बिजनेस स्टैंडर्ड - विनिर्माण क्षेत्र: खोखलापन भरने की कवायद
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विनिर्माण क्षेत्र: खोखलापन भरने की कवायद

श्याम पोनप्पा /  April 12, 2018

भारत को अपनी खास क्षमताओं के विकास और संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए या उनका ह्रास होने देना चाहिए? इस सवाल का जवाब तलाश रहे हैं श्याम पोनप्पा

 
एक समाज की प्रकार्यात्मक क्षमता कई तरह से खोखली हो सकती है। आगे पेश किए जाने वाले उदाहरणों से समझा जा सकता है कि खुद की बनाई नीतियां, नियमन या व्यवहार किस तरह हमारी क्षमता नष्ट कर देते हैं। इस स्थिति से बचने के लिए हमारी सरकारों एवं राजव्यवस्था को संरचनात्मक परिप्रेक्ष्यों पर आधारित खेल के नियमों को अपनाने की जरूरत है ताकि लाभों को अधिकतम स्तर तक पहुंचाया जा सके। हमारा मौजूदा रवैया तो अक्सर निषेधकारी एवं नियंत्रणकारी होता है। 'इकनॉमिक ऐंड पोलिटिकल वीकली' में चार साल पहले प्रकाशित एक लेख में डॉ रश्मि बंगा ने कहा था कि कुल विनिर्मित उत्पादों में भारत की हिस्सेदारी में कमी आई है। हालांकि विनिर्माण क्षेत्र का निर्यात बढ़ रहा था लेकिन उसकी तुलना में आयात कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा था। इसका नतीजा विनिर्माण गतिविधियों के खोखला होने के तौर पर सामने आया जिसमें अघोषित लाभ विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के खाते में चले गए। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान 1980 के दशक से ही 14-16 फीसदी के स्तर पर बना हुआ है जबकि इसी अवधि में चीन ने विनिर्माण क्षेत्र में 34 फीसदी और थाइलैंड ने 40 फीसदी वृद्धि हासिल की है। विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार बढ़ोतरी भी 2000-09 के दौरान 12 फीसदी रही जबकि श्रम उत्पादकता वृद्धि में इसका योगदान केवल छह फीसदी था। चीन में रोजगार वृद्धि 32 फीसदी और मलेशिया में 68 फीसदी रही है। 
 
विश्व आर्थिक मंच और ए टी कियर्नी की तरफ से जारी 'भविष्य के उत्पादन के लिए तैयारी' रिपोर्ट भविष्य के लिए चेतावनीपूर्ण होते हुए भी अधिक सकारात्मक है। इस रिपोर्ट में देशों को दो आयामों- 'उत्पादन के चालक' और 'उत्पादन संरचना की जटिलता एवं मात्रा' के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। जहां तक उत्पादन के चालकों का सवाल है तो भारत मध्य स्तर से थोड़ा ही नीचे है जबकि जटिलता एवं मात्रा के पैमाने पर भारत औसत स्तर से थोड़ा बेहतर है। भारत हंगरी, मैक्सिको, फिलिपींस, थाइलैंड और तुर्की जैसे देशों की 'लीगेसी' चौकड़ी वाली श्रेणी में है जबकि रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका रैंकिंग में उससे पीछे हैं। विनिर्माण क्षेत्र में 'खोखलापन' पैदा होने की संकल्पना की विशेषज्ञ डॉ रश्मि बंगा की सिफारिशों के आधार पर वाणिज्य मंत्रालय कुछ उपचारात्मक कदम भी उठा रहा है। वह राष्ट्रमंडल सचिवालय में व्यापार प्रतिस्पद्र्धा की प्रमुख भी रह चुकी हैं। उनके सुझाव विशिष्ट वैश्विक मूल्य शृंखला (जीवीसी) से संबंधित हैं। अगर इन उपायों को कायदे से लागू किया जाता है तो भारत को ऑटोमोटिव मिशन प्लान 2006-16 की तरह काफी फायदा हो सकता है। फिलहाल इस प्लान का दूसरा 10 वर्षीय चक्र चल रहा है। वर्ष 2006 में ऑटो विनिर्माण क्षेत्र में एक करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ था और 2016 में यह बढ़कर 3.2 करोड़ हो गया था। भारी उद्योग एवं लोक उपक्रम मंत्रालय और भारतीय ऑटो विनिर्माताओं के संगठन (सायम) के सम्मिलित प्रयासों से मिली यह कामयाबी फौरी तवज्जो की जरूरत वाले क्षेत्रों- सौर ऊर्जा और वॉयरलेस ब्रॉडबैंड के लिए एक रोडमैप की तरह है। इसके लिए नेताओं को सतत संघर्ष के बजाय सरकार, उद्योग और लोगों के साथ मिलकर साझा मकसद हासिल करने पर ध्यान देने की जरूरत है।
 
