बिजनेस स्टैंडर्ड - पीएसयू की नियुक्ति प्रक्रिया में दखलंदाजी की परंपरा
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पीएसयू की नियुक्ति प्रक्रिया में दखलंदाजी की परंपरा

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  April 12, 2018

ऐसा सिर्फ भारत में ही हो सकता है। अधिक स्पष्टता से कहें तो यह सिर्फ भारत के सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (पीएसयू) में ही हो सकता है। सेंट्रल कोलफील्ड्स के प्रमुख गोपाल सिंह पिछले साल सितंबर से ही सबसे बड़े पीएसयू में शुमार कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक (सीएमडी) का अतिरिक्त प्रभार संभाले हुए हैं। यह इस लिहाज से असामान्य है कि लोक उद्यम चयन बोर्ड ने उसके तीन महीने पहले जून में ही इस पद के लिए सिंह की उम्मीदवारी को खारिज कर दिया था। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है।

 
इसका मतलब है कि दुनिया कीसबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी सीआईएल की बागडोर एक ऐसे शख्स के पास है जिसे मालूम है कि वह कभी भी उस पद को हासिल नहीं कर सकता है और वह उस पद के 'अनुपयुक्त' भी घोषित किया जा चुका है। लिहाजा सिंह सात महीने बाद भी इस पीएसयू के कार्यवाहक चेयरमैन बने हुए हैं। (पूर्व चेयरमैन सुतीर्थ भट्टाचार्य 31 अगस्त, 2017 को सेवानिवृत्त हुए थे।) सीआईएल का प्रदर्शन बुरा नहीं रहा है। इसका उत्पादन 2016-17 के 5,540 लाख टन से बढ़कर 5,670 लाख टन को भी पार कर गया है। हालांकि यह उत्पादन वास्तविक लक्ष्य से थोड़ा कम है फिर भी एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन डिस्पैच एवं इनवेंट्री प्रबंधन अब भी समस्या बना हुआ है। ताप विद्युत स्टेशनों में कोयला भंडार की स्थिति सात दिन से भी कम स्तर पर पहुंचने के बावजूद ऐसी हालत है। अब भी भारत 1,400 लाख टन गैर-कोकिंग कोयले का आयात करता है। यह कोकिंग कोयले के आयात से अलग है। करीब 315 अरब टन का सुरक्षित भंडार रखने वाले देश के लिए यह स्थिति अटपटी है। इसका मतलब है कि सीआईएल चेयरमैन के पास इस चुनौती से निपटने की सोच और उसे लागू करने के लिए समय भी होना चाहिए।
 
इस संदर्भ में क्या सीआईएल जैसा संगठन लंबे समय तक नेतृत्व को लेकर कायम अनिश्चितता बरदाश्त कर सकता है? इसका जवाब तो जाहिर ही है लेकिन सामान्य समझ को भी समझने वाले कम ही हैं। पीएसयू प्रमुखों की नियुक्ति का यह अटपटा तरीका पेट्रोलियम मंत्रालय की तरफ से शशि शंकर को ओएनजीसी का चेयरमैन बनाए जाने का प्रस्ताव रखने के बाद से ही देखा जा रहा है। मंत्रालय ने शशि शंकर को केवल एक साल का कार्यकाल देने की बात कही थी। मंत्रालय चाहता था कि उनके प्रदर्शन की तिमाही समीक्षा की जाए और फिर कार्यकाल बढ़ाने पर फैसला किया जाए। इस अनुशंसा का अर्थ था कि भारत की सबसे बड़ी तेल एवंं गैस कंपनी के सीएमडी को तिमाही रिपोर्ट कार्ड के पैमाने पर तौले जाने की परीक्षा में धकेल दिया जाए। शुक्र है कि मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति ने मंत्रालय के इस सुझाव से इतर शशि शंकर को 2021 में सेवानिवृत्त होने तक सीएमडी बनाने पर मुहर लगा दी।
 
बेहतर प्रदर्शन के लिए समय देने के मकसद से सार्वजनिक कंपनियों के प्रमुखों को लंबा कार्यकाल दिए जाने के मौजूदा परिवेश में निश्चित रूप से पीएसयू प्रमुखों के संदर्भ में बेहतर तरीका उपलब्ध है। अन्य क्षेत्रों में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं।  बैंक बोर्ड ब्यूरो के भविष्य पर ही गौर कीजिए। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा गठित पी जे नायक समिति की सिफारिशों के अनुरूप फरवरी 2016 में गठित बैंक बोर्ड ब्यूरो का विस्तृत एजेंडा यह था कि सरकारी स्वामित्व वाले बैंकों में कामकाज बेहतर हो। इसके अलावा ब्यूरो को बैंकों में शीर्ष स्तर पर नियुक्तियों के संदर्भ में सरकार को परामर्श भी देना था।
 
लेकिन बुधवार तक किसी को भी नहीं मालूम था कि ब्यूरो के प्रमुख विनोद राय क्या अब भी इसकी अगुआई कर रहे हैं? उनका कार्यकाल 31 मार्च को खत्म हो गया था। किसी भी सूरत में बैंक बोर्ड ब्यूरो बैंकों के प्रबंध निदेशक स्तर पर नियुक्ति के लिए नामों की केवल सिफारिश ही कर सकता है। उन नामों पर वित्त मंत्रालय में विचार किया जाएगा। ऐसे मामले भी देखने को मिले हैं जिनमें बैंकों के निदेशकों की सेवाएं ब्यूरो से सलाह किए बगैर ही खत्म कर दी गईं।  पिछले साल ब्यूरो के एक सदस्य ने पंजाब नैशनल बैंक और बैंक ऑफ इंडिया के शीर्ष प्रबंधन में अचानक बदलाव किए जाने से नाराज होकर इस्तीफा दे दिया था। उस सदस्य को लगा था कि इन नियुक्तियों के मामले में सरकार ने बैंक बोर्ड ब्यूरो को पूरी तरह नजरअंदाज किया। ब्यूरो ने गैर-सरकारी निदेशकों को कंपनी अधिनियम 2013 के तहत स्वतंत्र निदेशक की तरह कार्य करने लायक शक्तियां देने का जो सुझाव दिया था, वह भी अभी तक धूल खा रहा है।
 
सार्वजनिक उपक्रमों के कामकाज में सरकारी दखल की मंशा भारत में लंबे समय से चली आ रही परंपरा रही है। मसलन, 2005 में ओएनजीसी के तत्कालीन चेयरमैन सुबीर राहा ने निदेशक मंडल में दो नए निदेशकों को नामित कर अपनी मौजूदगी बढ़ाने के पेट्रोलियम मंत्रालय के प्रस्ताव पर आपत्ति दर्ज करा दी थी। आखिर में, जब मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को वार्षिक आम सभा में पारित कराने की धमकी दी तो राहा ने जवाब में यह कहा था कि चेयरमैन के इस्तीफे पर भी विचार करने का प्रस्ताव रखा जाएगा। राहा की यह तरकीब काम कर गई। पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर ने यह कहते हुए विवाद शांत कर दिया कि 'एक सक्षम व्यक्ति को इस्तीफा देने के लिए कहने का कोई इरादा नहीं है'। वैसे सभी सार्वजनिक उपक्रमों के प्रमुखों से राहा की राह पर चलने की उम्मीद करना बेमानी होगा। यही वजह है कि इन उपक्रमों में सरकारी दखल की परंपरा कायम रहती है।
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