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देश के लिए घातक है न्याय क्षेत्र में इस तरह का टकराव

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  April 10, 2018

सरकारें संविधान की शपथ लेती हैं लेकिन जब कभी संविधान उनकी राह में रोड़ा बनता है तो वे उसे कमजोर करने और नाकाम करने की हरसंभव कोशिश करती हैं। वहीं दूसरी ओर, न्यायाधीश संविधान की बातों को अत्यंत गहरी आस्था से लेते हैं। इससे इन दोनों के बीच एक स्वाभाविक टकराव उत्पन्न होता है। यह टकराव हमेशा इतना नाटकीय नहीं होता है जितना कि इन दिनों सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम और कानून मंत्रालय के बीच न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर देखने को मिल रहा है।

 
बहरहाल यह असहमति गहरी है और देश के आर्थिक तथा सामाजिक प्रश्नों पर इसका प्रभाव पड़ रहा है। न्यायाधीशों का मानना है कि संविधान के अनुच्छेद के अनुसार देश में सभी प्राधिकारों को सर्वोच्च के सहायक के रूप में काम करना चाहिए। हालांकि अदालत के समक्ष आए कई मामलों में उसने यह भी पाया है कि उसके आदेशों की अनुपालन से अधिक उनका उल्लंघन होता है। यही वजह है कि दिल्ली के व्यापारी इन दिनों अवैध निर्माण के खिलाफ सड़कों पर उतर कर लड़ाई लड़ रहे हैं। गोवा और ओडिशा जैसे खनिज संपदा से भरपूर प्रांत अवैध गतिविधियों के साए तले हैं। 
 
खाद्य संरक्षा अधिनियम की बात करें तो कई राज्यों ने अधिनियम के तहत नियम कायदे भी गठित नहीं किए हैं, प्रभावी क्रियान्वयन तो दूर की बात है। जिला स्तर पर समस्या निवारण करने वाले अधिकारियों तक को नामित नहीं किया गया है। सतर्कता समिति नहीं बनी हैं, खाद्य आयोग या सामाजिक अंकेक्षण की समितियां तक नहीं बनी हैं। बीते एक साल में अदालत ने स्वराज अभियान बनाम भारत सरकार के इस मामले में पांच लंबे निर्णय दिए हैं। परंतु उसके आदेशों का क्रियान्वयन नहीं किया गया है। 
 
अवज्ञा के और भी बुरे मामले हैं। विनिर्माण मजदूरों के राष्टï्रीय अभियान से संबंधित एक हालिया निर्णय में अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि वर्ष 2006 से ही समय-समय पर ऐसे निर्देश दिए गए हैं ताकि प्रासंगिक कानूनों का पालन किया जाए। परंतु इनका उपहासात्मक अंदाज में अनादर किया गया। आगे अदालत ने कहा कि समान रूप से दुखद बात यह है कि केंद्र सरकार की ओर से जारी निर्देशों तक की राज्य सरकारों ने अवहेलना कर दी।  अदालत के कहने पर गठित होने के बावजूद विनिर्माण श्रमिकों के लाभार्थ जुटाए गए फंड के संग्रहण और उनके इस्तेमाल में एक के बाद एक घोटाले सामने आने लगे। तकरीबन 374 अरब रुपये से अधिक की राशि संग्रहीत की गई थी लेकिन केवल 95 अरब रुपये की राशि इस्तेमाल में लाई गई। अदालत ने अचरज जताते हुए कहा कि सवाल यह है कि शेष बचे 280 अरब रुपये का क्या होगा? राज्यों में सलाहकार समितियां हैं लेकिन बीते कई सालों में उनमें से किसी की कोई बैठक नहीं हुई है। न्यायालय ने कहा कि हालात इतने अधिक खराब हैं कि शेक्सपियर के नाटकों की शैली की त्रासदी भी पीछे छूट जाए। 
 
ऐसे सैकड़ों आदेश हैं जो सामाजिक कल्याण से ताल्लुक रखते हैं। रिट याचिका के तहत ही हजारों आवेदन हैं जिनसे निपटना न्यायालय के लिए आसान नहीं है। राज्य द्वारा प्रतिरोध की हर घटना के बाद पीडि़त पक्षकारों की ओर से आवेदन और शिकायत की बाढ़ आ जाती है। सर्वोच्च न्यायालय में सामाजिक न्याय संबंधी पीठ जो ऐसे मामलों की सुनवाई करता है, उस पर नजर डालें तो पता चलता है कि राज्य केवल अदालत के साथ छुपम-छुपाई का खेल खेल रहे हैं। राज्य सरकारों द्वारा दाखिल हलफनामे काफी जटिल भाषा में होते हैं। आदेशों को स्थगित करने का एक और तरीका है। समीक्षा याचिका या स्पष्टïीकरण के आवेदन करना। राज्य अदालती फैसले के शब्दों की गलत व्याख्या करते हैं या नियमों को बदल देते हैं ताकि न्यायाधीशों को मात दे सकें। 
 
जिन अधिकारियों को आदेशों का क्रियान्वयन करना होता है, जब वे ही इस प्रकार का असहयोग दिखाते हैं तो अदालत के पास बहुत कम ही चारा बाकी रह जाता है। उसके पास प्रवर्तन करने के लिए कोई शाखा नहीं है। वह आदेश की अनुपालन की निगरानी नहीं कर सकता। उसके पास यह पता लगाने का कोई तरीका नहीं है कि उसके आदेशों का बाद में क्या हुआ।  न्यायालय चाहे तो न्यायिक अवमानना के नोटिस जारी कर सकता है लेकिन वे भी मूल आदेशों की गति को प्राप्त हो जाते हैं। कुछ न्यायाधीशों ने राज्यों के मुख्य सचिवों को तलब करके आदेशों के अनुपालन के बारे में जानकारी चाही। इससे भी कोई खास फायदा नहीं हुआ बल्कि नौकरशाही की ओर से आलोचना का ही सामना करना पड़ा। कुछ मामलों में अदालत ने राज्यों पर जुर्माना भी लगाया लेकिन इसका बोझ करदाताओं पर ही पड़ता है। यह स्थिति हमें पूर्व अमेरिकी राष्टï्रपति एंड्रयू जैकसन के ताने की याद दिलाता है जिन्होंने कहा था, 'प्रधान न्यायाधीश जॉन मार्शल ने अपना निर्णय ले तो लिया है अब उन्हें इसका प्रवर्तन करने दिया जाए।'
 
जो नौकरशाह न्यायपालिका को शर्मिंदा करने का प्रयास करते हैं उन्हें केंद्र सरकारों और उच्च न्यायपालिका के बीच न्यायाधीशों के चयन की कॉलेजियम व्यवस्था को लेकर चल रहे छाया युद्घ से प्रोत्साहन मिल सकता है। इसकी प्रक्रिया को लेकर दोनों के बीच बीते तीन साल से किसी तरह की सहमति नहीं बन पाई है। इस बीच रिक्तियों और बकाये का बोझ बढ़ता जा रहा है और आंतरिक झगड़ों ने अब न्यायपालिका की दिक्कतों में और अधिक इजाफा कर दिया है। कमजोर न्यायपालिका सरकार और नौकरशाही दोनों को रास आती है लेकिन देश के लिए यह बहुत घातक होती है। 
Keyword: supreme court, high court,,
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