दूसरे तरीके से भी खोखलापन मुमकिन
 
सौर उपकरण आयात: भारत में सूर्य विकिरण की पर्याप्त उपलब्धता के अलावा तकनीकी दक्षता और उत्पादन क्षमता जैसे पहलुओं को लेकर मुद्दा यह है कि सौर ऊर्जा में नवाचार को बढ़ावा देने वाली नीतियों एवं नियमों को किस तरह बनाया जाए कि शोध एवं विकास को बल मिले और इन उत्पादों का विनिर्माण एवं विपणन बढ़ाया जा सके। समूची मूल्य शृंखला इस तरह डिजाइन एवं कार्यान्वित की जानी चाहिए कि वे खास हिस्सों पर केंद्रित न होकर समेकित रूप अख्तियार करे। इसके बगैर भारत सर्वाधिक मांग वाले शीर्ष पांच देशों में शुमार होते हुए भी सौर उपकरणों के उत्पादकों के लिए निष्क्रिय बाजार ही बना रहेगा। इसी तरह परंपरागत ऊर्जा उपकरणों के घरेलू उत्पादकों को विदेशी उत्पादकों से तगड़ी प्रतिस्पद्र्धा का सामना करना पड़ता है। विदेशी उत्पादकों के पास बेहतर ढांचा एवं सब्सिडी-युक्त कच्चा माल होता है, उन्हें निर्यात प्रोत्साहन और सस्ते फंड भी मिलते हैं। सौर या परंपरागत ऊर्जा उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले आयातित उपकरण करीब 25 साल तक चलते हैं जिससे स्थानीय निर्माण इकाइयों के विकास की संभावनाएं भी बाधित होती हैं। यह पहले से ही समतुल्य नीतिगत सहयोग के अभाव से जूझ रहे स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं का गला घोंटने का काम करता है। इस स्थिति में स्थानीय उत्पादन का विकास काफी मुश्किल हो जाता है क्योंकि वे विशाल स्थानीय बाजार तक पहुंच नहीं बना पाते हैं। हमें इन सभी स्थितियों को स्वीकार कर उनके समाधान के तरीके निकालने होंगे और फिर उनका समुचित क्रियान्वयन भी करना होगा।
 
प्रतिस्पद्र्धी नीलामी एवं बोलियों से सीमित समय के लिए तेजी का रुख नीचे की तरफ होता है जिससे पैदा होने वाला भ्रम स्थायी क्षमता निर्माण होने से रोकता है। कई ऊर्जा कंपनियों ने ऐसा रास्ता अपनाया है लेकिन बिकने की सूरत आने के पहले ही इससे तौबा कर ली है। बिजली की उत्पादन लागत से भी कम मूल्य की बोलियां लगाने से वास्तविक क्षमता निर्माण में रुकावट आती है। नवीकरणीय ऊर्जा के मामले में बिजली की दरें आश्चर्यजनक रूप से कम होने से उनकी व्यावहारिकता पर सवाल खड़े होते हैं। मसलन, चीन-जापान के एक कंसोर्टियम ने संयुक्त अरब अमीरात में 1.61 रुपये प्रति इकाई के भाव पर बोली लगाई थी। बिजली दरों को इतना कम रखने से परंपरागत या सौर ऊर्जा की किसी भी परियोजना के लिए सफल होने की गुंजाइश खत्म हो जाती है।
 
हालांकि एक विकल्प यह हो सकता है कि बैटरियों एवं इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियों- लिथियम, कोबाल्ट, निकल, मैंगनीज और कॉपर को नियंत्रित किया जाए। मसलन, चीन की कंपनियां प्रसंस्कृत कोबाल्ट का 77 फीसदी उत्पादन करती हैं। ऐसे में इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन देने जैसे निर्णय करने के पहले उसमें लगने वाले कच्चे माल की उपलब्धता पर भी गौर करने की जरूरत है। दूसरा उदाहरण, भारत की नीतियों ने दूरसंचार एवं ब्रॉडबैंड सेवा में इस्तेमाल होने वाले वॉयरलेस उपकरण के डिजाइन एवं उत्पादन को किस तरह प्रभावित किया है? भारत के पास वॉयरलेस संचार के लिए सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रेडियो (एसडीआर) में लगने वाले चिप बनाने की क्षमता रही है और ऐसे उपकरणों के लिए विशाल बाजार भी मौजूद है। फिर भी एसडीआर और टीवी व्हाइट स्पेस उपकरणों के डिजाइन से जुड़े उद्यमियों के मामले में हम यह देख चुके हैं कि उन्हें इन उपकरणों के परीक्षण के लिए जरूरी स्पेक्ट्रम मिल पाना भी खासा मुश्किल होता है। नवोन्मेष में लगे उद्यमी वाणिज्यिक समाधान पेश करने का काम हमारी नीतियों एवं व्यवहार में व्यापक बदलाव के बगैर नहीं कर सकते हैं। उन्हें मध्यवर्ती स्तर पर फंड मुहैया कराना होगा और घरेलू बाजार तक आसान पहुंच भी देनी होगी। चुनिंदा विदेशी दिग्गजों के वर्चस्व वाले बाजार में अप्रमाणित कंपनियों से भला कौन खरीदारी करेगा?
 
कृषि, वित्त और इंटरनेट जैसे कई क्षेत्रों में भी ऐसे ही अवरोधकारी नियम एवं परंपराएं हैं। सुखद नीतियों एवं नियमन से क्षमता बढ़ती है लिहाजा हमें विश्व व्यापार संगठन के मानकों के अनुरूप शुल्क दरों और स्थानीय उपलब्धता सुनिश्चित करने की जरूरत है। ऐसा होने से ईंधन के लिए उत्पाद शुल्क और निर्यात पर सीमा शुल्क खत्म करने, ब्याज अनुदान, वित्त उपलब्धता, मूल्य शृंखला और बाजार तक पहुंच जैसे जायज प्रोत्साहन उपायों की राह तैयार होगी। हमें अवरोधकों और छतरी दोनों की जरूरत है जिसमें छतरी पर खास जोर देना होगा।
Keyword: infrastructure, india, agri, net,,
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