बिजनेस स्टैंडर्ड - अमेरिका के उच्च शुल्क का भारत पर होगा नकारात्मक असर
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अमेरिका के उच्च शुल्क का भारत पर होगा नकारात्मक असर

कराधान
सुकुमार मुखोपाध्याय /  April 08, 2018

अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की नई नीतियों के तहत अमेरिका संरक्षणवादी शुल्क का संग्रह करने जा रहा है। उसका यह कदम वैश्वीकरण की भावना के एकदम प्रतिकूल है। वैश्वीकरण की नीति अहस्तक्षेप की नीति है, यानी मुक्त और अबाध कारोबार सुनिश्चित करते हुए अनावश्यक ढंग से बीच में न आने की नीति। यूरोप के देशों और खुद अमेरिका ने इस अवधारणा का जबरदस्त तरीके से समर्थन किया लेकिन इस नीति को त्यागने वालों में भी अमेरिका के ही नेताओं का नाम सबसे आगे है। सन 2002 में तत्कालीन राष्ट्रपति बुश और अब डॉनल्ड ट्रंप ठीक यही काम कर रहे हैं। 

 
हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री मार्टिन फेल्डस्टाइन का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस्पात पर लगने वाले आयात शुल्क पर 25 फीसदी और एल्युमीनियम पर 10 फीसदी की जो बढ़ोतरी की है उसका असली निशाना चीन है। जो अमेरिकी कंपनियां चीन में कारोबार करना चाहती हैं उन्हें अक्सर अपनी तकनीक चीन की कंपनियों को सौंपनी पड़ती है। यह एक किस्म की वसूली है। इसके पक्ष में दलील यह दी जा रही है कि उच्च शुल्क दर से चीन की सरकार पर दबाव बने और वह इस कथित स्वैच्छिक तकनीक हस्तांतरण पर लगाम लगाए। 
 
मार्टिन की यह दलील सही नहीं है क्योंकि उच्च शुल्क अब कोई धमकी नहीं है बल्कि यह हकीकत में बदल चुका है इसलिए चीन भी अब प्रतिक्रिया स्वरूप तमाम अमेरिकी वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा रहा है। इसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया केवल चीन में नहीं बल्कि भारत, जापान और दक्षिण कोरिया समेत पूरी दुनिया में होगी। 
 
भारत पर प्रभाव
 
अमेरिका के कुल इस्पात और एल्युमीनियम आयात में भारत की हिस्सेदारी क्रमश: 2 और 1 फीसदी है। यानी भारत के निर्यात पर इसका असर मामूली ही होगा। बहरहाल अमेरिका द्वारा तमाम इस्पात निर्यातक देशों को दी जाने वाली रियायत का मतलब यह होगा कि विश्व बाजार में उनके तो नहीं लेकिन चीन के माल की भरमार होगी। चूंकि चीन बहुत बड़ा इस्पात उत्पादक है इसलिए वह वैश्विक बाजार में भारी मात्रा में इस्पात पहुंचा सकता है। इसके साथ अगर चीन अन्य तमाम अमेरिकी वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा देता है तो भारत के लिए यह गुंजाइश पैदा होती है कि वह भारतीय वस्तुओं का निर्यात करके इस अवसर का लाभ उठाए। भारत के इस्पात उत्पादकों ने भी अपने उद्योग के बचाव के लिए डंपिंगरोधी शुल्क लागू किए जाने की मांग की है। यह तात्कालिक प्रतिक्रिया है और इस पर आसानी से सहमति नहीं बन सकती। इसका विशुद्घ प्रभाव तो बाद में ही देखने को मिलेगा। 
 
