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कथनी-करनी में फर्क रहा है देवेगौड़ा की पहचान

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  April 06, 2018

भारतीय राजनीति का कोई भी क्षत्रप हरदनाहल्ली डोडाहल्ली देवेगौड़ा जैसा नहीं है। वह कर्नाटक के इकलौते नेता हैं जो प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचे। उनका कर्नाटक के सभी इलाकों में व्यापक प्रभाव रहा है। किसी ने भी उन्हें कर्नाटक के हासन-पुराना मैसूर क्षेत्र तक ही सीमित रहने और वोक्कलिगा समुदाय की राजनीति में लिप्त होने के लिए मजबूर नहीं किया था। लेकिन उन्होंने खुद ही यह विकल्प चुना। उन्हें उम्मीद है कि मई के मध्य में वह एक बार फिर किंगमेकर की भूमिका निभाने की हैसियत में होंगे। 

 
राज्य की राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखने का काम बहुत नेता करते हैं। देवेगौड़ा भी कर्नाटक से राष्ट्रीय स्तर की राजनीति तक पहुंचे थे। वर्ष 1996 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार के 13 दिन बाद ही गिर जाने पर देवेगौड़ा को संयुक्त मोर्चे ने प्रधानमंत्री पद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित किया था। हालांकि वह संयुक्त मोर्चे की पहली पसंद न होकर चौथी पसंद थे। मोर्चे में शामिल विभिन्न दलों के नेता एक-दूसरे का पत्ता काटने में लगे थे और आखिरकार देवेगौड़ा के नाम पर सहमति बन पाई थी। उन्होंने इस पद को हासिल करने की होड़ में जी के मूपनार को पछाड़ दिया था लेकिन सांस्कृतिक कारणों से कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी के साथ उनके संबंध मधुर नहीं बन पाए। इसका नतीजा यह हुआ कि 1997 में कांग्रेस ने एक तरह से संयुक्त मोर्चे को अपना प्रधानमंत्री बदलने के लिए मजबूर कर दिया और देवेगौड़ा को अपमानजनक ढंग से हटाकर इंद्र कुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बनाया गया। उसके बाद 2002 में कनकपुरा लोकसभा सीट से सांसद चुने जाने तक देवेगौड़ा दक्षिण भारत की राजनीति में अपना कद बढ़ाने की कोशिश में लगे रहे। वर्ष 2004 के विधानसभा चुनाव में उन्हें इसका फायदा भी मिला और वह किंगमेकर बनकर उभरे।
 
देवेगौड़ा के बारे में खास बात यह है कि वह अक्सर सही बातें कहते हैं लेकिन सभी गलत काम करते हैं। वर्ष 2001 में अपनी सियासी 'बेरोजगारी' के दिनों में उन्होंने बेंगलूरु के आसपास एक पदयात्रा की थी जिसका मकसद गांवों की आवाज को शहर तक पहुंचाना था। पुलिस गोलीबारी में दो किसानों की मौत से उपजे आक्रोश को स्वर देते हुए देवेगौड़ा ने कृषि क्षेत्र में व्याप्त संकट के लिए दोषपूर्ण आर्थिक नीतियों और उदारीकरण के दुष्प्रभावों को जिम्मेदार बताया था। इस अभियान का असर हुआ और कुछ महीनों बाद देवेगौड़ा ने कनकपुरा लोकसभा सीट के लिए हुए चुनाव में भारी जीत दर्ज की। 
 
फिर वर्ष 2004 के विधानसभा चुनाव आए जिसमें देवेगौड़ा की अगुआई वाले जनता दल सेक्युलर (जद-एस) ने कनकपुरा की थीम पर ही अपना अभियान चलाया। देवेगौड़ा ने उसमें एक और बात यह जोड़ी थी कि उन्हें भविष्य में कांग्रेस के साथ जाने में कोई समस्या नहीं है। इसका फायदा यह हुआ कि अल्पसंख्यकों का उन्हें साथ मिला।  चुनावों के नतीजे आने के बाद देवेगौड़ा किंगमेकर की भूमिका में आ गए। भाजपा को 75 सीटें मिली थीं जबकि कांग्रेस को 65, जद-एस को 57 और अन्य को 27 सीटें मिली थीं। कांग्रेस और जद-एस ने हाथ मिलाते हुए सरकार बनाई और धरम सिंह मुख्यमंत्री बने।
 
