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फर्जी खबरों से जंग के कारगर हथियार

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  04 15, 2018

पिछले हफ्ते सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फर्जी खबरों से संबंधित दिशानिर्देश जारी करने के बाद वापस भी ले लिया। हालांकि यह बिना सोचे-समझे चला गया दांव था लेकिन फर्जी खबर का खतरा तो अब भी कायम है। फर्जी खबरें तकनीक की जानकारी रखने वाले लोगों से भरे कारखानों में तैयार होती हैं। उन खबरों का अकेला मकसद किसी व्यक्ति, दल या संगठन को अपशब्द कहना, नीचा दिखाना और कलंकित करना होता है। अगर फर्जी खबरों से लोकतंत्र को होने वाले नुकसान या हिंसा को जन्म देने में उसकी भूमिका तक ही चर्चा को केंद्रित रखा जाएगा तो उससे कोई लाभ नहीं होगा। भारतीय समाचार उद्योग को इस समस्या का सामना करने के लिए मिलजुलकर प्रयास करने होंगे।

 
ब्रिटेन के रचनात्मक उद्योग ने ऑनलाइन पाइरेसी से निपटने के लिए जो जंग लड़ी थी, उससे दो बेहद महत्त्वपूर्ण सबक मिलते हैं। पहला, धन के स्रोत पर नजर रखना और दूसरा, उपभोक्ताओं को शिक्षित करना। वर्ष 2014 में माइक विदर्ली ने ऑनलाइन पाइरेसी के बारे में दो विमर्श पत्र पेश किए थे। उस समय वह तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के बौद्धिक संपदा सलाहकार और सांसद भी थे। विदर्ली के विमर्श पत्र 'ऑनलाइन आईपी पाइरेसी के खिलाफ संघर्ष में धन के प्रवाह पर नजर' और 'सर्च इंजन एवं पाइरेसी' पर केंद्रित थे। इनमें पाइरेसी वाली वेबसाइट की रैंकिंग घटाकर उन्हें ऑनलाइन सर्च के नाकाबिल बनाने का सुझाव दिया गया था। गूगल ने उसी साल इस सुझाव को वैश्विक स्तर पर लागू कर दिया था। इसका नतीजा यह हुआ कि अगर कोई अधिसूचित साइट ऑनलाइन सर्च में ऊपर आएगी तो गूगल उसे रैंकिंग में नीचे कर देगा ताकि इंटरनेट उपभोक्ता उस साइट तक जल्दी न पहुंच सकें। गूगल की पहल रंग लाई और नकली वेबसाइटों की पहुंच में 50 फीसदी तक कम हो गई। उनका राजस्व भी 25 फीसदी तक गिर गया। फर्जी खबरें परोसने वाली वेबसाइटों की भी रैंकिंग कम करने के बारे में चर्चा होती रही है। नवंबर 2017 में गूगल ने रशिया टुडे और स्पूतनिक को अपनी रैंकिंग में नीचे लाने की घोषणा की थी। इन दोनों वेबसाइट पर अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के दुष्प्रचार और गलत जानकारी को फैलाने का आरोप लगा था। गूगल की स्वामी कंपनी अल्फाबेट के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी एरिक श्मिट ने कहा था कि वह सेंसरशिप के पक्ष में नहीं थे लेकिन साइट रैंकिंग का इस्तेमाल कर इस समस्या से निपटना चाहते थे। हालांकि इस बारे में कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है कि इस व्यवस्था ने वाकई में क्या असर दिखाया?
 
