बिजनेस स्टैंडर्ड - बनी रह सकती है रुपये की कमजोरी
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बनी रह सकती है रुपये की कमजोरी

नीलकंठ मिश्रा /  April 10, 2018

पूंजी के बाहर जाने और उसकी आवक कमजोर रहने की आशंकाओं के बीच रुपया इस वर्ष दुनिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में से एक है। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
इस वर्ष रुपया दुनिया की 30 सर्वाधिक मजबूत मुद्राओं में 26वें स्थान पर रहा। वह उन चुनिंदा मुद्राओं में शामिल है जिनका मूल्य डॉलर के बरअक्स कम हुआ है। यह कमजोरी काफी हद तक अनदेखी ही रह गई क्योंकि भारतीय आर्थिक प्रतिभागियों तथा टीकाकारों का पूरा ध्यान डॉलर और रुपये की विनिमय दर पर ही टिका रहा और जिसमें ज्यादा बदलाव देखने को नहीं मिला है। इस वर्ष अब तक तमाम बड़ी मुद्राओं की तुलना में गिरावट की बात करें तो रुपया यूरो की तुलना में 5 फीसदी, पाउंड की तुलना में 6 फीसदी, येन की तुलना में 9 फीसदी और युआन की तुलना में 6 फीसदी गिरा है। 
 
इस कमजोरी की वजह तलाशने के लिए हमें बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। भारत को अपने चालू खाते के घाटे की भरपाई के लिए निरंतर विदेशी पूंजी की आवश्यकता होती है। हम जितनी वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात करते हैं उससे कहीं अधिक का आयात करते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो हम उत्पादन से ज्यादा खपत करते हैं। ऐसे में अतिरिक्त खपत का भुगतान विदेशियों द्वारा किया जाता है। जब पूंजी की आवक चालू खाते के घाटे से अधिक हो जाती है तो रुपया मजबूत होता है। जब यह समानुपाती होती है तो रुपया स्थिर रहता है और इसके कम होते ही रुपया गिरने लगता है।
 
रुपये की कीमतों में हाल में जो गिरावट आई है वह इसलिए क्योंकि पूंजी की आवक चालू खाते की तुलना में कमजोर रही है। बीते एक वर्ष के दौरान थोड़ी स्थिरता रही लेकिन उसके बाद से सालाना व्यापार घाटा 52 अरब डॉलर तक बढ़ गया है। यह जीडीपी के 2 फीसदी के बराबर है। आमतौर पर कच्चे तेल की कीमतों को इसके लिए उत्तरदायी माना जाता है लेकिन इस मामले में केवल एक तिहाई बढ़ोतरी कच्चे तेल की वजह से हुई है। इसके बजाय आधी बढ़ोतरी सोना-चांदी जैसी कीमती धातुओं और कीमती नगों के शुद्ध आयात में इजाफे की वजह से हुई है। सोने की कीमतें तय दायरे में रही हैं लेकिन इसके आयात की मात्रा काफी बढ़ गई है। हालांकि हाल के दिनों में इनमें स्थिरता आई है लेकिन अगर इसमें इजाफा हुआ तो यह अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं होगा। इससे पूंजी की निकासी होती है। क्योंकि लोग स्थानीय मुद्रा के बजाय सोने में निवेश करते हैं। यह निवेश पूंजी की निकासी की तरह है क्योंकि इससे कोई प्रतिफल नहीं मिलता। चिंता की बात यह है कि जवाहरातों और मोतियों के आयात में करीब 15 अरब डॉलर का इजाफा हुआ है जो चिंताजनक है। इनका उचित मूल्यांकन मुश्किल है इसलिए इसे पूंजी की निकासी के समान ही माना जा सकता है।
 
