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बाजार को खुदरा निवेशकों से रहेगी समर्थन की आस

बाजार संकेतक
देवांग्शु दत्ता /  April 03, 2018

मार्च में शेयर बाजार में नकारात्मक प्रतिफल के बावजूद सशक्त संस्थागत निवेश देखने को मिला। संस्थागत निवेशकों ने इक्विटी में कुल 183 अरब रुपये लगाए जिसमें विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के 116.5 अरब रुपये और घरेलू संस्थागत निवेशकों के 66.9 अरब रुपये शामिल हैं। इसके बावजूद मार्च में निफ्टी फरवरी की तुलना में 3.6 फीसदी की गिरावट पर बंद हुआ। संस्थागत खरीद के बावजूद निफ्टी में गिरावट की वजह यह रही कि खुदरा निवेशकों ने जमकर बिकवाली की। घरेलू संस्थागत निवेशकों और एफपीआई के रुख में बहुत कम मौकों पर ही आमराय दिखती है। ऐसा होने पर बाजारों के लिए विपरीत रुख अख्तियार कर पाना बहुत मुश्किल होता है। इसके बावजूद मार्च में सूचकांकों की गिरावट दिखाती है कि गत दो वर्षों में खुदरा निवेशकों से बाजार को 'तगड़ी चोट' लगी है।

 
मार्च वित्त वर्ष का आखिरी महीना होता है और निवेशकों के दिमाग में कर बचत की चिंताएं हावी रहती हैं। अगर खुदरा निवेशकों की धारणा में गिरावट एक स्थायी प्रवृत्ति हो चुकी है तो फिर हमें अप्रैल में म्युचुअल फंड के प्रवाह पर करीबी नजर रखनी होगी। यह बात गौर करने लायक है कि अंतिम दो महीनों में नकारात्मक रुझान के बावजूद प्रमुख सूचकांकों में 10.2 फीसदी की वार्षिक वृद्धि रही। हालांकि बॉन्ड बाजार को अस्थायी राहत मिलने की संभावना दिख रही है। केंद्र सरकार पहली छमाही में 2.88 लाख करोड़ रुपये की ही उधारी करने वाली है जबकि पिछले साल समान अवधि में उसने 3.72 लाख करोड़ रुपये उधार लिए थे। भारत सरकार ने उधारी के तौर पर वित्त वर्ष 2018-19 में 6.05 लाख करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य तय किया है। इसका मतलब है कि वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में बॉन्ड प्रतिफल बढऩे का दबाव बढ़ जाएगा। भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक समीक्षा समिति इसी हफ्ते नीतिगत दरों और मुद्रा आपूर्ति बनाए रखने के तरीकों पर बैठक करने वाली है। फरवरी में मुद्रास्फीति में हल्की गिरावट देखी गई थी और ब्याज दरों में बढ़ोतरी का कोई खास कारण नजर नहीं आता है। हालांकि नीतिगत ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम ही है। प्रमुख केंद्रीय बैंकों का रवैया भी अनुकूल नहीं है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने मार्च में अपनी ब्याज दरें बढ़ा दी थीं। इस साल दो या तीन बार और वृद्धि की संभावना जताई जा रही है। यूरोपीय सेंट्रल बैंक और बैंक ऑफ जापान भी सामान्य स्थिति बहाल करने को लेकर चर्चा कर रहे हैं, यानी दोनों केंद्रीय बैंक अपनी ब्याज दरों में कटौती का कार्यक्रम सुस्त कर सकते हैं। ऐसा होने पर मुद्रा आपूर्ति में कमी आती है और कम तरलता होने से उभरते बाजारों में इक्विटी जैसी जोखिमपूर्ण परिसंपत्तियों में निवेश कम हो सकता है।
 
