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तरकश में तीर नहीं या चलाने की इच्छा नहीं
अनुकूल या प्रतिकूल रुझानों का मुकाबला करने के लिए सरकार के पास दो तरह के 'हथियार' होते हैं। बता रहे हैं सुरजीत एस. भल्ला
सुरजीत एस. भल्ला /  February 17, 2009

सकारात्मक या नकारात्मक रुझानों का मुकाबला करने के लिए किसी भी सरकार की तरकश में दो तीर होते हैं- मौद्रिक और राजकोषीय। लेकिन अफसोस इस बात का है कि शायद भारतीय अधिकारी केवल परिसंपत्तियों के सकारात्मक उबाल से ही परिचित हैं।

जब वे इस तेजी की लगाम कसना चाहते हैं तो वे काफी शोर-शराबे के साथ नीतियों की बाढ़ लेकर आ जाते हैं। शेयरों की कीमतें चढ़ रही हैं- कर की दरें बढ़ा दो। 

प्रॉपर्टी की कीमतें तेज होने लगीं- कोई बात नहीं, ब्याज दरें बढ़ा दो। मुद्रा आपूर्ति की दर बढ़ रही है तो सीआरआर यानी नकद सुरक्षित अनुपात बढ़ा दो।

बैंक कर्ज अधिक बांट रहे हो तो एसएलआर यानी सांविधिक तरलता अनुपात बढ़ा दो। महंगाई बढ़े तो कर की दरों और ब्याज दर दोनों को बढ़ा दो। और अगर आर्थिक विकास दर जोर पकड़ने लगे तो नए उपकर लगा दो, कॉर्पोरेट कर की दरों को बढ़ा दो, नए अधिभार लगाओ और साथ ही ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी कर दो।

यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है, बल्कि यह पिछले पांच वर्षों और खासकर पिछले एक वर्षों के दौरान संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के तौर-तरीकों की हकीकत है। तो अब वैश्विक अर्थव्यवस्था में काफी गिरावट आ चुकी है और हम भी किनारे पर झूल रहे हैं।

ऐसे में सरकार और रिजर्व बैंक (उसके बाद की संस्थाओं) ने क्या किया? इन संस्थाओं की तरह आप भी पूछ सकते हैं कि इस बात के क्या प्रमाण हैं कि हम किनारे पर हैं? अच्छा जरा औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ों पर गौर कीजिए।

भारत भाग्यशाली होगा अगर उसने वित्त वर्ष 2008-09 के दौरान 2 प्रतिशत से अधिक की औद्योगिक विकास दर दर्ज करने में कामयाबी हासिल कर ली। यहां तक कि कृषि क्षेत्र की विकास दर भी बीते साल के 4.9 प्रतिशत से घटकर 2.6 प्रतिशत रह गई है।

इस तरह अधिकारियों को इस बात के लिए किसी सबूत की जरुरत नहीं होनी चाहिए कि अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ रही है। लेकिन मुद्रास्फीति के मोर्चे पर क्या हो रहा है। अधिकारियों को पता चलना चाहिए कि भारतीय और शेष विश्व की अर्थव्यवस्थाएं जिस सबसे बड़ी समस्या से जूझ रही हैं वह है मुद्रा अवस्फीति, न कि मुद्रास्फीति।

मुद्रा अवस्फीति का अर्थ है कीमतों में गिरावट। प्रमाण चाहिए क्या? जरा इस बारे में सोचिए: अप्रैल 2008 से लेकर जनवरी 2009 तक दस महीनों के दौरान थोक मूल्यों पर आधारित मुद्रास्फीति की दर महज 2 प्रतिशत रही है। पिछले 6 महीनों के दौरान वार्षिक आधार पर कीमतें 6 प्रतिशत की दर से घटी हैं।

एक सप्ताह पहले केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन (सीएसओ) ने जीडीपी के आंकड़े जारी किए हैं। उन्होंने चालू वित्त वर्ष के दौरान जीडीपी के 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान जताया है। लेकिन पहले छह महीनों के दौरान मुद्रास्फीति वार्षिक आधार पर 15 प्रतिशत या पूरे साल के लिए 7.5 प्रतिशत बढ़ चुकी है।

प्राधिकरणों के अपने आंकड़े बताते हैं कि अक्टूबर 2008 से मार्च 2009 के दौरान जीडीपी अपस्फीतिकारी मुद्रास्फीति शून्य रहेगी। भारत में ऐसा इससे पहले कभी नहीं हुआ है। और इस बार लगातार 6 महीनों के लिए ऐसे रुझान देखने को मिल रहे हैं।

कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति की दर शून्य रही है। मैं सोचता हूं कि विकास और कीमतों में गिरावट के स्पष्ट प्रमाण हैं और केवल वह व्यक्ति ही इस प्रमाण को नहीं देख सकता है, जो हाईवे पर उस हिरण की तरह खड़ा है जिसकी आंखों के सामने हेडलाइट की रोशनी के कारण अंधेरा छा गया है।

