बिजनेस स्टैंडर्ड - कारोबारी प्रशासन, जांच और पद से दूरी
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, August 17, 2018 10:31 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

कारोबारी प्रशासन, जांच और पद से दूरी

कनिका दत्ता /  April 05, 2018

जब नीरव मोदी से जुड़ा घोटाला सार्वजनिक हुआ तो मीडिया में सार्वजनिक क्षेत्र के प्रबंधन मानकों को लेकर जबरदस्त आक्रोश देखने को मिला। परंतु दो हालिया विवाद बताते हैं कि निजी क्षेत्र में भी हालत कुछ बेहतर नहीं है। आईसीआईसीआई-वीडियोकॉन का मामला सुर्खियों में है। यह सन 2017 में इन्फोसिस को हिला कर रख देने वाले घोटाले से किसी भी तरह कम नहीं है। 

इन मामलों में क्रमश: देश के सबसे बड़े निजी बैंक और दूसरी सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी ने मुख्य कार्याधिकारियों की अनियमितताओं की जांच आरंभ की। इन दोनों मामलों का खुलासा व्हिसल ब्लोअर ने किया। दोनों ही मामलों में जांच के चालू होने पर भी मुख्य कार्याधिकारियों ने अपना पद नहीं छोड़ा। 

विशाल सिक्का इन्फोसिस के बोर्ड में जमे रहे और उन्होंने खुद को क्षत्रिय योद्घा घोषित कर दिया। यह तब था जबकि एक बाहरी जांच ने करीब 20 करोड़ डॉलर मूल्य में इजरायली कंपनी पनाया के अधिग्रहण में अनियमितता होने की आशंका जता दी थी। इसी तरह चंदा कोछड़ भी वीडियोकॉन को बैंक ऋण देने के मामले की जांच के दौरान पद पर बनी हुई हैं। जानकारी के मुताबिक उनके पति और वीडियोकॉन के बीच एक भारी सौदा हुआ था। लब्बोलुआब यह है कि सिक्का को पनाया सौदे की जांच तथा अन्य विवादों के दौरान खुद को पूरे प्रकरण से दूर रखना चाहिए था और इस समय कोछड़ को यही करना चाहिए। 

किसी विवादास्पद स्थिति में खुद को हितों के टकराव से बचाने या संभावित प्रभाव को नकारने के लिए संस्थान से दूर होना इस्तीफा देने से अलग होता है। इससे मुख्य कार्याधिकारी की ईमानदारी पर यकीन और अधिक मजबूत होता है। कोई भी कानून इन हालात में ऐसी दूरी बनाने की मांग नहीं करता लेकिन हितों में टकराव के चलते यह आवश्यक है। दोनों मामलों में इससे ग्राहकों और अंशधारकों को आश्वस्ति मिलती और कंपनियां झटकों से उबर आतीं। यह तब और आवश्यक था जबकि दोनों मामलों में अपारदर्शी तरीके से क्लीन चिट प्रदान की गई। सत्यम मामले के बाद हमें पता ही है कि कॉर्पोरेट बोर्ड को लेकर कैसी सतर्कता बरती जाती है। ऐसे में क्या अंशधारकों को सीईओ के बारे मे कंपनी की राय माननी चाहिए? इसके अलावा क्या जब समस्या से जुड़ा सीईओ पद पर आसीन है तो क्या जांच को निष्पक्ष माना जा सकता है? 