अधिक अहम सवाल यह है कि क्या इस तरह का इंतजाम भारत में कारगर साबित होगा? इससे सर्च के दौरान अचानक सामने आने वाली वेबसाइट पर लगाम लगाने में मदद मिल सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान मैसेडोनिया के वेलेस से संचालित होने वाली साइटों ने पॉपअप के जरिये रोजाना 2,000 से लेकर 2,500 डॉलर तक कमाए। ये वेबसाइटें बिल क्लिंटन को हत्यारा बताने जैसे तमाम फर्जी खबरें फैलाने में लगी हुई थीं। फरेब एवं झूठ से भरी खबरें परोसने वाली इन वेबसाइटों की हेडलाइन इतनी उकसाऊ होती थी कि लाखों लोग उन्हें क्लिक कर देते थे। अधिक क्लिक बटोरने में सफल रहीं वेबसाइटों को ऑटोमेटेड नेटवर्क से विज्ञापन राजस्व भी मिलता था। ऑटोमेटेड नेटवर्क विज्ञापन देने के मामले में एक तरह से अंधे शख्स जैसा बरताव करते हैं। 
 
लेकिन राजनीतिक दलों से पोषित और दुष्प्रचार फैलाने के लिए लगाई गई वेबसाइटों पर कैसे लगाम कसी जाए? ऑनलाइन सर्च में डीरैंकिंग व्यवस्था का कारगर तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो दुष्प्रचार फैलाने में लगीं वेबसाइट नौवें या दसवें पेज तक खिसक जाएंगी। हालांकि इसके लिए उपभोक्ताओं और विज्ञापनदाताओं को शिक्षित करना जरूरी होगा।  मीडिया व्यवहार के बारे में साक्षरता पैदा करना भले ही अकादमिक लगे लेकिन असली घटनाओं और फर्जी खबरों में फर्क कर पाने की काबिलियत से आने वाली पीढिय़ों को गहरे संघर्ष एवं आघात से बचाया जा सकेगा। मसलन, आज के दौर में आल्ट न्यूज, बूम और एसएम हॉक्सस्लेयर जैसी कई वेबसाइट हैं जो तकनीक की मदद से फर्जी खबरों की सच्चाई परखती हैं। खबरें प्रसारित करने वाली वेबसाइट के लिए अपने बारे में पूरी जानकारी देना अनिवार्य हो ताकि वेबसाइट के स्वामित्व, संचालक और वित्तीय स्रोतों के बारे में जानकारी हासिल की जा सके। वेबसाइट के बारे में जानकारी जुटाने के लिए गूगल की भी मदद ली जा सकती है। आप यह दलील दे सकते हैं कि पेशेवर संपादकों एवं पत्रकारों के लिए ऐसा करना ज्यादा आसान है। लेकिन इसकी वजह यह है कि मीडिया जागरूकता होने से वे लोग ऐसा करते हैं। 
 
सरकार एक औचक आदेश लाने के बजाय भारतीय प्रेस परिषद, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन, शीर्ष मीडिया शिक्षण संस्थानों और बुद्धिजीवियों को मीडिया साक्षरता कार्यक्रम चलाने के लिए कह सकती है। बड़े होते बच्चों को उनके स्कूल में मीडिया साक्षरता दी जानी चाहिए। इसके अलावा समाचार के स्रोतों- टेलीविजन, प्रिंट, ऑनलाइन और रेडियो पर अनवरत विज्ञापन अभियान भी चलते रहना चाहिए। इसी तरह का जागरूकता कार्यक्रम विज्ञापनदाताओं के लिए भी चलाया जाना चाहिए ताकि फर्जी खबरें देने वाली साइटों पर उनके विज्ञापन पाए जाने पर उनकी ब्रांड सुरक्षा और छवि को नकारात्मक रूप में दर्शाया जा सके।
 
भारत ने पहले इस तरह के कई मुश्किल सवालों का हल निकाला है। मतदान प्रतिशत को बढ़ाने के लिए भारत ने उसे लोगों के सम्मान एवं प्रतिष्ठा के विषय के तौर पर पेश कर उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की थी। अगर समाचार उद्योग लोगों को विश्वसनीय एवं तथ्यपरक खबरों से जोड़े रहने के लिए एकजुट नहीं होता है तो उन लोगों के फर्जी खबरों के दर्शक-पाठक बन पाने से रोक पाने में नाकामी के लिए वह किसी और को दोषी नहीं ठहरा सकता है। 
Keyword: fake news, narendra modi,,
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