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आसान नहीं

संपादकीय /  March 28, 2018

पर्यावरण मंत्रालय ने इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-वेस्ट) और बायो मेडिकल कचरे के प्रबंधन के लिए नए नियम अधिसूचित किए हैं। ये पिछले नियमों से बेहतर अवश्य हैं लेकिन कुछ अहम मुद्दों पर वे कमजोर पड़ गए हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि लक्ष्यों को शिथिल करने के बावजूद उनका क्रियान्वयन कठिन बना रहेगा। इलेक्ट्रॉनिक और चिकित्सा संबंधी कचरे मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए बहुत नुकसानदेह होते हैं। इसलिए उनको बहुत सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से निपटाने की आवश्यकता होती है। परंतु मौजूदा क्षमता और इस क्षेत्र में विशेषज्ञता काफी सीमित है। 

 
इस कचरे का एक बड़ा हिस्सा या तो अनुपचारित ही पड़ा रहता है या फिर असंगठित क्षेत्र के लोग इसे निहायत गैर पेशेवर अंदाज में निपटाते हैं। ई-वेस्ट प्रबंधन के मामले में सरकार ने विस्तारित उत्पादक जवाबदेही के तहत तय लक्ष्यों को शिथिल कर दिया है। इसका फायदा उन उत्पादों के संग्रह और निपटान में मिलेगा जिनके इस्तेमाल की अवधि समाप्त हो चुकी है। इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के निर्माता, आयातकों और अन्य आपूर्तिकर्ताओं को अब पहले साल यानी वर्ष 2017-18 में अपने कुल कचरे का 10 फीसदी निपटाने की जवाबदेही रहेगी। इसके बाद 2023 तक यह हर साल 10 फीसदी बढ़ेगी। सन 2023 के बाद सालाना लक्ष्य 70 फीसदी होगा। हालांकि उद्योग जगत ने इन नए लक्ष्यों का स्वागत किया है लेकिन कुल मिलाकर स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े जोखिम कम करने का लक्ष्य इससे आंशिक रूप से ही हासिल होगा। जो कचरा निपटाया नहीं जाएगा वह जमा होता रहेगा क्योंकि व्यक्तिगत तौर पर और छोटे पैमाने पर इनका इस्तेमाल जारी रहेगा। ऐसे लोग लाखों की तादाद में हैं। 
 
असंगठित क्षेत्र को इसे निपटाने के लिए बड़े पैमाने पर काम करना होगा। जरूरत इस बात की है कि निजी कचरा उपचार उद्यमों को उभरने में मदद की जाए और उन्हें बढ़ावा दिया जाए। इसके अलावा बेकार पड़े इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उचित निस्तारण के लिए कचरा बटोरने वालों को व्यापक प्रशिक्षण देने की भी आवश्यकता है। बायोमेडिकल कचरा इंसानों और जानवरों के स्वास्थ्य के लिए ई-कचरे से भी अधिक नुकसानदेह हो सकता है। वहां भी हाल यही है। सरकार ने अपनी नई नीति में क्लोरिनेटेड प्लास्टिक बैग, दस्तानों और ब्लड बैग के रूप में ऐसा कचरा उत्पादित करने वाली चीजों के निपटान के लिए और वक्त दिया है। इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देश के अनुरूप ही इसे संक्रमणहीन करने की सुविधा भी स्थापित की जा रही है। अस्पताल, पशु चिकित्सालय तथा अन्य स्वास्थ्य केंद्रों आदि को एक वर्ष का समय दिया गया है कि वे बार कोडिंग और ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम के साथ ऐसी व्यवस्था बना लें ताकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दिशानिर्देशों के मुताबिक जरूरत पडऩे पर उनके चिकित्सकीय कचरे को ट्रैक किया जा सके। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि चिकित्सा क्षेत्र को भी कचरा निपटान के नए दिशानिर्देशों का क्रियान्वयन करने में दिक्कत न हो और उनकी सेवाएं बाधित न हों। 
 
बहरहाल, इसमें संदेह ही है कि वे दिए समय में ऐसा कर भी पाएंगे या नहीं। स्वास्थ्य उद्योग से जुड़े कई लोगों का मानना है कि क्लोरिनेटेड प्लास्टिक बैग का कोई उचित विकल्प मौजूद ही नहीं है। यह बैग जलाने पर जहरीली गैस निकालता है। बार कोडिंग और जीपीएस ट्रैकिंग भी बड़े सरकारी और निजी अस्पतालों के अलावा अधिकांश लोगों के लिए कठिन हो सकती है। इसके अलावा दूरदराज इलाकों में इंटरनेट सेवाओं की कमी एक अलग बाधा है। चाहे जो भी हो लेकिन छोटे पैमाने पर काम करने वाली इकाइयों को उदार सरकारी मदद की जरूरत हो सकती है। यह मदद तकनीकी भी होगी और वित्तीय भी। चाहे जो भी हो संक्रमण फैलाने वाले चिकित्सकीय कचरे को सामान्य कचरे में मिलने से रोकने के उपाय करने होंगे। यह बहुत कठिन काम है।
Keyword: pollution, air, PMO, waste,,
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