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मिड-करियर संकट: खुद को नए सिरे से तलाशने का मौका

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  March 29, 2018

आप किसी कंपनी में मध्य स्तर पर कार्यरत हैं और आपकी उम्र 35 से 50 साल के बीच है। पहले जो काम आपको रोमांचित करता था उसी काम को करने के लिए आप बेमन से दफ्तर पहुंचते हैं। अधिकांश दिनों में आपको लगता है कि आप ट्रेडमिल पर तेजी से भाग रहे हैं लेकिन कुछ दिन बाद आप उसे जारी नहीं रख पाते हैं। हाल ही में जब आप नई नौकरी के लिए साक्षात्कार देने पहुंचे और सामने बैठा शख्स आपके जन्म की तारीख पर कुछ अधिक ध्यान देने लगा तो आप थोड़ा घबरा गए।

 
अगर आपको ये सारे हालात जाने-पहचाने लगते हैं तो निश्चित तौर पर आप ऐसा महसूस करने वाले अकेले शख्स नहीं हैं। अधिकतर लोगोंं का देर-सबेर अपने काम को लेकर बोरियत महसूस करना और थकावट होना लाजिमी है। असल में बहुत लोगों को अपने करियर के मध्य में इस तरह की स्थिति का सामना करना पड़ता है जिसे मिड-करियर संकट कहा जाता है। मिड-करियर संकट शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल मनोविश्लेषक इलियट जैक्स ने किया था। बाद में कार्ल गुस्ताव जुंग जैसे फ्रॉयड अनुयायियों ने इसे और विस्तार दिया।
 
किसी भी कर्मचारी के करियर का यह वह दौर होता है जब वह युवा से अधेड़ होने की तरफ कदम बढ़ाता है और अचानक ही उसे खालीपन महसूस होने लगता है। उस समय वह खुद को बाहर की 'भीड़' का हिस्सा भी नहीं मानता है। आप को अपने चारों तरफ दूर तक फैला हुआ एक पठार नजर आता है जो आपके ही जैसे पेशेवरों से भरा है। ये सभी पेशेवर खुद को फंसा हुआ मानते हैं और उन्हें अपनी मंजिल का भी पता नहीं होता है। संक्षेप में, आप खुद को कमतर और हतोत्साहित समझने लगते हैं।
 
यह अहसास केवल उन लोगों को नहीं होता है जो अपने करियर में शीर्ष पर नहीं पहुंच पाए रहते हैं या फिर वे आर्थिक असुरक्षा का सामना कर रहे होते हैं। इस संकट का सामना वे लोग भी करते हैं जिनके पास गिरवी संपत्ति और अपने जीवन को सुरक्षा कवर देने के लिए पर्याप्त धन होता है। इस उम्र समूह के कई सफल लोग भी अपनी पेशेवर जिंदगी में हासिल मुकाम की तरफ देखना बंद कर देते हैं और जिंदगी में गंवाए जा चुके अवसरों को लेकर खुद पर दया दिखाने लगते हैं। अक्सर उनकी शिकायत होती है कि नौकरी की आपाधापी में वे अपने प्रियजनों के साथ खुशी के अधिक पल नहीं बिता सके। यहां पर एक बड़ा दार्शनिक सवाल यह खड़ा होता है कि क्या उनकी कड़ी मेहनत का कोई मोल था?
 