अन्य देशों की प्रतिक्रिया
 
अमेरिका ने यूरोपीय संघ के देशों, दक्षिण कोरिया, ब्राजील, कनाडा, ऑस्टे्रलिया और मैक्सिको जैसे देशों को रियायत दे रखी है लेकिन भारत को नहीं। विश्व व्यापार संगठन के निदेशक रॉबर्टो अजेवेदो की चिंता है कि ट्रंप की यह आक्रामक शुल्क नीति व्यापार युद्घ को बढ़ावा देने वाली साबित होगी। यह विश्व व्यापार संगठन में भी गड़बड़ी पैदा करेगी क्योंकि वह बहुपक्षीय नियम आधाारित व्यापार व्यवस्था है। अमेरिका मध्यस्थता की अपील संस्था में न्यायाधीशों की नियुक्ति को अवरुद्घ करके पहले ही विवाद निस्तारण तंत्र को नुकसान पहुंचा चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा था कि व्यापार युद्घ अच्छा है और उसे जीतना आसान है। यूरोपीय संघ के प्रेसिडेंट डॉनल्ड टस्क कहते हैं कि इसका उलटा सच है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रबंध निदेशक क्रिस्टीन लेगार्ड कहती हैं कि तथाकथित व्यापार युद्घ में किसी की जीत नहीं होती है। बल्कि यह वैश्विक आर्थिक वृद्घि को भारी नुकसान पहुंचाने वाला कदम है। 
 
अमेरिका पर भी दुष्प्रभाव
 
ट्रंप का कहना है कि वह अमेरिका में उत्पादित धातु से अपने जहाज और वायुयान बनाने की इच्छा रखते हैं। हकीकत यह है कि अमेरिका में  इतनी अधिक धातु का उत्पादन ही नहीं होता। मौजूदा लागत पर अगर नए उद्योग की स्थापना की जाए तो वह इस्पात आयात करने की तुलना में कहीं अधिक महंगा पड़ सकता है। इतना ही नहीं अंतर भी इतना ज्यादा है कि अमेरिका उसकी भरपाई शायद ही कर सके। अमेरिकी इस्पात उद्योग में केवल 1.40 लाख श्रमिक हैं जबकि इस्पात की खपत वाले उद्योग में करीब 65 लाख श्रमिक काम कर रहे हैं। अगर सस्ता और बढिय़ा इस्पात उपलब्ध नहीं होगा तो मशीनरी और ऑटोमोबाइल क्षेत्र को दिक्कत होगी। उनके उत्पाद न केवल घरेलू बल्कि विश्व बाजार में भी प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाएंगे। यही तमाम नकारात्मक असर एल्युमीनियम उद्योग और उन उद्योगों पर भी पड़ेंगे जहां एल्युमीनियम कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होता है। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बुश ने भी सन 2002 में ठीक ऐसा ही प्रयास किया था। उन्होंने आयातित इस्पात पर आयात शुल्क को 0-1 फीसदी से बढ़ाकर 8 से 30 फीसदी कर दिया था। बुश ने कहा था कि वह यह कदम उद्योग जगत को यह अवसर देने के लिए उठा रहे हैं ताकि वह विदेशी आयात में हो रहे इजाफे से समायोजन कर सके। इसके अलावा इस कदम से अर्थव्यवस्था और कामगारों को राहत मिलने की भी उम्मीद थी। बहरहाल, इसका शुद्घ प्रभाव एकदम विपरीत रहा। वर्ष 2003 और 2005 में अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग ने पाया कि अमेरिका की इस शुल्क वृद्घि का उसके लोक कल्याण पर बुरा असर हुआ और उसे तकरीबन 11 करोड़ डॉलर मूल्य का नुकसान हुआ। जबकि पहले इससे 6.56 करोड़ डॉलर का लाभ हो रहा था। 
 
निष्कर्ष 
 
पूरी बात का लब्बोलुआब यह है कि एक ओर जहां अमेरिका चीन को बिना बाजार की अर्थव्यवस्था कहता है वहां खुद उसकी नीतियां ऐसी हैं जो अमेरिका को एक गैर बाजार अर्थव्यवस्था बना रही हैं। एक ऐसी अर्थव्यवस्था जो पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में परिचालित हो रही है। 
Keyword: america, donald trum,,
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