लेकिन सबकुछ खुशनुमा नहीं था। कांग्रेस से हाथ मिला चुके रामकृष्ण हेगड़े की अगुआई वाले जनता दल में देवेगौड़ा को लेकर अविश्वास कम न हो पाया। इन अंतर्विरोधों के चलते 2006 में धरम सिंह ने इस्तीफा दे दिया। उसके बाद देवेगौड़ा के बड़े बेटे एच डी कुमारस्वामी ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का समझौता कर लिया। इस समझौते का आधार यह था कि शुरुआती आधे कार्यकाल में कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बनने वाले थे जबकि बचे हुए कार्यकाल में भाजपा अगुआई करेगी। लेकिन 75 विधायक होने के बावजूद भाजपा 57 सदस्यों वाले जद-एस का पिछलग्गू बनकर रह गई।
 
इस समझौते से सबसे ज्यादा अचरज अल्पसंख्यकों को हुआ था। पहले तो देवेगौड़ा ने कहा कि उनके बेटे ने उनकी पीठ पीछे भाजपा के साथ करार किया है जिससे उनका दिल टूट गया है। लेकिन यह रुख एक हफ्ते तक ही चल पाया। आखिरकार अपने खून ने असर दिखाया और देवेगौड़ा अपने बेटे के साथ खड़े हो गए। इसका नतीजा यह हुआ कि वह अल्पसंख्यकों का भरोसा गंवा बैठे। कुमारस्वामी की सरकार हिचकोले खाने के बावजूद चलती रही। इसकी एक वजह यह थी कि कुमारस्वामी अपनी पार्टी को मजबूती दिलाने की कोशिश कर रहे थे। यहां तक कि उन्होंने दलितों की झोपडिय़ों में रातें भी बिताईं। (हालांकि वह अपने साथ अपना कमोड, चटाई और मिनरल वॉटर लेकर गए थे।) उन्होंने अल्पसंख्यकों से भी संपर्क साधकर भरोसा जीतने की पहल की। 
 
लेकिन समझौते के तहत जब भाजपा को सरकार की अगुआई करने का मौका देने की बात आई तो कुमारस्वामी ने पद छोडऩे से मना कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि भाजपा सरकार से अलग हो गई। लेकिन जद-एस के कुछ अहम नेता भी उसका साथ छोड़ गए। इनमें देवेगौड़ा के करीबी सहयोगी एम पी प्रकाश भी शामिल थे। पार्टी के प्रतिभावान नेता सिद्धरमैया पहले ही पार्टी से नाता तोड़ चुके थे। प्रकाश और सिद्धरमैया दोनों ने ही बाप-बेटे के वर्चस्व को इसकी वजह बताई थी। इस तरह जद-एस को 'थांडे-मक्कल पार्टी' (बाप-बेटे की पार्टी) भी कहा जाने लगा। 
 
पार्टी में हुई टूट-फूट का असर यह हुआ कि 2008 के चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के सामने जद-एस कोई खास चुनौती ही नहीं पेश कर पाई। विधानसभा में इसके सदस्यों की संख्या 57 से घटकर 17 पर आ गई। हालांकि 2013 के चुनाव में भाजपा से येदियुरप्पा के अलग हो जाने से जद-एस को फायदा हुआ और वह 40 सीटों के आंकड़े पर पहुंच गई थी। लेकिन 2018 के चुनाव में क्या होगा? अभी तक भाजपा ने जद-एस को लेकर हमलावर तेवर नहीं अख्तियार किए हैं। कोई नहीं कह सकता कि भविष्य में क्या होगा?
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