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चीन की नव-उपनिवेशवादी मंशा का जरिया बीआरआई

दीपक लाल /  March 29, 2018

चीन अपने बीआरआई कार्यक्रम के जरिये दुनिया के छोटे एवं गरीब देशों को अधीन बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। इस बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं दीपक लाल

 
विदेश नीति के संदर्भ में चीन की व्यापक पहल 'बेल्ट एवं रोड इनिशिएटिव' (बीआरआई) में शामिल विभिन्न पक्षों के लिए यह कर्ज में फंसाने वाला जाल बनता जा रहा है। यह कमजोर 'असभ्य' देशों से निपटने का चीन के प्रमुख तौर-तरीके को प्रतिध्वनित करता है। यह तरीका आर्थिक निर्भरता को समाहित किए हुए है। चीन ने पहले इस तरीके का इस्तेमाल आत्मनिर्भर लड़ाकू कबीले शियांग्जू को 140 साल तक चली लंबी लड़ाई के बाद अधीन बनाने के लिए किया था। शुरुआत में हाल साम्राज्य में निर्मित उत्पादों को मुफ्त में दिया गया और बाद में उनके बदले सेवाएं देने की शर्त रख दी गई। इसका नतीजा यह हुआ कि शियांग्जू कबीले के लड़ाके एक तरह से उसके अधीन हो गए। दासता की संधि के जरिये चीन ने 51 ईसा पूर्व में इसे औपचारिक रूप भी दे दिया था। (एडवर्ड लुटवाक: द राइज ऑïफ चाइना वर्सेज द लॉजिक ऑफ स्ट्रेटजिक) असभ्य लोगों को दास बनाने के आधुनिक तरीके की खोज चेन युआन ने की थी। युआन ने दिवालिया हो चुके चाइना डेवलपमेंट बैंक (सीडीबी) को चीन के विशालकाय ढांचागत व्यय करने वाले संस्थान के रूप में तब्दील करने का काम किया। वैश्विक आर्थिक संकट के समय सीडीबी चीन की विदेश आर्थिक नीति का प्रमुख औजार बनकर उभरा था। सीडीबी ने अफ्रीका और लातिन अमेरिका में सक्रिय कई सरकारी कंपनियों को ढांचागत विकास एवं प्राकृतिक संसाधनों की आपूर्ति योजनाओं के लिए जमानती अग्रिम ऋण दिए। इन ढांचागत परियोजनाओं का निर्माण चीन की सरकारी कंपनियों और चीनी कर्मचारियों ने किया जबकि प्राकृतिक संसाधनों की आपूर्ति चीन की सरकारी कंपनियों को की गई। वर्ष 2010 आने तक हालत यह हो गई थी कि सीडीबी कर्ज देने के मामले में विश्व बैंक, इंटर-अमेरिकन डेवलपमेंट बैंक और यूएस एक्जिम बैंक द्वारा बांटे गए कुल ऋण से भी आगे निकल चुका था। सीडीबी का यह मॉडल ही बीआरआई पहल का मूल आधार बनकर उभरा है। 
 
बीआरआई एक ऐसा कार्यक्रम है जो भागीदार देशों को कर्ज के जाल में फंसाने के लिए बनाया गया है। दरअसल चीन भू-सामरिक कारणों से इन देशों को अपने अधीन करना चाहता है। सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट के एक शोधपत्र के मुताबिक बीआरआई पहल में शामिल कुल 68 देशों में से 23 देशों पर कर्ज के जाल में उलझने का खतरा मंडरा रहा है। आर्थिक प्रगति कम होने और बढ़े हुए  सार्वजनिक ऋण वाले देशों के कर्ज के जाल में फंसने की आशंका अधिक है। हालिया शोध में बढ़ते सार्वजनिक कर्ज और जीडीपी के बीच 50-60 फीसदी का अनुपात रखने वाले देशों में आंकड़ों के लिहाज से महत्त्वपूर्ण प्रभाव देखने को मिला है। इस शोध से पता चलता है कि बीआरआई पहल के तहत होने वाले वित्त पोषण से 10-15 देशों पर कर्ज संकट पैदा हो सकता है। उनमें से भी आठ देशों पर कर्ज के जाल में फंसने का अधिक खतरा है।
 
इनमें से तीन देशों- श्रीलंका, मालदीव और पाकिस्तान को लेकर भारत को अधिक चिंतित होने की जरूरत है। इन देशों में चीन अपने बंदरगाह विकास कार्यक्रम 'स्ट्रिंग ऑफ पल्र्स' के दौरान भारत की घेराबंदी के लिए ढांचागत परियोजनाओं को वित्तीय कर्ज दे रहा है। चीन ने श्रीलंका में हम्बनटोटा बंदरगाह के निर्माण के लिए छह फीसदी की दर पर आठ अरब डॉलर का कर्ज दिया हुआ है। उसके चलते श्रीलंका अभी से कर्ज संकट में डूबकर उसके भुगतान से आनाकानी कर रहा है। जुलाई 2017 में चीन बंदरगाह के प्रबंधन के लिए इक्विटी अदलाबदली के एवज में 99 साल की लीज पर कर्ज देने के लिए भी राजी हुआ था। लेकिन बंदरगाह के इर्दगिर्द एक नया औद्योगिक क्षेत्र बनाने के विरोध में प्रदर्शन कर रहे लोगों की पुलिस के साथ झड़प भी हुई थी। दरअसल श्रीलंकाई नागरिक परियोजना को देश की क्षेत्रीय अखंडता पर अतिक्रमण मान रहे हैं।
 