गैर तेल और गैर कीमती धातु और आभूषण के व्यापार घाटे की बात करें तो अब तक उसकी भूमिका कमतर रही है और बीते एक साल में यह मात्र 9 अरब डॉलर बढ़ा है लेकिन यह अब 53 अरब डॉलर के उच्चतम स्तर पर है। आने वाले वर्ष में इसमें इजाफा जारी रह सकता है। खासतौर पर अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में उच्च उपयोग स्तर को देखते हुए, जहां नया पूंजीगत व्यय आवश्यक है। उदाहरण के लिए विमानन, दूरसंचार या इस्पात आदि क्षेत्रों में अधिकांश चीजें आयात की जाती हैं। दूसरी ओर कृषि, कपड़ा, चमड़ा, दोपहिया और औषधि आदि निर्यात तो होते हैं लेकिन इनमें वैश्विक वृद्धि के साथ इजाफा नहीं होता। यही वजह है कि क्रेडिट सुइस मानती है कि देश का चालू खाते का घाटा बढ़ेगा और अगले एक साल में यह 75 अरब डॉलर हो सकता है जो जीडीपी के 2.6 फीसदी के बराबर होगा। सन 2013 के 88 अरब डॉलर के बाद यह सबसे अधिक स्तर होगा। इसके पहले मुद्रा में तेज गिरावट देखने को मिली थी।
 
पूंजी की आवक भी चिंताओं से मुक्त नहीं है। 55 से 60 अरब डॉलर तक के सालाना चालू खाता घाटे की पूर्ति प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश, अनिवासी भारतीयों के जमा और बाह्य वाणिज्यिक ऋण की मदद से की जा सकती है। बीते एक साल में शुद्ध एफडीआई आवक घटकर 27 अरब डॉलर रह गया है। इससे पहले के दो सालों तक यह 40 अरब डॉलर था। एफपीआईकी आवक में भी धीमापन आया है। ऐसा वृद्धि, मुद्रास्फीति और राजकोषीय घाटे के संबंध में अल्पावधि की आर्थिक नीतियों को लेकर अनिश्चितता और असहजता की वजह से हुआ है। आंशिक तौर पर ऐसा भारतीय बॉन्ड के विदेशी स्वामित्व की सीमा समाप्त होने से भी हुआ है। यह सीमा आरबीआई तय करता है। लाइबोर (बाहरी ऋण की लागत तय करने वाली अंतर बैंक दर) में बीते छह महीने में स्थिर वृद्धि हुई है और हालिया बैंकिंग घोटालों के कारण व्यापार की फाइनैंसिंग से जुड़ी आवक पर असर पड़ा है। ऐेसे में शायद ईसीबी में ज्यादा इजाफा न हो।
 
अगले तीन महीनों में चालू खाते के बढ़ते घाटे और पूंजी प्रवाह की धीमी होती गति, इन दोनों कारकों का असर प्रभावी हो जाएगा। डॉलर और रुपये की विनिमय दर में तेजी से बदलाव नहीं आएगा क्योंकि अमेरिकी डॉलर के अन्य मुद्राओं की तुलना में लगातार कमजोर होने की अपेक्षा है। अमेरिका में राजकोषीय प्रोत्साहन ऐसे वक्त आया है जब अर्थव्यवस्था अपनी पूरी क्षमता से काम कर रही है। ऐसे में मांग बढऩे से आयात में इजाफा हो सकता है। अमेरिकी डॉलर के कमजोर होने के और भी कई कारण मौजूद हैं।
 
बहरहाल, रुपये के मूल्य में यह छिपी हुई कमजोरी कई तरह से लाभदायक साबित हो सकती है। कई लोग यह मानते रहे हैं कि रुपया बहुत मजबूत रहा है और देश के निर्यात जगत की हालत में सुधार के लिए उसमें गिरावट आना आवश्यक है। डॉलर और रुपये की विनिमय दर में कोई खास बदलाव नहीं आने से यह गिरावट इस तरह आई है कि कोई अतिरिक्त अस्थिरता नहीं पैदा हुई है। बहरहाल इस गिरावट के कारक कतई स्वस्थ नहीं है। पूंजी के बहिर्गमन की आशंका निरंतर बनी हुई है, निर्यात वृद्धि निराश करने वाली है और पूंजी की आवक में धीमापन है। अगर डॉलर मजबूत होता है तो डॉलर और रुपये की विनिमय दर में अचानक बदलाव आएगा जो भारतीय बाजारों और अर्थव्यवस्था दोनों में विचलन ला सकता है। वर्ष 2013 में तो देश का विदेशी मुद्रा भंडार पर्याप्त था इसलिए हम अस्थिरता से बचे रह सके लेकिन इस बार शायद नीति निर्माताओं को पूंजीगत आवक बढ़ाने के लिए अग्रसोची कदम अपनाने होंगे। एक बार अगर कमजोरी जाहिर हो गई तो ऐसा कर पाना मुश्किल होगा।
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