पिछले साल के इन्फोसिस संकट पर नजर डालते हैं। जून में कंपनी के प्रबंधन ने घोषणा की थी कि दो व्हिसल ब्लोअर के आरोपों की जांच के लिए गठित स्वतंत्र एजेंसी ने प्रबंधन को तमाम आरोपों से बरी कर दिया है। हालांकि यह समिति भी कंपनी के प्रवर्तक एन आर नारायण मूर्ति के इस बात की सार्वजनिक चर्चा के बाद गठित की गई थी। कंपनी की वेबसाइट पर निष्कर्षों का संक्षिप्त ब्योरा दिया गया है। परंतु कंपनी पूरी रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं कर रही है। उसका कहना है कि इससे भविष्य की जांच में व्हिसल ब्लोअर का खरापन प्रभावित होगा। सिक्का भले ही जानबूझकर बेईमानी करने की जगह गलत निर्णय लेने के दोषी रहे हों लेकिन अगर वह प्रबंधन से बाहर होते तो जांच कहीं अधिक मजबूत हो सकती थी। 

मूर्ति इस बात को लेकर सुनिश्चित थे कि बोर्ड कुछ न कुछ छिपा रहा है। इसके साथ ही मूर्ति तथा अन्य संस्थापक अंशधारकों को सिक्का के प्रदर्शन में तमाम अन्य कमियां नजर आईं। एक महीने की उठापटक के बाद सिक्का और अन्य बोर्ड सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया और नंदन नीलेकणी के गैर कार्यकारी चेयरमैन बनने का रास्ता साफ हो गया।

ध्यान देने की बात है कि नीलेकणी के नेतृत्व वाले बोर्ड ने भी रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से मना कर दिया। उन्होंने भी पिछली वजह दोहराई। परंतु इससे कोई बवाल नहीं हुआ क्योंकि सबकी आंखों में खटक रहे सिक्का बोर्ड से जा चुके थे। आईसीआईसीआई बैंक में अब तक केवल चेयरमैन एम के शर्मा का वक्तव्य आया है कि आंतरिक जांच में कोछड़ के पति और वीडियोकॉन के कारोबारी सौदों और वीडियोकॉन को दिए ऋण में कोई लेनदेन जैसी बात साबित नहीं हुई है। शर्मा ने जोर देकर कहा कि चंदा कोछड़ को जांच तक पद से हटने की कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन इससे खुद कोछड़ को कोई फायदा नहीं हुआ। चंदा कोछड़ एक समय मीडिया से आसानी से मुखातिब हो जाती थीं। एक वक्त था जब मीडिया को उनकी साडिय़ों की पसंद से लेकर उनके हनुमान चालीसा के पाठ तक हर बात की जानकारी रहती थी लेकिन अब भले ही वह बैंक की मुखिया बनी हुई हैं लेकिन उनके बारे में कुछ भी सुनने को नहीं मिल रहा है।

अब बैंक के पूर्व चेयरमैन और प्रबंध निदेशक एन वाघल उनके बचाव में सामने आए हैं। अक्षुण्ण प्रतिष्ठा के धनी वाघल शर्मा और कोछड़ के पक्ष में बोल रहे हैं। लेकिन उन्होंने भी यह सुझाव दिया है कि आईसीआईसीआई बैंक को भ्रम दूर करने के लिए सारी बात सार्वजनिक करनी चाहिए। अगर ऐसा होता तो कोछड़ केंद्रीय जांच ब्यूरो की प्रारंभिक जांच से भी बच सकते थे। सवाल यह भी है कि सीबीआई को एक निजी सौदे की जांच करने की आवश्यकता क्यों पड़ी। तमाम बातों के बीच देखा जाए तो अपर्याप्त खुलासों और कोछड़ के अपने पद पर बने रहने से अंशधारकों के मन में वे सवाल उठने लगे हैं जो एक अमेरिकी कांग्रेस सदस्य ने वाटरगेट मामले के दौरान उठाए थे। सवाल यह है कि आखिर बोर्ड सदस्यों को इस बारे में कितनी जानकारी थी और उन्हें यह जानकारी कब मिली? कोछड़ को जल्दी अहसास हो जाएगा कि ये सवाल जल्दी खत्म होने वाले नहीं हैं। 
Keyword: नीरव मोदी, आईसीआईसीआई, वीडियोकॉन,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या पीसीए नियमों में सार्वजनिक बैंकों को मिलनी चाहिए ढील?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.