकिन पिछले वित्त वर्ष में तेल एवं रत्न-आभूषण को छोड़कर अन्य उत्पादों का निर्यात उल्लेखनीय तेजी के साथ 223 अरब डॉलर पर पहुंच गया। इस तरह वित्त वर्ष 2016-17 की तुलना में 2017-18 में यह निर्यात 11 फीसदी दर से बढ़ा है।  भले ही कुल निर्यात में 10 फीसदी वृद्धि दर के लिहाज से यह वृद्धि खास अधिक न लगे लेकिन हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह तेजी पेट्रोलियम उत्पादों एवं रत्न-आभूषण के बगैर ही हासिल हुई है। क्या इसे अन्य क्षेत्रों के निर्यात स्थिति में आए सुधार के तौर पर देखा जाना चाहिए? चालू वित्त वर्ष में निर्यात को बढ़ाने के लिए इन क्षेत्रों के संवद्र्धन की दरकार होगी।
 
दूसरी, पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से भारत को हुई आय कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में हुई बढ़ोतरी के प्रभावों को समुचित तौर पर परिलक्षित नहीं करती है। कच्चे तेल की कीमतों में 2014 के बाद बड़ी तेजी से गिरावट आई थी लेकिन 2017 से यह दोबारा बढऩे लगीं। पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात वर्ष 2017-18 में करीब नौ फीसदी दर से बढ़ा था जबकि 2016-17 में इसकी वृद्धि केवल तीन फीसदी ही रही थी। इसके बावजूद कच्चे तेल के आयात में हुई तीव्र बढ़ोतरी की तुलना में पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात काफी कम रफ्तार से बढ़ा है। भारत का कच्चा तेल आयात वर्ष 2016-17 में पांच फीसदी दर से ही बढ़ा था लेकिन 2017-18 में यह 26 फीसदी की जबरदस्त तेजी पर रहा है। 
 
भारत के लिए यह एक बड़ी पहेली है। भारत से निर्यात किए जाने वाले पेट्रोलियम उत्पादों में वे उत्पाद शामिल हैं जो कच्चे तेल को शोधित कर तैयार किए जाए हैं। ऐसी स्थिति में अधिक कच्चा तेल आयात किए जाने पर शोधित पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात भी बढऩा चाहिए लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। कच्चे तेल का आयात पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात की तुलना में काफी तेजी से बढ़ रहा है। सवाल उठता है कि कच्चे तेल के आयात की तुलना में भारतीय पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात उतनी तेजी से क्यों नहीं बढ़ रहा है? कहीं इसकी वजह यह तो नहीं है कि भारत के तेल आयात में पिछले साल तीव्र वृद्धि हुई थी?
 
और तीसरी बात, वित्त वर्ष 2017-18 में भारत ने 34 अरब डॉलर का सोना आयात किया था जो एक साल पहले की तुलना में 24 फीसदी अधिक है। हालांकि इसके पहले के दो साल भारतीय स्वर्ण आयात में गिरावट देखी गई थी। सरकार पेट्रोलियम उत्पादों को नियंत्रित करने की दिशा में शायद ही कुछ खास कर सकती है लेकिन पुराने अनुभव बताते हैं कि सोने के आयात पर लगाम लगाने की कोशिशें नतीजा देती हैं। वर्ष 2012-13 में जो स्वर्ण आयात 54 अरब डॉलर का रहा था वही एक साल बाद ही घटकर 27 अरब डॉलर पर आ गया था। उसके बाद के साल में सोने का आयात फिर बढ़ गया लेकिन 2014-15 में यह 32 अरब डॉलर पर खिसक आया था। इस तरह सोने के आयात में उठापटक देखी जाती रही है।  चालू वित्त वर्ष 2018-19 में सोने के आयात में 10 फीसदी बढ़ोतरी का अनुमान रखा गया है। अगर इसी के साथ पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में वृद्धि दर सुस्त रहे और कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव ऐसे ही चढ़ते रहें तो सरकार को अपने भुगतान संतुलन पर पडऩे वाले मध्यावधि असर को लेकर फिक्रमंद होना पड़ सकता है।
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