पाकिस्तान ने सीपीईसी परियोजनाओं की 62 अरब डॉलर की लागत के 80 फीसदी कर्ज को पांच फीसदी की उच्च ब्याज दर पर लिया है जिसके चलते उसके चीनी कर्ज संकट में फंसने के तगड़े आसार हैं। इस वजह से पाकिस्तान के बलूचिस्तान इलाके में लोग इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। ग्वादर बंदरगाह इसी इलाके में स्थित है। वैसे चीन की नव-उपनिवेशवादी रणनीति में मालदीव भू-सामरिक नजरिये से मालदीव काफी अहम स्थान रखता है। चीन अपने बेशुमार आर्थिक संसाधनों का इस्तेमाल कर इस द्वीपीय देश को अपने मातहत बनाने के लिए करना चाहता है। बीआरआई पहल के तहत मालदीव में सबसे बड़ा चीनी प्रोजेक्ट 83 करोड़ डॉलर की लागत से एयरपोर्ट को उन्नत करने का है। मालदीव के विपक्षी दलों का कहना है कि प्रस्तावित चीनी प्रोजेक्ट मालदीव के कुल ऋण का 70 फीसदी हिस्सा हैं। इस कार्यक्रम के तहत मालदीव हरेक साल चीन को 9.2 करोड़ डॉलर का भुगतान करेगा जो उसके बजट का 10 फीसदी होगा।
 
रॉबर्ट मैनिंग और भरत गोपालस्वामी ने फॉरेन पॉलिसी पत्रिका में लिखे अपने लेख में कहा है कि 'मालदीव चीन के हाथों अपनी संप्रभुता को गिरवी रखने की हद तक जा पहुंचा है'। मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यमीन पर निजी हितों के लिए 16 द्वीपों को चीन के सुपुर्द करने और प्रोजेक्ट की लागत बढ़ाने के आरोप लग रहे हैं। यमीन ने चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते को संसद में बिना किसी चर्चा के एक ही दिन में पारित करा दिया। जापान ने यमीन पर यह आरोप भी लगाया है कि टैंकरों से उत्तर कोरियाई जहाजों में माल की गुपचुप आपूर्ति की जा रही है। उत्तर कोरिया पर लगे संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों का उल्लंघन माने जा रहे इस कृत्य पर अमेरिका की भी नजरें टिकी हैं।
 
भारत ने अपने प्रभाव में रहे इस देश को चीन के चंगुल में जाने से रोकने के लिए अभी तक कोई दखल नहीं दिया है। लेकिन उत्तर कोरिया पर लगी पाबंदी का उल्लंघन करने से भारत के लिए अब समय आ गया है कि वह अमेरिका और जापान के साथ मिलकर मालदीव पर स्थापित हो रहे चीनी दबदबे को सैन्य चुनौती दे। निर्वासित राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद को दोबारा पद स्थापित करने पर भी भारत को ध्यान देना चाहिए क्योंकि वह सत्ता संभालने पर चीन के कर्ज को 'कुत्सित' होने के आधार पर उन्हें निरस्त कर सकते हैं।
 
माइकल क्रेमर और सीमा जयचंद्रन ने 'कुत्सित कर्ज' का सिद्धांत पेश करते हुए कहा था कि स्पेन-अमेरिका युद्ध के बाद शांति वार्ता के दौरान सबसे पहले इसका इस्तेमाल किया गया था। कई देशों में यह कानून है कि अगर किसी व्यक्ति के नाम पर दूसरे लोग धोखे से कर्ज ले लेते हैं तो उसका भुगतान उसे नहीं करना होता है। यह भी कहा जाता है कि अगर जनता की सहमति और उसे लाभ पहुंचाए बगैर कोई सरकार सार्वजनिक ऋण लेती है तो उस देश में आने वाली नई सरकार उस कर्ज का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं है। दक्षिण अफ्रीका में नस्लभेद के खात्मे के बाद बनी सरकार को आर्चबिशप डेसमंड टूटू और सत्यता एवं मेलमिलाप आयोग ने यह सुझाव दिया था कि नस्लभेदी सरकार के समय लिए गए कर्जों को घोषित कर दे। हालांकि नई सरकार ने विदेशी निवेश जुटाने में पैदा होने वाली समस्याओं को देखते हुए ऐसा करने से परहेज किया। लेकिन मालदीव में आने वाली नई सरकार के लिए ऐसा खतरा नहीं होगा क्योंकि भारत, अमेरिका और जापान उसके समर्थन में खड़े होंगे। 
 
मालदीव अगर चीनी कर्ज को 'कुत्सित' बताते हुए उसका भुगतान करने से मना कर देता है तो यह अन्य छोटे एवं गरीब देशों के लिए एक मिसाल की तरह होगा। चीन भू-सामरिक नजरिये से महत्त्वपूर्ण इन देशों को बीआरआई कार्यक्रम के जरिये अपने अधीन करने की कोशिश कर रहा है। अगर बाकी देश चीन के 'कुत्सित कर्ज' को देने से मना कर देते हैं तो उनकी किस्मत शियांग्जू लड़ाकों से उलट हो सकती है। 
Keyword: india, china, trade,,
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