बिजनेस स्टैंडर्ड - गडकरी का उदाहरण
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गडकरी का उदाहरण

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  April 06, 2018

अगर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में सबसे प्रभावशाली मंत्री का खिताब देना हो तो वह नितिन गडकरी को ही देना होगा। वह उन मंत्रियों में शामिल हैं जो नीतियों पर या प्रशासनिक ढंग से काम करने के बजाय जमीनी काम पर नजर जमाए रखते हैं। उनके पास भरपूर विचार और ऊर्जा हैं और उनका प्रदर्शन भी अच्छा रहा है। बीते चार साल में उन्होंने राजमार्ग निर्माण की गति को करीब-करीब तीन गुना कर दिया है और यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। उन्हें विरासत में थमी हुई परियोजनाएं और निजी सार्वजनिक साझेदारियों के विवाद ही मिले थे। 

 
हर रोज 27 किलोमीटर राजमार्ग निर्माण करना कोई छोटी बात नहीं है। कहा गया कि वर्ष 2017-18 में रोज इतने लंबे राजमार्ग बने हैं। यह वैसा ही है जैसे दिल्ली-जयपुर राजमार्ग या बेंगलूरु-चेन्नई अथवा कोलकाता-जमशेदपुर राजमार्ग को 10 दिन में तैयार कर लिया जाए। निश्चित रूप से कुछ अन्य केंद्रीय मंत्रियों की तरह गडकरी में भी उपलब्धियों को बढ़ाचढ़ाकर पेश करने और पूर्ववर्तियों के काम को कम आंकने की आदत है लेकिन इससे उनकी उपलब्धियां कम करके नहीं आंकी जा सकतीं।  कुछ अन्य सक्रिय मंत्रियों की बात करें तो रेलवे के प्रभारी रहते सुरेश प्रभु और बिजली तथा नवीकरणीय ऊर्जा विभाग में रहते पीयूष गोयल ने भी ऐसा ही काम किया। प्रभु ने रेलवे के पोर्टफोलियो में नई ऊर्जा का संचार किया। उन्होंने बहुत बड़े पैमाने पर बदलाव की शुरुआत की थी। इसके लिए पर्याप्त बजट की व्यवस्था की गई। परंतु हाई-स्पीड फ्रेट कॉरिडोर और ज्यादा ताकतवर इंजनों जैसी परियोजनाओं को फलीभूत होने में वक्त लगता है। इसलिए उनके काम का परिणाम अभी लोगों के सामने आने में वक्त लगेगा। गोयल बिजली और कोयला मंत्रालय में बहुत सक्रिय रहे और उन्होंने कई रोचक हल पेश किए। उदाहरण के लिए राज्यों में तार्किक बिजली दर, कम पूंजी लागत और बिजली वितरण कंपनियों को कर्ज से मुक्त करने की योजना। खेद की बात है कि उनकी इस योजना को आंशिक सफलता ही मिल सकी। कोयला खदानों की नीलामी के बारे में भी यही बात कही जा सकती है क्योंकि परियोजनाओं में धीमेपन के चलते उनकी यह योजना भी राजस्व के मोर्चे पर वादे पर खरी नहीं उतर सकी। नवीकरणीय ऊर्जा के उनके कार्यक्रमों को कहीं अधिक सफलता मिली। इसके अलावा एलईडी बल्ब पेश करने और बिजली की खपत कम करने की उनकी योजना भी सफल रही। 
 
यह मोदी की बदकिस्मती कही जाएगी कि उनके पास इन जैसे अन्य सक्रिय मंत्री नहीं हैं। बिना विकल्प के उन्हें अच्छे प्रदर्शन के लिए अधिकारियों पर निर्भर रहना पड़ा। स्वच्छ भारत अभियान में हमें इसकी सफलता भी देखने को मिली। प्रतिबद्घ नौकरशाहों ने इसे सफल बनाया। परंतु कई अन्य योजनाओं में ऐसा नहीं हो सका उनमें प्रभावी राजनीतिक नेतृत्व की आवश्यकता थी। उदाहरण के लिए नागरिक उड्डïयन मंत्री (जिन्होंने हाल में पद छोड़ा) को तीन साल पहले ही एयर इंडिया के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू कर देनी थी। इसके अलावा मौजूदा हवाई अड्डïों पर भीड़ बढऩे के पहले ही उनको नए हवाई अड्डïों के निर्माण के लिए काम करना था।  इसी तरह गंगा सफाई कार्यक्रम को भी शुरू से ही उचित नेतृत्व की आवश्यकता थी, तभी यह कोई उल्लेखनीय बदलाव ला पाती। कौशल विकास कार्यक्रम ने भी निराश किया। संचार मंत्री के कार्यकाल में इस क्षेत्र का मूल्य ह्रïास ही हुआ। रक्षा मंत्रालय तमाम तरह की सुधारों की जद्दोजहद में रहा लेकिन वहां काफी समय तक कामचलाऊ निगरानी ही रही। विभाग में पूर्णकालिक मंत्रियों का कार्यकाल भी छोटा ही रहा। इसका परिणाम यह है कि अधिकांश पुरानी योजनाएं ही बरकरार हैं।
 
स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि के क्षेत्र में बीते चार साल में सकारात्मक बदलाव देखना मुश्किल है। इन विभागों के मंत्रियों के नाम तक आसानी से याद नहीं आते। हालांकि स्मृति ईरानी शिक्षा तथा कुछ अन्य वजहों से अवश्य सुर्खियों में रहीं। हाल में नियुक्त मंत्रियों की बात करें तो अल्फॉन्स कन्नमथनम अपन्ी छवि बनाने की कोशिश कर रहे हैं जबकि हरदीप पुरी शहरी विकास मंत्रालय में सक्रिय तो हैं लेकिन उनका ध्यान दिल्ली पर ही केंद्रित दिख रहा है। यही वजह है कि स्पष्टï जनादेश वाली सरकारों में अहम मंत्रालयों में क्षमतावान और ऊर्जावान लोगों को तैनात किया जाना चाहिए और काम करने देना चाहिए। मोदी सरकार ने अगर ऐसा किया होता तो इस मोड़ पर उसका प्रदर्शन कहीं अधिक बेहतर होता।
Keyword: road, construction, company, NHAI,,
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