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आर्थिक नीतियों में गलतियों से सरकार की राजनीतिक दिक्कतें

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  March 27, 2018

लगभग एक साल बाद देश आम चुनाव के दौर से गुजर रहा होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अभी भी बहुत ज्यादा है। वर्ष 2014 में ही यह स्पष्ट हो गया था कि वह इंदिरा गांधी के बाद भारत के सबसे लोकप्रिय राजनेता हैं। इस बात में अब भी कोई बदलाव नहीं आया है। चंद हालिया सफलताओं के बावजूद विपक्ष अपने आप को एक विश्वसनीय प्रतिपक्ष के रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाया है। इन दोनों तथ्यों में कहीं कोई शंका नहीं है लेकिन मोदी के पुनर्निर्वाचन को निर्विवाद नहीं माना जा रहा है।

 
अर्थव्यवस्था की बात करें तो हाल के महीनों में आर्थिक वृद्धि में मामूली बढ़ोतरी हुई है। परंतु अधिकांश पर्यवेक्षकों से अगर वर्ष 2014 में पूछा जाता कि क्या मोदी संप्रग के दूसरे कार्यकाल की तुलना में बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे तो वे निश्चित रूप पर इस पर ठोस सहमति जताते। अगर उन्हें कहा जाता कि कच्चे तेल की कीमतें नरम रहेंगी और वैश्विक हालात अनुकूल रहेंगे तो शायद वे और भी सहमत होते। इसके बावजूद मोदी सरकार का प्रदर्शन कमजोर रहा है। सवाल यह है कि ऐसा क्यों हुआ? मोदी के कमजोर प्रदर्शन में उनकी खुद की भूमिका बहुत सीमित है। इस दौरान मॉनसून कमजोर रहा। इससे मांग पर तो असर होता ही है, ग्रामीण क्षेत्र की कमजोरी दूर करने के लिए संसाधनों का आवंटन उस दिशा में हो जाता है। वस्तु एवं सेवा कर के आगमन ने भी कुछ हद तक हालात पर असर डाला। इसने मुद्रास्फीति या सरकारी राजस्व को प्रभावित किया। ऐसा नहीं है कि सरकार ने महत्त्वपूर्ण और अग्रगामी ढांचागत सुधारों को आगे नहीं बढ़ाया। जीएसटी के अलावा निवेश और दिवालिया संहिता को प्रमुखता दी गई। सरकारी प्रक्रियाओं में मंजूरी आदि का डिजिटलीकरण किया गया। सरकार ने जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा के मामले में उल्लेेखनीय प्रतिबद्धता दिखाई है।
 
यह भी स्पष्ट है कि सरकार के सकारात्मक आर्थिक प्रयास या तो आधे-अधूरे थे या फिर बहुत देरी से उठाए गए। सबसे बुरी बात यह कि उनमें से कई की योजना बहुत खराब ढंग से बनाई गई थी या उनका क्रियान्वयन कमजोर था। कई मामलों में मुद्दे की समझ कमजोर थी या क्षमता में कमी थी। जीएसटी के क्रियान्वयन में नाकामी के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है। अब आईबीसी में भी वही खामियां होने की खबर सामने आ रही है। सरकार को यह चेतावनी दी गई थी कि नए दिवालिया पेशेवरों को क्षमता संपन्न बनाने और अदालतों को मुकदमों के बोझ से बचाने के लिए स्वतंत्र निस्तारण पेशेवरों की जरूरत है। खेद की बात है कि इस बात को कानून के अंतिम मसौदे से बाहर रखा गया। 
 
