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संदेह के बादल

संपादकीय /  April 01, 2018

खबरों के मुताबिक केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने आईसीआईसीआई बैंक की प्रबंध निदेशक और सीईओ चंदा कोछड़ के पति दीपक कोछड़ और वीडियोकॉन समूह के चेयरमैन वेणुगोपाल धूत के खिलाफ प्राथमिक जांच शुरू की है। यह जांच धूत की कंपनी को सन 2012 में दिए गए 40,000 करोड़ रुपये के ऋण से जुड़ी है। निश्चित तौर पर यह केवल शुरुआती जांच है और किसी तरह की गड़बड़ी की पुष्टि इससे नहीं होती। जांच की सूची में चंदा कोछड़ का जिक्र भी नहीं है। आईसीआईसीआई बैंक के बोर्ड ने गत सप्ताह बहुत मजबूती से अपनी एमडी का साथ दिया और तमाम बातों को अफवाह करार दिया। चंदा कोछड़ के बचाव में बोर्ड ने कहा कि आईसीआईसीआई बैंक 20 बैंकों के समूह का सदस्य भर था और ऋण सुविधा में बैंक की हिस्सेदारी 10 फीसदी से भी कम थी। देश में निजी क्षेत्र के सबसे बड़े ऋणदाता ने यह भी कहा कि जिस समय ऋण पारित किया गया, चंदा कोछड़ ऋण समिति की चेयरपर्सन नहीं थीं और बैंक की ऋण मंजूरी प्रक्रिया में यह सुनिश्चित किया जाता है कि किसी भी पद पर बैठा कोई भी कर्मचारी ऋण संबंधी निर्णय को प्रभावित नहीं कर सके।

 
ऋण समिति के काम की करीब निगरानी और उस पर नियंत्रण करने वाले बोर्ड द्वारा आरोपों को इतनी तत्परता से खारिज करने की अपनी वजह हो सकती है। परंतु इससे हितों के टकराव को लेकर कई अहम सवाल उठ खड़े हुए हैं। बैंक के वक्तव्य में इस बात कोई उल्लेख नहीं है कि चंदा कोछड़ के पति और दो करीबी परिजनों ने दिसंबर 2008 में धूत के साथ मिलकर न्यूपावर रिन्यूएबल्स नामक संयुक्त उद्यम का गठन 50:50 की भागीदारी में किया। वीडियोकॉन को ऋण मिलने के छह महीने के भीतर धूत ने अपनी हिस्सेदारी दीपक कोछड़ को हस्तांतरित कर दी। उक्त ऋण में से 86 फीसदी अभी भी बिना चुकता है।
 
आईसीआईसीआई बैंक के वक्तव्य में केवल यह कहा गया कि किसी तरह के आदान-प्रदान, भाई-भतीजावाद या हितों के टकराव का कोई मामला नहीं है। यह पर्याप्त प्रतिक्रिया नहीं है और बैंक तथा उसके बोर्ड को स्पष्ट बताना चाहिए कि वीडियोकॉन समूह को दिए गए ऋण में चंदा कोछड़ की क्या भूमिका रही। क्या उन्होंने इस ऋण के पक्ष में राय दी या फिर उन्होंने हितों के टकराव के चलते खुद को मामले से अलग क्यों नहीं किया? बोर्ड को आंतरिक समीक्षा की प्रक्रिया से भी दुनिया को अवगत कराना चाहिए। यह भी कि यह समीक्षा कब की गई और क्या समीक्षा का खुलासा शेयर बाजार के सामने किया गया? आईसीआईसीआई बैंक के अंशधारकों को यह जानने का पूरा अधिकार है कि कोई बाहरी जांच क्यों नहीं कराई गई।
 
एक सवाल जिसका जवाब चंदा कोछड़ की ओर से अनुत्तरित है, वह यह कि उनके पति की नवीनीकृत ऊर्जा कंपनी और वीडियोकॉन के बीच किस तरह का लेनदेन हुआ। उदाहरण के लिए धूत ने कोछड़ के साथ मिलकर कंपनी की स्थापना की थी और महीने भर बाद वे बहुत मामूली कीमत पर इससे बाहर निकल गए।  धूत की कंपनी सुप्रीम एनर्जी ने न्यूपॉवर को 64 करोड़ रुपये का ऋण दिया वह कहां से आया? इन सवालों के जवाब आईसीआईसीआई बैंक के बारे में काफी बातें साफ करेंगे। चंदा कोछड़ पर पहली बार आरोप मार्च 2016 में निवेशक अरविंद गुप्ता ने लगाए। दो साल बाद भी बैंक उन सवालों का कोई उपयुक्त जवाब नहीं दे पा रहा। कहा जा रहा है नियामक को सारी जानकारी दी गई है लेकिन उसे साझा नहीं किया जा सकता है क्योंकि उनकी प्रकृति ऐसी नहीं है। अब वक्त आ गया है कि बैंक का बोर्ड या चंदा कोछड़ कुछ विशिष्ट खुलासे करें। तभी बैंक पारदर्शिता और जवाबदेही के अपने दावे पर खरा रह सकेगा। ये दोनों बातें कॉर्पोरेट प्रशासन का आधार हैं।
Keyword: ICICI, bank, CBI,,
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