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कर्नाटक में भाजपा और कांग्रेस के अपने-अपने द्वंद्व

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  April 13, 2018

इसे गुटबाजी कहना अपेक्षाकृत परिष्कृत शब्द माना जाएगा। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस दोनों ही दलों में खुलकर सामने आ चुके इस संघर्ष को ऐलान-ए-जंग कहा जाना चाहिए। इसकी वजह यह है कि दोनों दलों के मौजूदा विधायक अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए दोबारा उम्मीदवार बनाए जाने की दावेदारी नकारे जाने से गुस्से में हैं। दोनों दल संभवत: जीतने की क्षमता को ध्यान में रखते हुए इन विधायकों के टिकट काट रहे हैं। कांग्रेस के उम्मीदवारों की पहली सूची जारी होने से पहले ही पार्टी के भीतर बने गुट तमाम संभावित नामों को लेकर व्हाट्सऐप और अन्य सोशल प्लेटफॉर्म पर आपत्ति दर्ज करने लगे। मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने इसे फर्जी खबरों का दायरा भारतीय चुनाव तक पहुंच जाने का प्रतीक बताते हुए तंज भी कसा। उन्होंने यह साफ करने की कोशिश की कि सोशल मीडिया में जारी उम्मीदवारों की कथित सूची में बताए जा रहे नाम सही नहीं हैं। 

 
दूसरी तरफ भाजपा ने 72 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की लेकिन उसकी लड़ाई कुछ अलग ही है। उम्मीदवारों की सूची में अपना नाम नहीं पाने वाले नेता आक्रोश में हैं और उनका दावा है कि टिकट बांटने में पैसे और जातिगत भावनाओं का खेल खूब चला है। इन दोनों प्रमुख दलों में टिकट को लेकर जो गुस्सा देखा जा रहा है, उससे एक बात तो जाहिर होती है कि दोनों ही दलों के समर्थकों को यह लग रहा है कि उन्हें मई में बनने वाली नई सरकार का हिस्सा बनने का मौका छिना जा रहा है। लेकिन दोनों दलों में गुटबाजी के जन्म लेने के कुछ संरचनात्मक कारण भी हैं।
 
यह काफी कुछ दो कंपनियों के विलय एवं अधिग्रहण से मिलता-जुलता है। आखिर विलय एवं अधिग्रहण के प्रयास अधिकतर नाकाम क्यों होते हैं? इसकी वजह यह है कि एक साथ आईं दो कंपनियों की कार्य संस्कृति, प्रबंध शैली, लक्ष्य एवं नजरिया अलग होता है और उनके मौजूदा अधिकारी अपनी वरिष्ठता को लेकर खतरा भी महसूस करते हैं। उसी तरह राजनीतिक दलों के लिए भी अपने असंतुष्ट धड़ों एवं समूहों को पाला बदलने और दूसरे दल में शामिल होने की इजाजत देकर आगे बढऩे की जरूरत है। समस्या तब खड़ी होती है जब नए समूह मौजूदा प्रभावी समूहों को धमकाने या उनकी जगह लेने की कोशिश करते हैं।
 
सिद्धरमैया का ही उदाहरण लीजिए। उन्होंने जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) का दामन छोड़कर 2006 में कांग्रेस से नाता जोड़ा था। जेडीएस में रहते हुए उन्होंने हर वह काम किया जो कांग्रेस को नागवार गुजरता था: खुलकर एवं कभी-कभी असम्मानजनक तरीके से जातिगत अपील करना, पिछड़े वर्गों को सशक्त करने की बात करना और सबसे बढ़कर अपने समर्थकों का झुंड खड़ा करना। कांग्रेस के पास एस एम कृष्णा जैसे संभ्रांत शहरी परिवेश वाले नेता थे। उनके पाले में कई समाजवादी रुझान वाले नेता भी थे जो रामकृष्ण हेगड़े की अगुआई वाले जनता दल के पतन के बाद कांग्रेस में शामिल हुए थे। उनके लिए सामाजिक समता मायने रखती थी। लेकिन नेहरू के दर्शन में वामपंथी झुकाव रखने वाली मध्यमार्गी परंपरा और धर्मनिरपेक्षता भी समान अहमियत रखती थी। लेकिन कांग्रेस में शामिल होने के बाद सिद्धरमैया का सियासी करियर बहुत तेजी से आगे बढ़ा है। हालांकि इसका एक नतीजा यह भी हुआ है कि लोक नीति की ही तरह विचारधारा को भी महत्त्वपूर्ण मानने वाले लोग खुद को हाशिये पर महसूस करने लगे। स्थानीय स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ता भी अलग-थलग महसूस करने लगे। सिद्धरमैया और उनके समर्थकों के रवैये ने इस सोच को और भी हवा देने का काम किया।
 
