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निजी क्षेत्र में कारगर नहीं सरकारी  भ्रष्टाचार निरोध

अजय शाह /  April 05, 2018

भ्रष्टाचार शब्द से तात्पर्य सरकारी क्षेत्र के निर्णयों से है। अगर निजी क्षेत्र की कंपनियों के निर्णयों को इसमें शामिल करते हैं तो यह गलत है। निजी क्षेत्र के उपक्रम सक्षम हैं क्योंकि वे अपने कर्मचारियों को निर्णय लेने की शक्ति दे सकते हैं। यह अधिकार पिछले अनुभव, संदर्भ और विश्वास जैसी बातों पर आधारित होता है। अगर हम निजी क्षेत्र के उपक्रमों को भी सरकारी की तरह व्यवहार करने को विवश करेंगे तो हमारी आर्थिक गतिशीलता प्रभावित होगी। निजी क्षेत्र में शुचिता पैदा करने वाली जांच परख को मजबूत करने की आवश्यकता है लेकिन जिन नीतिगत सुधारों की जरूरत है उनका सरकारी क्षेत्र की भ्रष्टाचार निरोधक मशीनरी से कोई वास्ता नहीं है। 

भ्रष्टाचार शब्द का तात्पर्य किसी राजनेता या नौकरशाह को प्रभावित करने वाले व्यक्तिगत लाभ से है। सार्वजनिक जीवन व्यवस्था में भ्रष्टाचार कम करने के लिए जरूरी है कि विवेकाधीन अधिकार कम किए जाएं, पारदर्शिता में इजाफा किया जाए, औपचारिक क्रय प्रक्रिया का निर्धारण हो तथा अन्य उपाय किए जाएं। सबसे आखिर में आती है भ्रष्टाचार निरोधक मशीनरी जिसमें भ्रष्टाचार निरोधक कानून (पोका) भी शामिल है। भारत में कई लोग अब इस मशीनरी को निजी क्षेत्र में ले जाना चाहते हैं।


निजी उपक्रमों में निर्णय प्रक्रिया सरकारी क्षेत्र से एकदम अलग होती है। यहां उच्च स्तर की अनौपचारिकता निर्णय प्रक्रिया की पहचान है। जो कारक मायने रखते हैं उनमें मित्रों की राय और उनके अनुभव, अतीत के अनुभव और भरोसा आदि शामिल हैं। हर तरह के अनुबंध अधूरे होते हैं और निजी क्षेत्र में भरोसेमंद पक्षकारों से हमेशा यह अपेक्षा की जाती है कि वे निरंतर बातचीत करते रहेंगे और अनुबंध की शर्तों को जरूरत के मुताबिक बदलते रहेंगे।

निजी क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा उचित निर्णय लिए जाने में मित्र और परिजन शामिल होते हैं। कारोबार उन लोगों से किया जाता है जिनका अतीत में अच्छा प्रदर्शन और व्यवहार रहा हो। इसके समर्थन में आर्थिक दलील के तीन तत्त्व हैं। पहला, जाने-पहचाने लोगों के साथ व्यवहार में सीमित जानकारी का होना। दूसरा, बारंबार दोहराव से व्यवहार में सुधार। जब कोई बड़ा रिश्ता दांव पर लगा हो तो किसी भी अनुबंध के मामले में हर व्यक्ति अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करता है। आखिर में, अधूरे अनुबंध और कमजोर अनुबंध प्रवर्तन की समस्या। भारतीय कारोबारी माहौल में भारी अनिश्चितता है। भारतीय न्याय व्यवस्था प्रवर्तन के मोर्चे पर कमजोर है। इसे भरोसेमंद मित्रों और परिवार की उपादेयता बढ़ती है क्योंकि इनके साथ अनुबंध की शर्तों को निरंतर सद्भाव में बदला जा सकता है।

सार्वजनिक क्षेत्र से आने वाले लोगों को यह करीबी और सांठगांठ, विफलता की जमीन तैयार करती नजर आती होगी। परंतु निजी क्षेत्र को प्रतिस्पर्धा का दबाव, मुनाफे की तिमाही रिपोर्टिंग और शेयर कीमतों की रोज की रिपोर्टिंग जैसी बातें ईमानदार बनाए रखती हैं।
जब कोई कंपनी खराब निर्णय लेती है तो उसकी बाजार हिस्सेदारी पर इसका असर होता है, उसकी राजस्व वृद्धि प्रभावित होती है, मुनाफा घटता है और शेयर कीमतें भी गिरती हैं। इससे अंशधारकों के लिए चेतावनी पैदा होती है और बोर्ड इस नाकामी को दूर करने के जतन करता है।

