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छात्रों के भविष्य से छलावा

ऋत्विक शर्मा /  04 16, 2018

दिल्ली में सरकारी मदद से चलने वाले एक स्कूल की 12वीं कक्षा के छात्र आकाश सिंह कुछ हफ्ते पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सामने प्रदर्शन करते हुए उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग कर रहे थे जिन्होंने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की परीक्षा के पर्चे लीक किए। 12वीं कक्षा के अर्थशास्त्र के पर्चे 26 मार्च को होने वाली परीक्षा से पहले ही लीक हो चुके थे। ये परीक्षाएं रद्द किए जाने के बाद आकाश जैसे लाखों छात्रों को एक महीने तक दबाव में रहना पड़ रहा है क्योंकि अब 25 अप्रैल को नए सिरे से परीक्षा होगी। आकाश कहते हैं, 'इससे हमारा समय खराब हो रहा है और तैयारी की तारतम्यता भी प्रभावित हो रही है। परीक्षा के बाकी विषयों के पर्चे तो अच्छे गए हैं लेकिन एक महीने के बाद परीक्षा होने से प्रदर्शन पर असर पड़ सकता है।'

 
सीबीएसई परीक्षा के दौरान 10वीं कक्षा के गणित के पर्चे और 12वीं कक्षा के अर्थशास्त्र के पर्चे लीक होने के बाद सोशल मीडिया पर कई घंटों तक वे पर्चे घूमते रहे लेकिन उसके बाद भी परीक्षा संपन्न हुई। हालांकि बाद में बोर्ड ने दोबारा परीक्षा लेने का फैसला किया और पर्चा लीक करने के आरोप में कई लोगों को गिरफ्तार भी किया जा चुका है। साथ ही सीबीएसई के एक अधिकारी को 'लापरवाही' बरतने के लिए निलंबित भी किया जा चुका है।  परीक्षा देने वाला छात्रों और उनके अभिभावकों का इस बात पर हंगामा खड़ा करना लाजिमी था। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी पर्चा लीक को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ट्विटर पर मजाक उड़ाया जिन्होंने परीक्षार्थियों को प्रोत्साहित करने के मकसद से 'एक्जाम वॉरियर्स' शीर्षक वाली किताब लिखी थी। इसके अलावा सीबीएसई की प्रमुख अनीता करवाल और मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से इस्तीफे की भी मांग की गई जिन्होंने एक हैकाथन में छात्रों से पेपर लीक की समस्या को सुलझाने के लिए सुझाव मांगे थे। दिल्ली पुलिस का कहना है कि अर्थशास्त्र का पर्चा लीक होने के मामले को सुलझा लिया गया है। इस मामले में एक शिक्षक, क्लर्क और हिमाचल प्रदेश के उना के एक सरकारी स्कूल कर्मचारी को गिरफ्तार किया गया है। 12वीं कक्षा के छात्रों को पेपर लीक के बारे में शिकायत करने के बजाय 25 अप्रैल को होने वाली पुनर्परीक्षा की तैयारियों की चिंता करनी होगी।
 
सीबीएसई की प्रवक्ता रमा शर्मा ने यह माना है कि व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल बढऩे से नई तरह की चुनौतियां बढ़ रही हैं। लेकिन बोर्ड ने अपने सुरक्षित तंत्र के जरिये विश्वसनीयता हासिल की है और इसका मकसद नए प्रयोगों और तकनीक के जरिये नए दौर की समस्याओं को दूर करना है। जब उनसे बोर्ड के संभावित कदमों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने गोपनीयता का हवाला देते हुए ब्योरा देने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि मंत्रालय के एक पूर्व सचिव की अगुआई में उच्च स्तरीय समिति गठित की गई है जो तकनीक के जरिये सुरक्षित प्रक्रिया अपनाए जाने के बारे में सुझाव देगी।
 
विशेषज्ञों का कहना है कि पेपर लीक की ये घटनाएं सीबीएसई के भीतर मौजूद गंभीर खामियों की नहीं बल्कि गंभीर सामाजिक परेशानियों की ओर इशारा करते हैं। सीबीएसई पेपर लीक का मामला उस वक्त सामने आया जब फरवरी में हुए कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) के परीक्षा के पर्चे लीक होने के मामले में दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन चल रहे थे। केंद्रीय मंत्रालयों और अधीनस्थ विभागों में गैर-राजपत्रित नौकरियां पाने की ख्वाहिश रखने वाले छात्रों को एसएससी की परीक्षा से काफी उम्मीदें थीं लेकिन उसका प्रश्न-पत्र लीक हो जाने से उनमें काफी रोष था। मीडिया में यह खबर आई थी कि नकल कराने वाले रैकेट का भंडाफोड़ पुलिस ने किया। 
 
पुलिस को उम्मीद है कि सीबीएसई प्रकरण में गिरफ्तारियों का हतोत्साहित करने वाला प्रभाव होगा। दिल्ली के प्रवक्ता दीपेंद्र पाठक कहते हैं, 'संस्थानों में इस तरह की कमियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इस वक्त यह कमोबेश अपराध का निजी मामला दिखता है। समय के लिहाज से देखें तो इसका असर सीमित था। अगर उन्होंने कुछ वक्त पहले पर्चे लीक किए होते तो ज्यादा बुरा होता।' उन्होंने कहा कि शिक्षकों, प्रशासकों, अभिभावकों और छात्रों के साथ परीक्षकों के संपर्क की जांच हो रही है। जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है उनमें निजी स्कूल के दो शिक्षक, दिल्ली में एक कोचिंग सेंटर के प्रमुख, छात्र और कोङ्क्षचग सेंटर के कोऑर्डिनेटर्स और झारखंड में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पूर्व पदाधिकारी शामिल हैं। स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता सचिव अनिल स्वरूप का कहना है कि सीबीएसई भले ही इन घटनाओं से बेअसर रह जाए लेकिन इस तरह की घटनाएं चेतावनी के रूप में खड़ी हैं। उन्होंने परीक्षा के दिन ही इनक्रिप्टेड पर्चे की प्रिटिंग और वितरण जैसे विकल्पों का सुझाव दिया है। उन्होंने यह भी कहा है कि इलेक्ट्रॉनिक तरीके से इस पर नजर रखी जा सकती है कि किन लोगों तक उस पर्चे की पहुंच है।
 