सिद्धरमैया एक ऐसे नेता हैं जो काम में यकीन करते हैं जबकि पुराने कांग्रेसी नेता सोच-समझकर काम करना पसंद करते हैं। इस बेमेल साथ ने खेमेबंदी को जन्म दिया है जिसमें हर गुट दूसरे से आगे निकलने की कोशिश में लगा रहता है। भाजपा में भी हालात इससे अलग नहीं हैं। पार्टी के 72 उम्मीदवारों की सूची जारी होते ही खेमेबंदी खुलकर सामने आ गई। भाजपा से अलग होने के बाद कर्नाटक जन पक्ष (केजेपी) का गठन करने वाले बी एस येदियुरप्पा को फिर से अपने साथ लाकर भाजपा ने उन्हें अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार बना दिया है। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में येदियुरप्पा की पार्टी की तरफ से चुनाव लड़ चुके लोगों को इस बार के चुनाव में समायोजित करने की चुनौती भाजपा की मुश्किलें बढ़ा रही है। मसलन, बेलगावी जिले की बेलहोंगल सीट पर केजेपी की तरफ से चुनाव लड़ चुके विश्वनाथ पाटिल इस बार भाजपा का टिकट पाने में सफल रहे हैं जबकि 2013 में भाजपा के उम्मीदवार रहे वरिष्ठ नेता जगदीश मेतगुड को टिकट नहीं मिला है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट की मानें तो मेतगुड के समर्थकों ने पक्षपात का आरोप लगाते हुए येदियुरप्पा के खिलाफ प्रदर्शन किया और उनका पुतला भी जलाया।
 
इसी तरह चित्रदुर्ग जिले के मोलाकल्मुर के मौजूदा विधायक तिप्पेस्वामी का टिकट काट दिया गया है। उनकी जगह भाजपा ने बी श्रीरामुलू को टिकट दे दिया है जिन्हें पहले बेल्लारी के खनन गिरोह का हिस्सा बताते हुए सियासी अछूत माना जा रहा था। हाल ही में एस एम कृष्णा के साथ येदियुरप्पा की आई एक तस्वीर समूची हालत को बयां कर देती है। कुछ महीनों पहले ही भाजपा का दामन थामने वाले कृष्णा उस तस्वीर में अकेले और थोड़ा पीछे की तरफ खड़े नजर आ रहे हैं। कर्नाटक के मुख्यमंत्री और केंद्र में विदेश  मंत्री जैसे अहम पदों पर रह चुके कृष्णा अनमने से खड़े दिखे जबकि येदियुरप्पा का खूब गर्मजोशी से सत्कार हो रहा था। इस तस्वीर को देखकर कृष्णा के परंपरागत समर्थकों को यह पता चल गया होगा कि उनके नेता की इस पार्टी में क्या हैसियत है? कर्नाटक विधानसभा चुनाव का सबसे रोचक पहलू सियासी दिखावा, लुभाने की कोशिश और दूसरे को कमतर करके आंकने की कवायद ही है। उम्मीदवारों की नई सूची जारी होने के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि दोनों दल विभिन्न गुटों से कैसे निपटते हैं? इस खेमेबाजी के शिकार तो उनके अपने उम्मीदवार ही होंगे।
Keyword: karnataka, election, BJP,,
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