बिजनेस स्टैंडर्ड - पूंजी का क्षय
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पूंजी का क्षय

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  April 13, 2018

शंकर आचार्य ने नीचे प्रकाशित अपने आलेख में सकल घरेलू उत्पाद की जगह संपदा पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही है। उन्होंने तीन तरह की संपदा पर जोर दिया- उत्पादकता, प्राकृतिक/पर्यावरण संबंधी और मानव संबंधी संपदा। इनमें भी अंतिम पर खासा जोर दिया गया है। मैं दो अन्य तरह की पूंजी की बात जोडऩा चाहूंगा। पहली संस्थागत और दूसरी सामाजिक। मौजूदा भारतीय संदर्भ में इनका खास महत्त्व है। अगर संस्थागत परिदृश्य का सर्वेक्षण किया जाए तो बजट सत्र की आधी अवधि की पूरी बरबादी का दृश्य हमारे सामने है। ऐसे में लोकसभा की प्रासंगिकता स्वयं सीमित हो जाती है। कई राज्यों की विधानसभाएं पहले से उसी दशा में हैं। हालात ऐसे हो चुके हैं कि एक अविश्वास प्रस्ताव को सदन में प्रस्तुत नहीं किया जा सका और न उस पर मतदान होने दिया गया। 

 
सर्वोच्च न्यायालय में जो कुछ नजर आ रहा है वह एक तरह से खुली बगावत ही तो है। देश की सबसे बड़ी अदालत के कुछ वरिष्ठ न्यायाधीश सार्वजनिक रूप से और पूरी मजबूती से सर्वोच्च न्यायालय में मौजूद दिक्कतों की बात कह रहे हैं। उन्होंने यह आशंका तक जताई है कि सरकार न्यायालय पर नियंत्रण करना चाह रही है।  तीसरी बात हमें देश के सबसे अहम राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति पर भी विचार करना होगा। वहां के मुख्यमंत्री खुद आपराधिक मामलों में आरोपित रहे हैं और उनका इतिहास एक विजिलैंट ग्रुप (निगरानी करने वाला समूह) के नेतृत्व का रहा है। उन्होंने अपने ही खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस ले लिए। उन्होंने पुलिस से कहा कि वह अपराध नियंत्रण के लिए कानूनी दायरे के बाहर जाकर काम कर सकती है। उन्होंने चुनिंदा राजनेताओं के खिलाफ मामले वापस लेने का प्रस्ताव रखा। आप उन नेताओं की विचारधारा का अनुमान आसानी से लगा सकते हैं। एक विधायक पर नाबालिग से बलात्कार का आरोप लगने के बाद भी उन्होंने विधि सम्मत कदम नहीं उठाए। 
 
आखिर में हमें सामाजिक पूंजी और आपसी विश्वास के क्षय पर भी विचार करना होगा। यह ऐसा दौर है जब संघ के अधीन राज्यों के बीच कर्कशता बढ़ रही है, देश के उत्तरी राज्यों में अनावश्यक कदमों से सांप्रदायिक तनाव और हिंसा फैल रही है, देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय बहुसंख्यकों के बोझ तले दबा हुआ महसूस कर रहा है, पश्चिम बंगाल, केरल और अन्य स्थानों पर राजनैतिक दल मुद्दे निपटाने के लिए हिंसा का सहारा ले रहे हैं, जब विपक्षी दलों का भरोसा निर्वाचन आयोग पर से हिल रहा है और जब आगामी चुनावी मौसम को कई तरह की आशंकाओं के साथ देखा जा रहा है। 
 
एक व्यवस्थित समाज जिसे बेहतर आर्थिक प्रदर्शन और नागरिक मजबूती की उम्मीद हो उसे अपने संस्थानों को मजबूत बनाना होगा। इसमें संसद, न्यायपालिका और प्रशासनिक ढांचा शामिल हैं। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून व्यवस्था की मशीनरी और कर संग्रह के काम समुचित निगरानी में हों। उचित प्रक्रिया को त्यागा न जाए और चुनाव निष्पक्ष ढंग से हों। यह भी तय होना चाहिए कि देश के नागरिकों को उनके मूल अधिकार मिलें। इनमें से कई संस्थान और अधिकार चार दशक पहले एक नेता के राजनीतिक दबदबे में खारिज हो गए थे। उसके बाद गठबंधन या अल्पमत सरकारों के दौर में, कई बार राजनीतिक अस्थिरता के बीच हमारे प्रमुख संस्थान सही मायनों में उभरे। चुनाव आयोग, न्यायपालिका, प्रेस और नागरिक समाज इसके उदाहरण हैं। अब सवाल यह है कि क्या घड़ी की सुइयां वापस उलटी दिशा में घूम रही हैं। 
 
चार दशक पहले देश उस समय स्तब्ध रह गया था जब खबर आई थी कि भागलपुर में पुलिस ने छोटे मोटे अपराधियों की आंखें फोड़ दी हैं। आज पुलिसकर्मी किसी व्यक्ति को अपराधी समझते ही जान से मार दे रहे हैं। अब झटका लगना तो दूर कहा जा रहा है कि जनता इसके पक्ष में है। वर्षों की कानून विहीनता की प्रतिक्रिया के रूप में इसे समझा जा सकता है लेकिन समाज में जब बुनियादी सिद्घांत और संस्थानों को जब सुनियोजित इस्तेमाल की संपत्ति समझा जाने लगता है तो यह खतरनाक दौर होता है। खासतौर पर जब शासक रसूखदार हो और क्षेत्रवार राष्ट्रवाद के उभार का दौर चल रहा हो। इस दौर में सामाजिक और संस्थागत पूंजी के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता। 
 
भूल सुधार: गत शनिवार को इस स्तंभ में लिखा गया था कि नितिन गडकरी ने राजमार्ग निर्माण की गति को 'वस्तुत: तीन गुना' कर दिया है। वास्तव में यह 'दो गुना से ज्यादा' हुआ है।
Keyword: GDP, growth, IIP, india,,
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