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कैंसर फैलाने वाले रसायन पर भी रोक लगाने से परहेज

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  March 26, 2018

इन दिनों एक रसायन के चलते काफी विवाद पैदा हो रहे हैं। न्यूजीलैंड के सांसद तो इस पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका के नेता इस बात पर बहस कर रहे हैं कि आखिर वे इस्तेमाल ही क्यों जारी रखे हुए हैं? हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका में भी संसद के भीतर इस मसले पर चर्चा हो रही है। पिछले साल यूरोप में इसका लाइसेंस नवीनीकरण किए जाने के सवाल पर बड़ी तीखी बहस हुई थी। पहले तो नवीनीकरण से मना कर दिया गया लेकिन बाद में सीमित अवधि के लिए इजाजत दे दी गई। आखिरकार नवंबर 2017 में इस रसायन का लाइसेंस पांच साल के लिए बढ़ा दिया गया। इसके बावजूद इस पर बहस जारी है और थमने का नाम नहीं ले रही है।

 
कहा जा रहा है कि यह रसायन इंसानों के लिए जहरीला है। इसमें 'कैंसरकारी तत्त्व' होने की आशंका जताई जा रही है। इस रसायन के संपर्क में आए लोगों में नॉन-हॉजकिन लिम्फोमा कैंसर और किडनी की बीमारियां होने के अधिक मामले देखे गए हैं। दुनिया भर के कृषि क्षेत्रों में मधुमक्खियों एवं तितलियों की तेजी से घटती संख्या के लिए इस रसायन को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। लेकिन सवालों के घेरे में आया यह रसायन एक आश्चर्य का विषय है। सीएफसी गैसों के उत्सर्जन से ओजोन परत को हो रही क्षति की ही तरह यह रसायन भी औद्योगीकरण की उपज है। असल में यह कहना सही होगा कि अपने खेतों में छिड़काव के लिए इस रसायन का इस्तेमाल करने वाले किसानों की इसकी आदत पड़ चुकी है। किसान इसका इस्तेमाल खरपतवार-नाशक के तौर पर करते हैं। खेतों में उगने वाले खरपतवार को नष्ट करने के लिए किसान फसल की बुआई के पहले ही खेतों में इस रसायन का छिड़काव कर देते हैं। अब फसलों का जीन संवद्र्धन (जीएम) होने से इस रसायन के इस्तेमाल की गुंजाइश भी बढ़ गई है। जीएम फसलों को इस तरह से विकसित किया गया है कि इस रसायन का उन पर कोई असर नहीं पड़ता है, लिहाजा किसान अब बिना किसी चिंता के इसका खुलकर इस्तेमाल करने लगे हैं।
 
इस रसायन का नाम ग्लाइफोसेट है जिसे अमेरिका की दिग्गज कृषि-रसायन कंपनी मॉनसैंंटो बनाती है। इसे राउंडअप नाम से भी जाना जाता है। सवाल यह है कि अगर इसकी विषाक्तता के बारे में साक्ष्य मौजूद हैं तो फिर सरकारें इस पर रोक क्यों नहीं लगा रही हैं? इस झमेले के जारी रहने की क्या वजह है? हम यह क्यों नहीं तय कर पा रहे हैं कि क्या अच्छा है और क्या बुरा है? क्या इसका संबंध केवल बड़ी कंपनी की ताकत से है या फिर यह विज्ञान की अक्षमता को भी उजागर करता है? क्या इस रसायन की विषाक्तता के बारे में पर्याप्त साक्ष्यों की कमी है या यह विज्ञान और वैज्ञानिकों की मिलीभगत का नतीजा है?
 
