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वित्त वर्ष 2019 निवेशकों के लिए रहेगा उतार-चढ़ाव वाला वर्ष

ऐश्ली कुटिन्हो /  04 01, 2018

भारतीय इक्विटी बाजार 2017-18 के ज्यादातर समय सुर्खियों में रहे और उन्हें मजबूत घरेलू तरलता और अनुकूल वृहद आर्थिक हालात से मदद मिली। दरअसल, इस साल जनवरी तक तेजी काफी शानदार रही जिस दौरान बाजार ने 5 प्रतिशत से ज्यादा की तेजी दर्ज नहीं की। हालांकि यह तेजी फरवरी से पटरी से उतर गई और विश्लेषकों का मानना है कि 2018-19 एक उतार-चढ़ाव वाला वर्ष रहेगा।  वैश्विक बॉन्ड प्रतिफल में तेजी एक ऐसा मुख्य कारक रहा जिसने हाल के उतार-चढ़ाव में योगदान दिया है। भारत की 10 वर्षीय सरकारी प्रतिभूतियों पर प्रतिफल भी ऊंची घरेलू मुद्रास्फीति और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा आक्रामक दर वृद्घि की आशंका से फरवरी में चार वर्ष की ऊंचाई पर पहुंच गया। इसी तरह, राजकोषीय घाटे के बढ़ते लक्ष्य ने आरबीआई द्वारा नीतिगत रुख में बदलाव के संदर्भ में आशंका बढ़ा दी है। इसके अलावा पंजाब नैशनल बैंक से जुड़े घोटाले का भी उन बैंकिंग शेयरों पर प्रभाव पड़ा है जिनका प्रमुख शेयर सूचकांकों में अच्छा भारांश रहा है। बजट में दीर्घावधि पूंजीगत लाभ पर कर (एलटीसीजी) की पुन: पेशकश और म्युचुअल फंड निवेशकों पर ऊंचे कर से भी धारणा प्रभावित हुई है।

 

भारतीय शेयर बाजार फरवरी में 5 प्रतिशत गिरे और मार्च में इनमें 3.5 प्रतिशत की गिरावट आई, जिससे पहले 10 महीनों में दर्ज की गई बढ़त गायब हो गई। इस तरह से बीएसई के सेंसेक्स की 11.3 फीसदी की बढ़त गायब हो गई और 50 शेयर वाले निफ्टी में 2017-18 में 10.2 फीसदी तक की कमजोरी दर्ज की गई। सकारात्मक संदर्भ में, नोटबंदी और जीएसटी की वजह से पहली दो तिमाहियों में धीमी पड़ी आय वृद्घि की रफ्तार दिसंबर 2017 में समाप्त तिमाही में अच्छी रही। विश्लेषकों का मानना है कि आर्थिक सुधार की रफ्तार कायम है और इससे वित्त वर्ष 2019 में कॉरपोरेट आय के दो अंक में बढऩे की उम्मीद मजबूत हुई है।

 

डाल्टन कैपिटल एडवाइजर्स (इंडिया) के प्रबंध निदेशक यू आर भट ने कहा, 'पिछले पूरे वर्ष हमने आय वृद्घि की रफ्तार तेज होने का इंतजार किया, जो अंतत: अब दिख रहा है। लेकिन निर्यात वृद्घि में अभी तेजी नहीं आई है और ब्याज दरें बढऩे का अनुमान है। ये ऐसे कारक हैं जिनसे धारणा प्रभावित हो सकती है।' डॉयचे बैंक के अनुसार, भारत 2014 के मध्य से बुनियादी आधार पर क्षेत्रीय रुझान और निवेशक धारणा के बीच मजबूत अंतर दर्ज किया है, जिसका असर इक्विटी बाजार प्रदर्शन और कॉरपोरेट आय वृद्घि के बीच अंतर में दिखा है। बैंक का मानना है कि इस रुझान में बदलाव आएगा। डॉयचे बैंक में भारतीय शोध प्रमुख अभय लैजावाला ने कहा, 'हालांकि रुझान बढ़ती तेल कीमतों और नीरव मोदी धोखाधड़ी जैसे घरेलू कारकों, दोनों की वजह से कमजोर हुआ है, लेकिन पूरे उद्योग में संकेतकों में बड़ा बदलाव दिखा है।'

