बिजनेस स्टैंडर्ड - मुनाफाखोरी रोकने वाले प्रावधान कितने जरूरी?
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मुनाफाखोरी रोकने वाले प्रावधान कितने जरूरी?

अमित सरकार /  April 11, 2018

उपभोक्ताओं को लालची कारोबारियों के चंगुल से बचाने के वास्ते जीएसटी में मुनाफाखोरी रोकने के लिए कई उपाय किए गए हैं। इन उपायों की अहमियत बता रहे हैं अमित सरकार

 
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के लागू होने का लंबे समय से इंतजार था। भारत का संविधान केंद्र एवं राज्यों को एक-दूसरे के अधिकार-क्षेत्र वाले विषयों पर कानून बनाने से रोकता है। इस वजह से केंद्र एवं राज्यों को एकसमान कर प्रणाली लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करने की जरूरत पड़ी। वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति पर लगने वाली नई कर प्रणाली को जीएसटी का नाम दिया गया। इस तरह जीएसटी हरेक आर्थिक गतिविधि के स्तर पर लगने वाले विभिन्न अप्रत्यक्ष करों को एक एकीकृत कर में समाहित कर देता है।
 
जीएसटी (या वैट) लागू करने वाले कई देशों को शुरुआती दौर में महंगाई बढऩे की स्थिति का सामना करना पड़ा है। इसे ध्यान में रखते हुए भारतीय अधिकारियों ने जीएसटी के चलते महंगाई वृद्धि और आर्थिक गतिविधियों में गतिरोध की स्थिति पैदा न होने देने के लिए मौजूदा समग्र कर बोझ (उत्पाद शुल्क और वैट) को ही बनाए रखा। खासकर समाज के कमजोर तबकों को प्रभावित करने वाली आर्थिक गतिविधियों के बाधित होने पर सार्वजनिक आलोचना होती है और उसका राजनीतिक असर भी होता है। इसी वजह से इस कानून में मुनाफाखोरी रोकने के उपाय करने जरूरी हो गए।
 
केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम (सीजीएसटी), 2017 की धारा 171 में किए गए मुनाफाखोरी-रोधी प्रावधानों के मुताबिक इनपुट टैक्स क्रेडिट के लाभ या कर दर में कोई भी कटौती होने पर उत्पाद या सेवा की कीमत में आई गिरावट का लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाना चाहिए, न कि कारोबारी उस राशि को अपने मुनाफे में जोड़ ले। हरेक स्तर पर करारोपण और दोहरे कराधान की खामियों से निपटना ही जीएसटी का प्रमुख उद्देश्य था। इन कारणों से ही कीमतों में वृद्धि होती रही है।  जीएसटी कानून के तहत मुनाफाखोरी रोकने के लिए एक राष्ट्रीय प्राधिकरण 'एनएए' का भी गठन किया गया है। इस प्राधिकरण में एक चेयरमैन और चार तकनीकी सदस्य शामिल होते हैं जिन्हें जीएसटी परिषद नामित करती है। जीएसटी परिषद मुनाफाखोरी पर नजर रखने के लिए तदर्थ एवं राज्य-स्तरीय स्क्रीनिंग समितियों का भी गठन करेगी। मुनाफाखोरी के बारे में आने वाली शिकायतों की निगरानी ये समितियां ही करेंगी।
 
अगर एनएए अपनी पड़ताल में यह पाता है कि वस्तु या सेवा के आपूर्तिकर्ता ने मुनाफाखोरी संबंधी नियमों का उल्लंघन किया है तो उसे उत्पाद की कीमतों में कटौती करने, अतिरिक्त संग्रहीत राशि को ब्याज समेत लौटाने का आदेश देने, जुर्माना लगाने और पंजीकरण निरस्त करने का अधिकार होगा। सेफगॉर्ड महानिदेशक (डीजीएस) को संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करने, किसी अन्य एजेंसी या प्राधिकरण की राय लेने, समन जारी करने और जांच करने की शक्ति प्रदान की गई है।  जीएसटी परिषद की 23वीं बैठक के बाद केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) ने मुनाफाखोरी-रोधी प्रावधानों का अनुपालन नहीं करने वाले प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई की मंशा जताने वाली एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की। डीजीएस ने एफएमसीजी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों, रेस्टोरेंट शृंखला, विनिर्माताओं और कारोबारियों को प्रथम-दृष्टया दोषी पाते हुए नोटिस भेजा है। संबंधित कंपनी की बैलेंस शीट, मुनाफा और नुकसान के ब्योरे, रिटर्न, कीमतों की सूची, खरीदी रिकॉर्ड और रसीदों के जरिये डीजीएस इन मामलों की पड़ताल करेगा। इन नियमों के तहत एनएए को महत्त्वपूर्ण शक्तियां दी गई हैं और अधिकारी उसी के मुताबिक काम करते हैं।
 
