बिजनेस स्टैंडर्ड - बढ़े एनपीए के बीच फिसला मुनाफा
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बढ़े एनपीए के बीच फिसला मुनाफा

अनूप रॉय /  March 30, 2018

वित्त वर्ष 2017-18 की शुरुआत भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के लिए अच्छी रही। पांच संबद्ध बैंकों के विलय के बाद भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) दुनिया के शीर्ष 50 बैंकों में शुमार हुआ। परंतु चौथी तिमाही आते-आते दूसरे सबसे बड़े सरकारी बैंक, पंजाब नैशनल बैंक में 130 अरब रुपये का घोटाला सामने आया जिसे एक चर्चित आभूषण कारोबारी नीरव मोदी ने अंजाम दिया था। दूसरी ओर, 10 वर्ष की सरकारी प्रतिभूतियों पर प्रतिफल में भी गिरावट आई और यह अप्रैल 2017 के 7.47 फीसदी से घटकर नवंबर में 6.19 फीसदी हुई और अब 7.4 फीसदी पर है। बैंकों, खासतौर पर सरकारी बैंकों के फंसे हुए कर्ज में बढ़ोतरी हुई। इसके लिए नियामकीय खुलासे पर जोर भी कुछ हद तक जवाबदेह है।

 
इससे पता चलता है कि यह वर्ष बहुत उतार-चढ़ाव लिए रहा। एसबीआई ने दिसंबर तिमाही में भारी नुकसान होने की बात कही। बीते दो दशक में यह पहला अवसर था जब उसने नुकसान दिखाया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आरबीआई द्वारा परिसंपत्तियों की पुनरीक्षा के लिए कहने के बाद भारी तादाद में फंसा हुआ कर्ज सामने आया। इसके अतिरिक्त दिसंबर तिमाही में कमजोर प्रतिफल ने भी उसे प्रभावित किया। बैंक ने 24.16 अरब रुपये के तिमाही नुकसान की जानकारी दी जबकि अनुमान इतने ही लाभ का लगाया गया था। देश के बैंक पूरे साल फंसे कर्ज से जूझते रहे। बैकिंग क्षेत्र का सकल एनपीए अनुपात मार्च 2016 में कुल अग्रिम का 7.69 फीसदी था जो दिसंबर 2017 तिमाही के अंत तक बढ़कर 10.32 फीसदी यानी करीब 8.86 लाख करोड़ रुपये हो गया। सरकारी बैंकों की बात करें तो दिसंबर तिमाही के अंत तक उनका सकल एनपीए अनुपात 13.03 फीसदी रहा।
 
यही वजह है कि इस वर्ष बैंकिंग क्षेत्र घाटे में रहा। हालांकि मार्च 2016 तिमाही के अंत में भी यह घाटे में ही था। घाटे के लिए पूरी तरह सरकारी बैंक जवाबदेह रहे क्योंकि वे फंसे हुए कर्ज की प्रॉविजनिंग करने में नाकाम रहे। हालांकि इसका असर बैकिंग उद्योग के बाजार मूल्यांकन पर नजर नहीं आया। दिसंबर 2017 तिमाही में बैंकिंग क्षेत्र का समेकित बाजार मूल्यांकन 17.86 लाख करोड़ रुपये हो गया जबकि मार्च 2016 में यह 10.80 लाख करोड़ रुपये था। गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) ने बैंकिंग क्षेत्र की कमियों को कुछ हद तक पूरा किया और उनका शुद्ध मुनाफा और बाजार पूंजीकरण दोनों में इजाफा हुआ। आरबीआई की रुझान और प्रगति संबंधी रिपोर्ट में कहा गया कि कुल ऋण में एनबीएफसी की हिस्सेदारी मार्च 2008 के 9.5 फीसदी से बढ़कर मार्च 2017 में 15.5 फीसदी हो गई है। एनबीएफसी के ऋण की गहनता यानी जीडीपी के प्रतिशत के रूप में बांटे गए ऋण में भी मजबूत और स्थिर गति से इजाफा हुआ है और मार्च 2017 के अंत में यह 8 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई। इस क्षेत्र के एनपीए में भी इजाफा हुआ है। वर्ष 2012 के 2.8 फीसदी की तुलना में यह बढ़कर कुल अग्रिम का 4.8 फीसदी हो गया है। इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंगक्रप्टसी कोड भी मई 2016 में अस्तित्व में आया लेकिन इसने वास्तव में काम शुरू किया वित्त वर्ष 2017-18 से। आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक शुरुआत के बाद से नवंबर 2017 तक करीब 4,300 मामले राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट के समक्ष आए। इसके चलते बैंकों को भारी मात्रा में प्रॉविजनिंग की आवश्यकता पड़ी।
Keyword: india, economy, IIP, GDP, budget,,
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