ऐसे लोग आम तौर पर यह गलती करते हैं कि वे यह मान लेते हैं कि इस हालत से निकलने के लिए वे कुछ कर ही नहीं सकते हैं। लेकिन असलियत यह है कि आप इस हालत से निकल सकते हैं। मानव संसाधन विभागों में कार्यरत लोगों का मानना है कि मिड-करियर संकट का सामना कर रहे लोगों को वस्तुपरक नजरिया पाने के लिए एक स्वतंत्र करियर सलाहकार से बात करने में संकोच नहीं करना चाहिए। इसके अलावा अपनी व्यक्तिगत क्षमताओं का व्यवस्थित आकलन कर उसके हिसाब से अन्य करियर विकल्पों का सुझाव भी लेना चाहिए। मार्गदर्शन हासिल कर और एक पेशेवर सलाहकार से बात करने के बाद उस व्यक्ति को अपने मिड-करियर संकट से निपटने में बड़ी मदद मिल सकती है। कभी-कभी एक पेशेवर के करियर का मध्यावधि संकट उसके लिए बहुत मददगार भी साबित हो सकता है। इस अवस्था में आपको अपने बारे में कुछ ऐसी चीजें भी पता चलती हैं जिन्हें पहले आप नहीं जानते थे। पेशेवर सलाहकार की मदद से आप अपने बारे में नए आयामों की खोज कर सकते हैं। हो सकता है कि जिन चीजों को आप अपनी कमजोरी मानकर चलते थे वे असल में आपकी सबसे बड़ी ताकत हों। इस तरह आप अपने करियर को एक नई उड़ान भरने का मौका दे सकते हैं।
 
मनोविश्लेषकों का कहना है कि मिड-करियर संकट से जूझ रहे लोगों को खुद से कुछ सवाल पूछकर इसके समाधान की शुरुआत करनी चाहिए। मसलन, अभी तक आपकी सबसे अच्छी नौकरी कौन सी रही है? उस नौकरी में खास क्या था? काम करते समय आपको कब जोश और उत्साह महसूस होता है और इसकी क्या वजह होती है? इन सवालों के जवाब सुनकर करियर परामर्शदाता को आपकी अपेक्षाओं और कार्य-संतुष्टि के बारे में एक नजरिया मिल पाएगा। कंपनियों को भी इसमें अहम भूमिका निभानी होती है। अगर वे ऐसा नहीं करती हैं तो वे अपने कुछ बेहतरीन कर्मचारियों को गंवा सकती हैं। मिड-करियर संकट से जूझ रहे कर्मचारी या तो समय-पूर्व सेवानिवृत्ति ले सकते हैं या फिर वे रोमांचक नौकरी की तलाश में कहीं और जा सकते हैं। सच तो यह है कि किसी भी कंपनी में केवल बेहद प्रतिभाशाली लोग ही नहीं रह सकते हैं। यह समझा जा सकता है कि हरेक व्यक्ति निदेशक मंडल का सदस्य नहीं बन सकता है लेकिन आगे बढऩे के अवसर नहीं पा रहे एक अच्छे कर्मचारी को रोचक एवं चुनौतीपूर्ण दायित्व सौंपे जाने के कई अन्य तरीके भी हो सकते हैं। शोध बताते हैं कि करियर के मध्य में कर्मचारियों की करियर संतुष्टि सबसे कम होती है। इसे नजरअंदाज करने का मतलब है कि कंपनियां उनके मूल्यवान ज्ञान एवं अनुभव से वंचित रह जाएंगी।
 
इस तरह हरेक कंपनी की मानव संसाधन नियमावली में सुनियोजित मार्गदर्शक कार्यक्रम रखना या लैटरल शिफ्ट की व्यवस्था जरूरी है। मार्गदर्शन की प्रक्रिया अनौपचारिक और व्यक्तिगत व्यवस्था हो सकती है लेकिन अगर कंपनी की तरफ से इसका संचालन किया जा रहा है तो कोई भी उस प्रक्रिया से बाहर नहीं रहेगा। चाल्र्स ए बक और मार्शिया एल वर्थिंग ने अपनी पुस्तक 'इस्केप द मिड करियर डोलड्रम्स' में कहा है कि अपनी पेशेवर जिंदगी के सबसे बड़े संकट से जूझ रहे लोगों को अपना कायांतरण करने की जरूरत नहीं होती है। उन्हें सिर्फ अपनी पूर्वग्रही धारणाओं से मुक्ति पानी होती है। 'अब बहुत देर हो गई है' या 'मैं अब बूढ़ा हो चुका हूं' या 'मैं जो करना चाहता हूं उसके हिसाब से मेरा व्यक्तित्व नहीं है' जैसी सोच रखना तो सबसे बुरा होता है।
Keyword: office, job,,
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