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वास्तविक संपदा का शिक्षा से गहरा वास्ता

शंकर आचार्य /  April 13, 2018

मानव पूंजी की दिशा में भारत की तेज प्रगति की संभावनाओं की राह शिक्षा व्यवस्था की दशा ने रोक रखी है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं शंकर आचार्य 

 
राष्ट्रीय आय (मुख्यत: सकल घरेलू उत्पाद) के रुझानों को लेकर किताबों और लेखों की बाढ़ सी आई हुई है। परंतु हमें यह याद रखना होगा कि राष्ट्रीय आय हर वर्ष का एक ऐसा प्रवाह है जो किसी देश की तमाम स्वरूपों वाली उत्पादक संपदा से उत्पन्न होती है। फिर भी बहुत कम ही ऐसा होता है कि हमारा सामना किसी ऐसी किताब या आलेख से हो जो राष्ट्रीय संपदा पर केंद्रित हो। बहरहाल, बीते कुछ महीने इस मामले में सुखद अपवाद रहे हैं। नवंबर 2017 में सुरजीत भल्ला की विचारोत्तेजक और बांध लेने वाली किताब न्यू वेल्थ ऑफ नेशंस प्रकाशित हुई। यह किताब शिक्षा के क्षेत्र में मानव की सामाजिक और आर्थिक प्रगति से संबंधित है। वह कहते हैं, 'आय में अधिक समानता, बुर्जुआ का लोकतंत्रीकरण, आर्थिक वृद्घि और जीवन के बेहतर मानक, गरीबी का उन्मूलन और लैंगिक समता, ये सभी लक्ष्य शिक्षा से हासिल किए गए। यही विभिन्न राष्ट्रों की नई संपदा है।'
 
जनवरी 2018 में विश्व बैंक ने द चेंजिंग वेल्थ ऑफ नेशंस 2018 जारी की। विश्व बैंक की ओर से यह वर्ष 2006 की शृंखला के आधार पर समतुल्य राष्ट्रीय संपदा का तुलनात्मक लेखा प्रस्तुत करने की तीसरी और सबसे व्यापक कोशिश है। इस खंड में मानव पूंजी के अनुमान जुटाए गए हैं। ये आंकड़े और इनका विश्लेषण बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। आश्चर्य की बात है कि भारत में इसकी विषय वस्तु को लेकर कोई खास बातचीत देखने को नहीं मिली। यह स्तंभ उस कमी को दूर करने का प्रयास करेगा। इस अध्ययन में जो आंकड़े और विश्लेषण प्रस्तुत किए गए हैं उसके तरीके को लेकर आपत्तियां करना और उसकी गुणवत्ता पर सवाल उठाना आसान है। उस लिहाज से देखा जाए तो यह कह सकते हैं कि 141 देशों की राष्ट्रीय संपदा का यह अध्ययन सबसे अद्यतन और व्यापक अध्ययन है। राष्ट्रीय संपदा प्रमुख तौर पर तीन श्रेणियों का समुच्चय होती है। राष्ट्रीय संपदा तीन प्रमुख श्रेणियों से मिलकर बनती है: उत्पादित पूंजी और शहरी भूमि (मशीन, इमारतें, उपकरण और आवासीय गैर आवासीय शहरी भूमि), प्राकृतिक पूंजी (ऊर्जा हाइड्रोकार्बन), अन्य प्रमुख खनिज, कृषि भूमि और वन तथा तीसरा, मानव पूंजी (1,500 घरों के सर्वेक्षण के आधार पर एक व्यक्ति की ताउम्र आय का अनुमान)। ध्यान रहे कि इस वांछित आंकड़े में पानी और मत्स्यपालन जैसे अहम संसाधन बाहर हैं।
 
आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो कुछ व्यापक रुझान ऐसे हैं जिन पर टिप्पणी की दरकार है। पहली बात, विभिन्न देशों के समूहों के बीच संपदा का वितरण बहुत कमतर है। कम आय वाले देशों में दुनिया की आठ फीसदी आबादी रहती है जबकि सन 2014 की बाजार विनिमय दर के हिसाब से वैश्विक संपदा का केवल एक फीसदी उनके पास था। जबकि ओईसीडी के अमीर देशों में दुनिया की आबादी का छठा हिस्सा रहता है लेकिन वैश्विक संपदा के दो तिहाई हिस्से पर उनका कब्जा है। ओईसीडी देशों में प्रति व्यक्ति आय गरीब देशों की तुलना में सौ गुना तक अधिक है। इन तुलनाओं के दरमियान एक अहम बात यह है कि विभिन्न देशों के बीच क्रय शक्ति समता के अंतर को लेकर किसी भी तरह का सुधार अनुपस्थित है। एक दलील यह है कि उन मौकों पर ऐसा करना मुश्किल होता है जब अनुमानित आय को परिलक्षित करने वाले संपदा मूल्यांकन की तुलना की जानी हो। भारत समेत निम्र मध्य आय वर्ग वाले देशों में यह गिरावट कम है लेकिन इसका परिमाण बड़ा है। दुनिया की आबादी का 40 फीसदी इन देशों में रहता है लेकिन वैश्विक संपदा का केवल 6 फीसदी इनके पास है। ओईसीडी देशों की प्रति व्यक्ति संपदा निम्र मध्य आय वर्ग के देशों की तुलना में करीब 30 गुना ज्यादा है। यहां तक कि उच्च मध्य आय वाले देशों (चीन समेत) की बात करें तो वैश्विक संपदा में उनकी हिस्सेदारी 22 फीसदी है जो ओईसीडी की 65 फीसदी है। आबादी के मामले में उच्च मध्य आय वाले देश ओईसीडी देशों से दोगुने के लिए जवाबदेह हैं।
 
दूसरा, 47 फीसदी हिस्सेदारी के साथ अल्प आय वाले देशों में प्राकृतिक संसाधन ही सबसे प्रमुख पूंजी हैं। ओईसीडी देशों में इसकी हिस्सेदारी केवल 3 फीसदी है। इसके उलट मानव पूंजी का सीधा संबंध आय के स्तर से है। ओईसीडी में यह 70 फीसदी जबकि गरीब देशों में केवल 41 फीसदी है। रोचक बात यह है कि मानव पूंजी में आधी से अधिक हिस्सेदारी निम्र और उच्च आय वाले देशों की है। यह सारी बात विकास में शिक्षा के महत्त्व से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। हालांकि अन्य कारकों की भी अपनी भूमिका है जिससे इनकार नहीं किया जा सकता। 
 
सन 1995 से 2014 के बीच के 20 सालों में वैश्विक संपदा में 66 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। संपदा की प्रति व्यक्ति वृद्घि सालाना 1.3 फीसदी रही। इतना ही नहीं सभी आय वर्गों में मानव पूंजी ने संपदा वृद्घि में सबसे अधिक योगदान किया। चौथा, यह बात ध्यान देने लायक है कि बीते दो दशकों में संपदा की धारिता में कुछ बदलाव आया है। इस अवधि में वैश्विक संपदा में ओईसीडी की हिस्सेदारी 75 फीसदी से कम होकर 65 फीसदी पर आ गई है। यह हिस्सेदारी उच्च आय वर्ग वाले देशों के खाते में चली गई। उनकी हिस्सेदारी 14 फीसदी से बढ़कर 22 फीसदी हो गई। अल्प आय वाले देशों की हिस्सेदारी एक फीसदी पर रुकी हुई है। जबकि निम्र मध्य आय वाले देशों की हिस्सेदारी मामूली इजाफे के साथ छह फीसदी हो गई। इससे संकेत मिलता है कि चीन की तुलना में भारत कम प्रभावशाली साबित हुआ। 2014 में चीन की प्रति व्यक्ति संपदा 108,172 डॉलर थी जो भारत की तुलना में पांच गुना से भी अधिक थी। 
 
भारत के लिए इसके क्या निहितार्थ हैं? प्रति व्यक्ति आय और संपदा की दृष्टिï से देखें तो भारत एक बड़ी आबादी वाला देश है। यह जी-20 देशों में सबसे गरीब है। भारत के लिए अन्य बड़े देशों के साथ मुकाबला करने के लिए संपदा का तेज विस्तार करना जरूरी है। खासतौर पर मानव पूंजी के मामले में। सुरजीत भल्ला की सुस्पष्टï टिप्पणियों के बावजूद भारत की मानव पूंजी में इजाफे की संभावनाओं पर हमारी शिक्षा व्यवस्था असर डाल रही है। प्रथम द्वारा तैयार राज्यवार सालाना शिक्षा रिपोर्ट हमारी शिक्षा की बदहाली पर रोशनी डालती है। टाइम्स हायर एजुकेशन के मुताबिक विश्व के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों  में भारत का कोई संस्थान शामिल नहीं। हमें अभी इस दिशा में लंबी दूरी तय करनी है।
Keyword: GDP, growth, IIP, india,,
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