इस बीच अन्य तरह के कुप्रबंधन ने भी सकारात्मक प्रयासों को नुकसान पहुंचाया। उनमें सबसे अहम थी नोटबंदी। नोटबंदी ने मांग को पूरी तरह खत्म कर दिया, असंगठित अर्थव्यवस्था को चौपट किया और बड़े पैमाने पर बेरोजगारी पैदा की। इस बीच इससे कुछ खास हासिल नहीं हुआ। इसके आर्थिक लक्ष्य अनिश्चित ही रहे। जैसा कि हाल ही में कहा गया कि फिलहाल प्रचलित नकदी नोटबंदी के पहले के स्तर पर आ गई है और दोबारा यथास्थिति बन रही है। इसके अलावा बिजली क्षेत्र के ऋण से जुड़ी दिक्कतें दूर करने के लिए उदय योजना प्रस्तुत की गई थी लेकिन उसने भी केवल राज्यों की विद्युत वितरण कंपनियों को लंबित ही किया। बीते बजट में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की राह छोड़ दी गई, उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों का मामला अधर में रहा, देश की संघीय प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाले अत्यधिक मामले सामने आए जिनमें राज्यों को दिए जाने वाले फंड को रोका गया। चिकित्सा उपकरण, औषधि और नागरिक उड्डïयन आदि के क्षेत्र में लोकलुभावन और मूल्य नियंत्रण वाली नीति, भारतीय मुद्रा को विदेशी अर्थव्यवस्था से अलग करने की कोशिश, भारी व्यय और निजी क्षेत्र को लाभ पहुंचाने वाली चिकित्सा बीमा योजना की घोषणा ने दिक्कतें पैदा कीं और गुजरात में बन रहे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों में अपवाद पैदा किए गए।
 
अकारण हुई चूकों की स्थिति तो और खराब है। श्रम और भूमि सुधार बाजार की बात करें तो ढांचागत सुधार बड़े पैमाने पर देखने को नहीं मिले हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के वास्तविक सुधार एजेंडे पर नहीं हैं जबकि उनमें गड़बडिय़ां साफ नजर आ रही हैं। उद्यमियों पर अभी भी बहुत अधिक नियामकीय बोझ है। कर मामलों की जांच और अधिक गहन हो गई है। खाद्यान्न की सरकारी खरीद अभी भी असंगठित है। कृषि उत्पादों के लिए कोई ऑफलाइन राष्ट्रीय बाजार विकसित नहीं हुआ है। प्रशासनिक सुधार अभी भी स्वप्न बने हुए हैं। शिक्षा और कौशल विकास के मोर्चे पर विफलता है।
 
इस बीच भारत ने संरक्षणवाद का रुख किया है। मेक इन इंडिया से जहां देश में विनिर्माण में सुधार आने, बुनियादी निवेश बढऩे और निवेशकों के संरक्षण की अपेक्षा थी, वहीं हकीकत में इसकी आड़ में भारतीय कंपनियां शुल्क संरक्षण चाहती दिखती हैं। रोजगार तैयार करना तो दूर की बात है इससे अक्षमता, उच्च लागत और संसाधनों का गलत आवंटन सामने आ रहा है। इन गलतियों के लिए सरकार सीधे जवाबदेह है। ऐसे में संदेह नहीं कि भारत की जननांकीय लाभ के दौर में उच्च-मध्य आय का दर्जा पाने की कोशिश को चोट पहुंची है। युवाओं की मौजूदा पीढ़ी वैश्विक समृद्धि के लाभ लेने के बजाय उनसे वंचित रह जाएगी। सुधारों की नाकामी का अर्थ यह भी है रोजगार को लेकर कोई बात नहीं हो रही है, न ही शहरी गतिविधियां युवाओं को खेती से विरत कर रही हैं। इसी नाकामी के चलते व्यापक निराशा उपज रही है।  तमाम मतदाता ऐसे भी हैं जो निजी तौर पर मोदी को सरकार की विफलता का दोषी नहीं मानते। उन्हें अभी भी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाला नेता माना जाता है। शायद ऐसा हो भी। अगर ऐसा है तो यह भी स्पष्ट है कि देश को कहीं बेहतर की आवश्यकता है।
Keyword: narendra modi, BJP, congress, election,,
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