हालांकि मुनाफाखोरी-रोधी प्रावधान अधिसूचित किए जा चुके हैं लेकिन अभी तक विस्तृत दिशानिर्देशों का इंतजार है। अभी साफ नहीं है कि मुनाफे की गणना का तरीका मलेशिया की तरह 'शुद्ध लाभ मार्जिन' होगा या ऑस्ट्रेलिया की तरह 'डॉलर मार्जिन' पद्धति अपनाई जाएगी। मलेशिया में मुनाफाखोरी पर लगाम के लिए किए गए प्रावधानों से मुकदमों की भरमार हो गई थी जबकि अंशधारकों को शिक्षित करने के लिए पर्याप्त समय दिए जाने से ऑस्ट्रेलिया का अनुभव उत्साहजनक रहा। सीजीएसटी अधिनियम की धारा 171(1) के मुताबिक 'वस्तु एवं सेवा की किसी भी आपूर्ति पर कर की दर में कोई भी कटौती होने या इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ कीमतों में कटौती के तौर पर दिया जाना चाहिए।' जब उत्पादों की बिक्री पैकेज पर अंकित अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) पर हो रही है तो एमआरपी को भी घटी हुई कीमत के हिसाब से संशोधित किया जाएगा। आपूर्तिकर्ता को उत्पाद पर संशोधित एमआरपी अंकित करना भी जरूरी होगा।
 
जीएसटी कानून में यह प्रावधान है कि लागत में कटौती और इनपुट टैक्स क्रेडिट के लाभों को आनुपातिक रूप से उत्पाद मूल्य में कटौती के रूप में परिवर्तित होना चाहिए। लेकिन इस 'आनुपातिक' कटौती का कोई स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं होने से अधिकारियों को शब्दकोश की शरण लेनी पड़ सकती है। शब्दकोश के मुताबिक आनुपातिक शब्द के 'आकार या मात्रा के संदर्भ में', 'किसी वस्तु की तुलना में समान' एवं 'सही मात्रा या परिमाण या परिमाप में समान' जैसे अर्थ होते हैं। अगर ऐसा है तो फिर क्या जीएसटी के आने से होने वाला समूचा लाभ उपभोक्ता को स्थानांतरित किया जाना चाहिए? या अगर कीमत में कटौती वास्तविक लाभ के अनुपात में हो रही है तो वही पर्याप्त है? क्या आपूर्तिकर्ता उत्पाद, संयंत्र या बैच के स्तर पर मूल्य-निर्धारण की अलग रणनीति अपना सकता है?
 
जिन मामलों में आपूर्तिकर्ताओं को पुरानी व्यवस्था के तहत कर से छूट मिली हुई है उनसे जीएसटी के तहत मिले इनपुट टैक्स क्रेडिट के आधार पर लागत कटौती की उम्मीद की जा रही है। मसलन, मोटरकार डीलर अगर एक ऐसी कार खरीदता है जिस पर उत्पाद शुल्क का भुगतान विनिर्माता ने 1 जुलाई, 2017 से पहले ही कर दिया था तो उससे यह उम्मीद होगी कि वह उस कार की बिक्री के समय उत्पाद शुल्क क्रेडिट पर मिला लाभ ग्राहक को स्थानांतरित करे। या साइकिल उपकरण जैसे कर-मुक्त उत्पादों केआपूर्तिकर्ता को अगर इनपुट टैक्स क्रेडिट मिल रहा है और वह इन उत्पादों को जीएसटी के दौर में बेच रहा है तो उसे कीमत समायोजित कर उसका लाभ खरीदार तक पहुंचाना होगा। इसी तरह साइकिल विनिर्माता भी उपकरण विनिर्माता से मिले कीमत कटौती लाभ को अपने उत्पाद की कीमत तय करते समय समायोजित करने के लिए बाध्य है।
 
हालांकि कीमतों में कटौती के तरीके के संदर्भ में स्पष्ट दिशानिर्देशों का अभी तक इंतजार है। कीमतों में कटौती की गणना के आधार को लेकर भी स्थिति स्पष्ट होने की संभावना है। लेकिन सरकार ने यह साफ कर दिया है कि मुनाफाखोरी-रोधी उपायों का मतलब कारोबारियों को मुनाफा कमाने से रोकना नहीं है बल्कि इसके जरिये उपभोक्ताओं को चालबाज कारोबारियों के चंगुल से बचाना है। भले ही जीएसटी कानून में किए गए मुनाफाखोरी-रोधी प्रावधान देखने में सख्त लग रहे हैं लेकिन यह देखा जाना अभी बाकी है कि उनका क्रियान्वयन एवं निगरानी वास्तविक उद्देश्य के अनुरूप किया जा रहा है या नहीं।
 
(लेखक बीडीओ इंडिया में पार्टनर एवं अप्रत्यक्ष कर प्रमुख हैं)
Keyword: CGST, VAT, GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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