सरकारी क्षेत्र की अनुबंध प्रणाली तीन तरह से अलग होती है। पहली बात, बाजार हिस्सेदार के आकलन, राजस्व, मुनाफे और शेयर कीमतों के आकलन से जुड़ी जवाबदेही एकदम नदारद होती है। दूसरा, निरंतर प्रयास से व्यवहार को बेहतर करने की प्रक्रिया सरकारी कर्मचारियों के बार-बार बदलाव से प्रभावित होती है। तीसरा, अनुबंधों को उल्लिखित रूप में ही लिया जाता है और शर्तों को निरंतर दोबारा तय करना नहीं हो पाता। इन अंतरों के चलते पारदर्शिता, नियत प्रक्रिया और भ्रष्टाचार के विरोध के स्तर पर सरकारी क्षेत्र काफी अलग हो जाता है।

ऐसे भी हालात बनते हैं जहां निजी फर्म के कर्मचारी निजी हितों के चलते गलत निर्णय ले बैठते हैं। निजी क्षेत्र इससे निपटने के लिए आंतरिक जांच, निष्कासन, प्रतिष्ठा को क्षति जो भविष्य की संभावनाओं को धूमिल करती है और अदालत में जवाबदेही तय करने जैसे कदम उठाता है। इस प्रक्रिया को प्रभावी बनाने वाला कारक है स्वतंत्र अंशधारकों और स्वतंत्र निदेशकों की शक्ति। ये कंपनी को रोजमर्रा के आधार पर संचालित करने में मदद करते हैं।

हमें यह समझना चाहिए और निजी संस्थानों की इस संस्थागत क्षमता को मजबूती देनी चाहिए। केवल सरकारी क्षेत्र की भ्रष्टाचार निरोधक मशीनरी को निजी क्षेत्र में प्रतिरोपित करके ऐसा नहीं किया जा सकता है। अगर भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम को निजी उपक्रमों पर लागू किया गया तो अनिवार्य तौर पर सरकारी क्षेत्र की पारदर्शिता और औपचारिक सरकारी खरीद प्रक्रिया आदि का भी अनुसरण करना होगा।
यह काफी हद तक निजी कपंनियों को सरकारी कंपनियों में बदलने जैसा होगा। निजी क्षेत्र की लचीली और समझदारी भरी निर्णय प्रक्रिया का अंत हो जाएगा। यह बात वित्तीय जगत के लिए खासतौर पर सही है जहां अच्छे निर्णय काफी हद तक तात्कालिक फैसलों पर निर्भर करते हैं।

सरकारी और निजी क्षेत्रों के बीच स्पष्ट रेखा होनी चाहिए। निजी उपक्रमों को बाजार की विफलता संबंधी नियमों का पालन करना चाहिए। उदाहरण के लिए एक रिफाइनरी को प्रदूषण नहीं फैलाना चाहिए। जब भी उल्लंघन का मामला सामने आए तो वित्तीय जुर्माना लगाया जाना चाहिए। सरकार को इस पचड़े में नहीं पडऩा चाहिए कि निजी फर्म के भीतर गलत निर्णय कैसे हो गया। नही इसके आधार पर कोई कदम उठाया जाना चाहिए। यह काम कंपनी के बोर्ड और प्रबंधन पर छोड़ दिया जाना चाहिए।

दूसरी बात, निजी क्षेत्र को ईमानदार बनाए रखने का एक कारक बैंकिग नियमन भी है। मजबूत बैंकों में फंसे हुए कर्ज के सामने आने से स्थिति तेजी से खराब होती है क्योंकि उस कर्ज को चिह्नित कर उसकी प्रोविजनिंग की जाती है। इससे मुनाफे की तिमाही रिपोर्ट में फंसे हुए कर्ज पर तत्काल फीडबैक आता है और शेयर कीमतों पर भी इसका असर होता है। यह अंशधारकों और कंपनी बोर्ड दोनों को प्रभावित कर सकता है।

तीसरी बात, प्रतिस्पर्धा नीति पर और काम करने की जरूरत है। जब प्रतिस्पर्धा कमजोर होती है तो निजी कंपनियों के लोग बुरे निर्णय लेते हैं और बाजार हिस्सेदारी या मुनाफे पर असर भी नहीं पड़ता। घरेलू और विदेशी कारोबारियों के बैंकिंग में प्रवेश से निजी बैंकों पर उचित दबाव पड़ेगा। चौथी बात, हमें अल्पांश हिस्सेदारों को और अधिक शक्ति प्रदान करने और बोर्ड के कामकाज पर काम करना होगा। देश में सबसे मजबूत वही कंपनियां हैं जहां सीईओ की शक्ति सीमित है।

वित्त मंत्रालय को इस समस्या के निपटारे में अहम भूमिका निभानी होगी। उदाहरण के लिए बमुश्किल एक दशक पहले केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी)और वित्त मंत्रालय के बीच म्युचुअल फंड को लेकर ऐसी ही चर्चा चली थी और सीवीसी इस बात को लेकर संतुष्ट था कि इन फंड के संचालन की प्रणाली पर्याप्त है। वित्त मंत्रालय को एक कार्य योजना तैयार कर निजी बैंकों के कर्मचारियों को भ्रष्टाचार निरोधक कानून के दायरे से बाहर रखना चाहिए।
Keyword: भ्रष्टाचार, निजी क्षेत्र, उपक्रम,
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