अमेरिका में कार्यरत पत्रकार कैरी गिलेम ने अपनी पुस्तक 'व्हाइट वाश: द स्टोरी ऑफ ए वीड किलर, कैंसर ऐंड द करप्शन ऑफ साइंस' में लिखा है कि विज्ञान ने इस रसायन को लेकर अपना नजरिया बार-बार बदला है। पहले यूरोपीय संघ का मामला देखते हैं। यूरोपीय संघ को हमेशा से पर्यावरणीय मसलों पर एक वैश्विक अगुआ और जीएम फसलों समेत अधिकांश मामलों में एहतियाती उपाय करने वाले समूह के तौर पर देखा जाता रहा है। लेकिन उसने भी इस रसायन का लाइसेंस नवीनीकृत कर दिया। उसने विश्व स्वास्थ्य संगठन की अंतरराष्ट्रीय कैंसर शोध एजेंसी की तरफ से 2015 में जारी उस रिपोर्ट के बावजूद ऐसा किया है जिसमें जानवरों पर किए गए अध्ययन के आधार पर इस रसायन से कैंसर पैदा होने की आशंका जताई गई थी। ग्लाइफोसेट का 15 साल का लाइसेंस 2016 में खत्म हो चुका था और इसके भविष्य के बारे में फैसला यूरोपीय संसद को ही करना था। चिकित्सा परामर्शदाता, खास तौर पर कैंसर विशेषज्ञ और सिविल सोसाइटी तो पूरी तरह इसके खिलाफ थी। लेकिन यूरोपीय संसद ने कैंसर और अंत:स्रावी ग्रंथियों में समस्या का जिक्र करते हुए कहा कि इस रसायन का अधिक इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
 
सच तो यह है कि यूरोपीय संसद के 48 सदस्यों के मूत्र परीक्षण नमूनों में ग्लाइफोसेट का स्तर अनुमान से 17 गुना अधिक पाया गया था। इस परीक्षण से विवाद गहराने लगा।   लेकिन जर्मनी के फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ रिस्क एसेसमेंट और यूरोपीय खाद्य संरक्षा प्राधिकरण ने जब इन नतीजों की समीक्षा की तो यह पाया कि मूत्र नमूनों में रसायन की मात्रा तेजी से कम हुई थी और उनमें जैव-संचयन के भी कोई लक्षण नहीं थे। इसके आधार पर कहा गया कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन कैरी गिलम का कहना है कि यह निष्कर्ष काफी हद तक अमेरिकी पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी (यूएसईपीए) के साक्ष्यों पर आधारित है। इस एजेंसी ने स्विट्जरलैंड के अल्बिनो चूहे में ट्यूमर के लिए ग्लाइफोसेट रसायन को जिम्मेदार ठहराने वाले 2001 के अध्ययन को नकार दिया था। इन एजेंसियों ने खुद स्वीकार किया कि उन्होंने ग्लाइफोसेट टास्क फोर्स की तरफ से मुहैया कराए गए आंकड़ों का ही इस्तेमाल किया। यह टास्क फोर्स मॉनसैंटो जैसी कई रासायनिक कंपनियों का समूह है जो यूरोप में कारोबार जारी रखने के मकसद से बनाया गया था। इन अध्ययनों के जरिये यह साबित करने की कोशिश की जा रही थी कि इस रसायन के इस्तेमाल से कोई दिक्कत नहीं पैदा होती। सभी मामलों में मॉनसैंटो ही इस 'विज्ञान' के केंद्र में रहा है।
 
गत 21 मार्च को यूरोपीय संघ ने दो केमिकल कंपनियों बेयर (जर्मनी) और मॉनसैंंटो (अमेरिका) के विलय को मंजूरी दे दी। अब यूरोपीय संसद में ग्लाइफोसेट पर हुए मतदान में जर्मनी के रुख को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। लेकिन यह विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। और ऐसा होना भी नहीं चाहिए। मेरा मानना है कि विज्ञान को आंशिक रूप से ही शिकस्त दी जा सकती है लेकिन सच सामने आ ही जाएगा। लेकिन ताकतवर के हाथ में विज्ञान की कमान होने से तब तक बहुत लोगों को जान गंवानी पड़ सकती है। 
Keyword: cancer, chemical,,
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