(ऐसे जानवरों का क्या होता है- वे दुर्घटना में मारे जाते हैं।) इस तरह मौजूदा हालात व्यापक संकट की ओर इशारा कर रहे हैं और नकारात्मक रुझानों का एक काफी बड़ा बुलबुला हमारे सामने है। तो ऐसे में सरकार क्या कर रही है? अब जरा देखिए कि प्राधिकरणों ने अभी तक किया क्या है।

ब्याज दर: भारतीय रिजर्व बैंक इस संकट के दौर में सबसे बुरा प्रदर्शन करने वाला केंद्रीय बैंक बन सकता है। यह खिताब हाल-फिलहाल तक यूरोपीय केंद्रीय बैंक के पास था। इसने ब्याज दरों को 9 प्रतिशत से घटाकर 5.5 प्रतिशत कर दिया है, लेकिन इस बात पर गौर नहीं किया गया है कि मुद्रास्फीति की दर इससे भी कहीं अधिक तेजी के साथ घटी है।

इस कारण रिजर्व बैंक पिछले तीन महीनों के दौरान रेपो दर में 3.5 प्रतिशत की कटौती करने के अपने फैसले पर प्रसन्न है, जबकि समान अवधि में मुद्रास्फीति की दर में 10 प्रतिशत की गिरावट आई है।

कोई यह नहीं सोच रहा है कि (शायद मैं जल्दबाजी में यह लिख गया हूं क्योंकि रिजर्व बैंक में कई लोग ऐसा सोचते होंगे) आज असल समस्या तो मुद्रास्फीति बन गई है। इसका अर्थ है कि मुद्रास्फीति की संभावनाएं घटी हैं।

यहां तक कि मुद्रास्फीति की दर के घटकर 2 प्रतिशत तक आने के अनुमान भी जताए जा रहे हैं, जबकि दूसरी ओर कॉर्पोरेट और आम आदमी 10 से 15 प्रतिशत की दर से कर्ज ले रहे हैं। यह ब्याज दर दुनिया में सबसे अधिक है।

कर में कटौती: रिजर्व बैंक की तर्ज पर उसके सहायक प्राधिकरण (वित्त मंत्रालय) ने उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क में कटौती की। कर की दरों में की गई इस कटौती के मायने क्या हैं? फरवरी 2008 में जारी बजट पूर्वानुमानों में 2,55,000 करोड़ रुपये के कर राजस्व का अनुमान जताया गया था।

दरअसल उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क संग्रह में 40,000 करोड़ रुपये की कमी आई है, जो जीडीपी का 0.7 प्रतिशत है। इसमें से आधी कमी वास्तविक गतिविधियों में कमी के कारण आई है, इस तरह वास्तव में 20,000 करोड़ रुपये की राहत दी गई है।

व्यय नीति: यहां कई राहत पैकेजों की घोषणा की गई है। कुल व्यय बढ़कर 1,50,000 करोड़ रुपये हो गया है। यहां लगता है कि प्राधिकरणों ने कुछ कार्रवाई की है। हालांकि, करीब 60,000 करोड़ रुपये खाद्य और उर्वरक सब्सिडी पर अतिरिक्त खर्च किए गए हैं और यह सब्सिडी अक्टूबर 2008 के पहले दी गई है।

इसलिए केंद्रीय बैंक इस राहत के तौर पर पेश करने का दावा नहीं कर सकता है। इसके अलावा किसानों की कर्ज माफी की मद में करीब 25,000 करोड़ रुपये दिए गए हैं, जो कि फरवरी 2008 में पेश किए गए बजट से अलग था।

अब यह बजट का हिस्सा है। इस तरह सरकार द्वारा खर्च किए गए करीब 85,000 करोड़ रुपये का संकट से मुकाबले के लिए की गई सरकारी कार्रवाई से कोई वास्ता ही नहीं था।

सरकार द्वारा की गई कार्रवाई: 85,000 करोड़ रुपये (65 और 20) या जीडीपी का 1.6 प्रतिशत। और इतना खर्च भी तक किया गया जबकि आईएमएफ में बैठे वित्तीय भगवान कह रहे हैं कि सरकार को कम से कम जीडीपी का 2 प्रतिशत तो खर्च करना ही चाहिए।

लेकिन प्राधिकरणों का कहना है कि- तेल और उर्वरक सब्सिडी के तौर पर दी गई 1,00,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राहत को आप भूल रहे हैं। ये सब्सिडी आयात की मद में विदेशियों को दी गई हैं और इसलिए यह अर्थव्यवस्था से नकदी की निकासी करती है।

आप चाहें तो इसे नकारात्मक राहत कह सकते हैं। इस तरह चिंतित करने वाला निष्कर्ष यह निकलता है कि हमारे प्राधिकरण या तो जागरुक नहीं हैं या भ्रमित हैं या फिर दोनों ही हैं। सच कड़वा होता है। मुद्रास्फीति के अनुमानों को लेकर सरकार की अयोग्यता का एक प्रमाण और है।

सरकार ने अगले वित्त वर्ष के दौरान मुद्रास्फीति के 4 से 5 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान जताया है। यह पिछले पांच वर्षों के दौरान औसत मुद्रास्फीति है, जबकि जीडीपी 9 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी और प्राधिकरण जिसे ओवरहीटिंग बता रहे थे। 

(विचार लेखक के हैं)

Keyword: govt have two weapons to deal with favour and against situation,
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