शिक्षा का अधिकार कानून, 2009 के लागू होने के बाद से सीबीएसई की 10वीं की परीक्षा निरंतर समग्र मूल्यांकन (कॉन्टिन्युअस कॉम्प्रिहेंसिव इवैल्युएशन) के आधार पर कराती रही है जिसमें छात्रों का मूल्यांकन साल भर के दौरान हुई परीक्षाओं के आधार पर किया जाता था। लेकिन इस साल पहले की तरह ही फाइनल परीक्षा की व्यवस्था की गई है। ऐसे में छात्रों और अभिभावकों की चिंता बढऩा लाजिमी है। नई दिल्ली के पूसा रोड स्थित स्प्रिंगडेल्स स्कूल की प्रधानाचार्य अमिता मुला वाटल का कहना है कि करीब एक दशक से बच्चों की 10वीं की परीक्षा देने की आदत खत्म हो गई थी, ऐसे में सेमेस्टर सिस्टम से अलग होने के बाद अभिभावकों और छात्रों के बीच चिंताजनक स्थिति देखी गई।
 
सीबीएसई में भी सख्त परीक्षा व्यवस्था के विकल्पों पर बातचीत चल रही है। मिसाल के तौर पर बोर्ड ने उन कमरों में सीसीटीवी कैमरा लगाने की बात कही है जहां पर्चे का लिफाफा खोला जाता है। हालांकि वटल का कहना है कि इनमें से कई विचारों को व्यापक तौर पर अव्यावहारिक बताया जाता है। परीक्षा के दिन परीक्षा केंद्र पर ही पेपर डाउनलोड करने और फिर उन्हें प्रिंट करने का सुझाव इसी श्रेणी में शामिल माना जाता है। वटल कहती हैं, 'हम शिक्षा और रोजगार को किस तरह देखते हैं? यह बड़ी तस्वीर है जिस पर सरकार, नागरिक समाज और शैक्षणिक जगत के लोगों को गहराई से ध्यान देना होगा।' उनका मानना है कि इस तरह परीक्षाओं के पर्चों का लीक होना हाल के दशकों में बढ़ी प्रतिस्पद्र्धा से उपजी निराशा, मूल्यों में आई गिरावट, समान शिक्षा-प्रणाली की कमी, समानांतर कोचिंग उद्योग के उभार को दर्शाता है जिनका अस्तित्व टॉपर की संख्या पर निर्भर होता है।
 
देशभर के 18,000 से ज्यादा स्कूलों से संबद्ध सीबीएसई राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा (नेट) जैसी प्रतिस्पद्र्धी परीक्षाओं का भी संचालन करता है। वटल का कहना है कि सीबीएसई छात्रों के शिक्षा स्तर पर सुधार करने से जुड़ी व्यापक चर्चा करने के लिए तैयार है। उनके विचार में पेपर लीक जैसी छिटपुट घटनाओं के मुकाबले यह समस्या काफी गंभीर है। उनका कहना है, 'राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा एक उपयुक्त दस्तावेज है जिसे राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने जारी किया है। हम राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा को दिमाग में रखकर ऐसा पाठ्यक्रम  तैयार कर सकते हैं जिसमें लीक की जरूरत नहीं होगी और अगर लीक हो भी जाए तो इससे फर्क नहीं पड़ेगा।' संपूर्ण और समावेशी शिक्षा व्यवस्था के लिए वह सिफारिश करती हैं कि राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद को ऐसा तंत्र बनाने पर विचार करना चाहिए जिससे छात्रों को स्कूल से कॉलेज तक पहुंचने में कोई बाधा न आ पाए और विश्वविद्यालयों को छात्रों की जांच के लिए 12वीं कक्षा पर पूरी तरह से निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। अखिल भारतीय अभिभावक संगठन के अध्यक्ष और वकील अशोक अग्रवाल ने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर अदालत की निगरानी में सीबीएसई पेपर लीक की जांच करने की मांग की थी। उनका मानना है कि सत्तासीन वर्ग में इस तरह की गंभीर समस्याओं मसलन शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षकों की कमी जैसी परेशानियों को हल करने की इच्छाशक्ति का अभाव है। 
 
अग्रवाल कहते हैं, 'गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बड़ी समस्या है। सरकारी स्कूलों के बच्चों के पास बस सर्टिफिकेट रह जाता है असल में वे अशिक्षित ही रह जाते हैं। छात्रों को पढ़ाना और उनके लिए रोजगार मुहैया कराना एक बड़ी समस्या है। निश्चित तौर पर समस्याओं की कमी नहीं है।' स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की बुनियादी सुविधाएं पूरी तरह सरकार पर निर्भर अधिकतर लोगों को मयस्सर नहीं हैं। वहीं सरकारी स्कूलों के प्रति भेदभाव अपने आप में एक समस्या है क्योंकि इन स्कूलों के आधे से ज्यादा शिक्षक पढ़ाने की योग्यता नहीं रखते। वह निराशा भरे स्वर में  कहते हैं, 'जब व्यवस्था नाकाम होती है तब धरना ही सही शिक्षा बन जाता है।'
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