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दोबारा बोली का हर मामला नया नहीं

इंदिवजल धस्माना / नई दिल्ली April 04, 2018

दिवालिया कानून के तहत बोली लगाने के नियमों में संभावित रियायत वर्तमान मामलों की फिर से लगने वाली बोलियों पर भी लागू हो सकती है। यह इन बोलियों के ढांचे और प्रारूप पर निर्भर करेगा। सरकार ने आज यह साफ कर दिया है।  इसके अलावा कानून के प्रस्तावित ढांचे में व्यक्तिगत दिवालिया मामले की शुरुआत के लिए न्यूनतम सीमा को 1,000 रुपये से बढ़ाकर 10,000 रुपये किया जा सकता है। इस प्रस्तावित ढांचे की घोषणा जल्द की जाएगी। कंपनी मामले के सचिव इंजेती श्रीनिवास ने संवाददाताओं को बताया कि अगर कंपनी दिवाला में बोलियों का ढांचा और प्रारूप पहले से अलग हुआ तो नया मामला माना जाएगा। उन्होंने कहा, 'अगर प्रारूप बदल गया तो यह पहले के समान बोली नहीं है।'
 
अगर ये पहले के समान हैं तो इन्हें पुराना मामला ही माना जाएगा। उन्होंने ये बातें भारतीय उद्योग परिसंघ के एक कार्यक्रम से इतर कही। विशेषज्ञों ने कहा कि वह ढांचा या प्रारूप क्या है, वह व्याख्या के लिए खुला रह सकता है। श्रीनिवास की अध्यक्षता वाली एक समिति ने बोलियों के नियमों में ढील देने की सिफारिश की थी।  एस्सार स्टील जैसे दिवालिया मामले फिर से बोली के मामले में उलझे हुए हैं। हालांकि समिति की सिफारिशें सरकार ने अभी स्वीकार नहीं की हैं। लेकिन सिफारिशें स्वीकार करने पर आईबीसी में संसद में संशोधन करना होगा। श्रीनिवास ने कहा कि जिन माममों में समाधान योजना पहले ही सौंपी जा चुकी हैं, उन पर बदलावों का कोई असर नहीं होगा, भले ही वे अभी प्रभावी नहीं हुए हों। 
 
उन्होंने समिति की सिफारिशों का बचाव करते हुए कहा कि वह कभी यह इरादा नहीं रहा कि सरकार सभी प्रवर्तकों की भागीदारी पर रोक लगा दे। इससे पहले सरकार ने दिवालिया कानून में धारा 29 (ए) शामिल की थी। इस धारा के तहत डिफॉल्ट करने वाले प्रवर्तकों, संबंधित पक्षों और डिफॉल्ट करने वाली कंपनियों से जुड़े लोगों के लिए कंपनी के लिए बोली लगाने में शिरकत करने पर रोक लगाई गई है।  उन्होंने इस समय चल रहे विभिन्न दिवालिया मामलों के बारे में कहा, 'हम पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।' बिनानी सीमेंट से संबंधित मामले में श्रीनिवास ने कहा कि सरकार का मकसद वर्तमान प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का नहीं है, जिसमें एक अद्र्ध-न्यायिक संस्था और एक अधिकार प्राप्त संस्था मामलों को देख रही हैं। बिनानी सीमेंट मामले में राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने सभी पक्षों से आपसी सहमति से मामले को निपटाने के लिए कहा है। उन्होंने कहा, 'लेकिन हमें उभरती चुनौतियों को दूर करना होगा... अंतिम उद्देश्य कंपनी को बचाना है।' 
 
उनसे एक सवाल पूछा गया कि क्या सरकार दिवालिया कानून में संशोधन के लिए अध्यादेश ला सकती है? इस पर उन्होंने कहा कि यह फैसला सक्षम संस्था करेगी। इस बात का फैसला सरकार लेगी कि समिति की कितनी सिफारिशें लागू करना जरूरी हैं, कितनी जरूरी नहीं हैं और कितनी अच्छी हैं, लेकिन उन्हें जल्द लागू करने की कोई जरूरत नहीं है।  उन्होंने कहा कि देश में कम से कम 5 करोड़ सूक्ष्म, मझोली और लघु कंपनियां हैं, इसलिए सभी के लिए उपयुक्त एक ही तंत्र नहीं बनाया जा सकता। समिति ने लघु एवं मझोले उद्योगों (एसएमई) के प्रवर्तकों के लिए शर्तों में ढील देने की सिफारिश की थी। इनके लिए केवल इरादतन डिफॉल्टरों को बोली लगाने की मंजूरी नहीं दी जाएगी।  श्रीनिवास ने कहा कि व्यक्तिगत दिवालियापन के नियमों की अधिसूचना जल्द ही जारी की जाएगी। ये नियम पहले कंपनी गारंटरों, फिर साझेदार कंपनियों और अंत में व्यक्तियों के लिए जारी किए जाएंगे। एनसीएलटी से इतर यह कर्ज वसूल करने वाला न्यायाधिकरण है, जो इन दिवालिया मामलों का फैसला लेगा। 
Keyword: defaulter, CCI,,
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