कच्चे तेल को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। मार्च में भारत के लिए कच्चे तेल का भाव 70 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहा। तेल के भाव बढऩे से 2018-19 में तेल आयात का बिल 2017-18 की तुलना में बढ़ सकता है। पिछले वित्त वर्ष के पहले 11 महीनों में भी तेल आयात बिल 2016-17 के मुकाबले 22 फीसदी अधिक था।  चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध के गंभीर रूप अख्तियार करने की आशंका भी निवेशकों को भयभीत कर सकती है। आगे चलकर यूरोपीय देश भी इस व्यापार युद्ध में घसीटे जा सकते हैं। अपने पड़ोसी को भिखारी बनाने की नीतियों के चलते वैश्विक कारोबार में गिरावट के प्रबल आसार दिख रहे हैं। कॉर्पोरेट जगत के मोर्चे पर बैंकिंग क्षेत्र से लगातार सामने आ रहे घोटालों पर नजरें टिकी हुई हैं और अब यह बीमारी निजी बैंकों को भी चपेट में लेने लगी है। आईसीआईसीआई बैंक-वीडियोकॉन प्रकरण भारत में बैंकिंग क्षेत्र की कुछ बेहद सम्मानित शख्सियतों को असहज स्थिति में डाल रहा है। बैंक का बोर्ड फिलहाल अपनी प्रबंध निदेशक एवं सीईओ चंदा कोछड़ के साथ खड़ा दिख रहा है।
 
अगर खुशनुमा बातों का जिक्र करें तो टाटा स्टील का भूषण स्टील के लिए बोली लगाना यह दिखाता है कि ऋणशोधन एवं दिवालिया कानून सकारात्मक असर डाल रहा है। अगर टाटा के प्रस्ताव को नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल से मंजूरी मिल जाती है तो बकाया कर्ज का 30 फीसदी हिस्सा ही हेयरकट होगा। कम समय में दिवालिया प्रक्रिया का निपटान होना भी एक अहम पहलू है। सरकार एयर इंडिया के विनिवेश की राह पर भी बढ़ रही है। तमाम विरोधों के बावजूद एयर इंडिया के विनिवेश की प्रक्रिया पूरी कर ली जाती है तो केंद्रीय खजाने से बड़ा बोझ हट जाएगा। एयर इंडिया के बेड़े में 115 विमानों की मौजूदगी और विभिन्न पक्षों के साथ हुए कारोबारी करारों के बावजूद यह सौदा उतना मूल्यपरक नहीं लगता। खरीदार को एयर इंडिया पर बकाया 330 अरब रुपयेे के कर्ज का बोझ भी उठाना होगा। इसके अलावा उसे कर्मचारियों को न हटाने की हामी भी भरनी होगी। वर्ष 2019 के नजदीक आने से घरेलू राजनीति भी बाजार की धारणा पर असर डालेगी। कर्नाटक में मध्य मई में होने वाले चुनाव धारणा पर गहरा असर डालेंगे। इससे पता चलेगा कि भाजपा 2019 के आम चुनाव में अपनी सत्ता बरकरार रख पाएगी या नहीं। अगर कर्नाटक के नतीजे कांग्रेस के पक्ष में रहते हैं तो बाजार में बिकवाली का एक और दौर आ सकता है। तकनीकी संदर्भ में बाजार तीव्र गिरावट की ओर बढ़ता दिख रहा है। सूचकांकों का 200 दिनों का औसत कारोबारी स्तर लुढ़का है जिसका मतलब है कि शेयरों का प्रदर्शन 10 महीने पहले की तुलना में बिगड़ा है। शीर्ष स्तर से औसत गिरावट करीब 34 फीसदी रही है। इससे भी खुदरा निवेशकों में अफरातफरी के संकेत दिखते हैं। वैसे संस्थागत निवेशकों का भरोसा कायम रहने पर बाजार में गिरावट होना काफी असामान्य है। नए वित्त वर्ष में खुदरा खरीदारी में तेजी आने से बाजार को भी मजबूती मिलेगी। या संस्थागत निवेशकों का साथ पाकर बड़े स्टॉक बेहतर प्रदर्शन करें जबकि छोटी कंपनियों को नुकसान उठाना पड़े। या फिर संस्थागत निवेश में ही गिरावट आ जाए। अगले पखवाड़े तक कंपनियों के 2017-18 के अंतिम नतीजे आने लगेंगे जिनका निवेश परिदृश्य पर भी असर दिखेगा।
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