 

डॉयचे बैंक के अनुसार, बैंकों की ऋण वृद्घि फरवरी के 4.4 प्रतिशत के एक वर्षीय निचले स्तर की तुलना में दोगुनी से भी ज्यादा बढ़कर 11 प्रतिशत हो गई है, वाणिज्यिक वाहन बिक्री सालाना आधार पर 25 प्रतिशत बढ़ी है और इस्पात उद्योग का क्षमता इस्तेमाल बढ़कर 84 प्रतिशत हो गया, जिससे इस्पात कीमतें बढ़कर 9 वर्ष के ऊंचे स्तर पर पहुंच गईं। अभी भी ऐसे कई कारक हैं जिनसे आने वाले वित्त वर्ष में अनिश्चितता को बढ़ावा मिलेगा। मोतीलाल ओसवाल फाइनैंशियल सर्विसेज के प्रबंध निदेशक रामदेव अग्रवाल ने कहा, 'यह स्पष्टï नहीं है कि क्या सत्तारूढ़ पार्टी अगले साल सत्ता में वापस करेगी। वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और इसे लेकर चिंता बरकरार है कि अमेरिकी फेडरल दरें बढ़ा सकता है। इसके अलावा फंसे कर्ज की समस्या और सार्वजनिक क्षेत्र के एक प्रमुख बैंक में हाल में हुई धोखाधड़ी भी चिंताजनक कारक हैं।'

 

ब्रोकरेज नोमुरा का मानना है कि ऊंची अमेरिकी दरें, डॉलर में तेजी और जी3 केंद्रीय बैंक बैलेंस-शीट में कमी से पूंजीगत निकासी तेज हो सकती है, घरेलू ब्याज दरें बढ़ सकती हैं और रुपये में गिरावट तेज हो सकती है। इससे बाहरी कोष उगाही के दबाव और बैलेंस-शीट पर दबाव का दुष्चक्र पैदा हो रहा है। कई विश्लेषकों का कहना है कि 2018-19 अधिक उतार-चढ़ाव वाला वर्ष होगा। बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच में इंडिया इक्विटी स्ट्रेटेजिस्ट संजय मुकीम कहते हैं कि वैश्विक बाजार अस्थिर हो रहे हैं और इसका असर भारतीय बाजारों पर भी दिखेगा। मुकीम कहते हैं, 'कई वर्षों से, केंद्रीय बैंक बड़ी तादाद में परिसंपत्तियां खरीद रहे हैं और इस साल (2018) के मध्य में हमें परिसंपत्ति खरीदारी कार्यक्रम में कमी आने या इस पर बड़ा दबाव पडऩे की आशंका है। अमेरिकी में ऊंची ब्याज दरें इक्विटी बाजारों पर दबाव बढ़ा सकती हैं। सेंसेक्स के लिए हमारा दिसंबर 2018 का अनुमान 32,000 है।' विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा इक्विटी की शुद्घ खरीदारी 192 अरब रुपये पर धीमी रही। म्युचुअल फंडों और बीमा कंपनियों समेत घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) ने हालांकि पिछले तीन वर्षों में खरीदारी बढ़ाई है। डीआईआई ने 2017-18 में डीआईआई ने 1.03 लाख करोड़ रुपये के शेयर खरीदे।

 

विश्लेषकों का कहना है कि हालांकि  2018 में कई राज्यों में चुनाव और अगले साल आम चुनावों को देखते हुए घरेलू नकदी समर्थन के बावजूद बाजारों के लिए राह आसान नहीं होगी। नोमुरा का कहना है कि चालू खाते का घाटा 2018 में बढ़कर जीडीपी के 2 प्रतिशत हो जाने की आशंका है, जो 2017 के 1.7 प्रतिशत से ज्यादा है।  इसके अलावा कृषि संकट से भी सरकार को लोक-लुभावन नीतियों की घोषणा करने के लिए बढ़ावा मिल सकता है। वहीं गैर-निष्पादित आस्तियां भी चालू वर्ष 2018 की तीसरी तिमाही तक कुल अग्रिमों के 11.1 प्रतिशत पर पहुंच सकती हैं जो एक साल पहले 10.2 प्रतिशत थीं।
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