बिजनेस स्टैंडर्ड - बुनियाद को चाहिए मजबूत हाथ
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बुनियाद को चाहिए मजबूत हाथ

ज्योति मुकुल /  03 01, 2018

बुनियादी ढांचा

बढ़ती जरूरतों को देखकर सरकार बुनियादी ढांचे पर बहुत अधिक जोर दे रही है और उस पर खुलकर खर्च भी कर रही है, लेकिन इस क्षेत्र को अभी तक निजी निवेश का इंतजार है

बिजनेस स्टैंडर्ड बुनियाद को चाहिए मजबूत हाथ

रीब एक दशक पहले जब वैश्विक अर्थव्यवस्था वित्तीय संकट में फंसी थी तब भारत ने भी झटके महसूस किए थे। 2008 के उस दौर में यहां ज्यादातर क्षेत्रों में मंदी थी और सेवा एवं निर्यात क्षेत्रों में तेज कमी आई थी। लेकिन तब भी अल्ट्रा-मेगा बिजली परियोजनाओं और बिजली की भारी मांग के कारण बिजली क्षेत्र सबसे अलग नजर आ रहा था और नकदी की भरमार वाली कंपनियां उसे पसंद कर रही थीं।

10 साल बीतने के बाद भी बुनियादी ढांचे में निजी निवेश नहीं आ रहा है क्योंकि कंपनियों की बैलेंस शीट मजबूत नहीं है और जोखिम लेने में उनकी दिलचस्पी भी कम हो गई है। हालांकि एसऐंडपी ग्लोबल रेटिंग का अनुमान है कि भारतीय बुनियादी ढांचा कंपनियां अगले कुछ वर्षों में अपना कर्ज कम करेंगी। साथ ही पूंजीगत व्यय का स्तर भी ऊंचा रखेंगी। एसऐंडपी ग्लोबल रेटिंग्स की जनवरी, 2018 की रिपोर्ट में कहा गया है, 'इसकी वजह यह है कि देश की बहुत सी बुनियादी ढांचा कंपनियों के अपनी क्षमता बढ़ाने से उनकी नकदी आवक में इजाफा होगा।'

कोयले से बिजली के बजाय नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में निवेश

अगस्त, 2007 में जब मध्य प्रदेश में सासन अल्ट्रा मेगा बिजली परियोजना (यूएमपीपी) रिलायंस पावर को आवंटित की गई तो महज 1.19 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली मुहैया कराने के वादे के साथ वह बिजली उत्पादकों की दुलारी बन गई क्योंकि देश में बिजली की वह सबसे कम कीमत थी। इससे पहले आयातित कोयले से बिजली बनाने वाली मुंद्रा यूएमपीपी दिसंबर 2006 में टाटा पावर के हवाले की गई थी और बिजली की कीमत 2.26 रुपये प्रति यूनिट रखी गई थी। दोनों यूएमपीपी की कुल क्षमता 4,000 मेगावॉट थी और दोनों अभी चल रही हैं, लेकिन यूएमपीपी का अनुभव अच्छा नहीं रहा क्योंकि रिलायंस पावर को ही आवंटित तिलैया और कृष्णापत्तनम यूएमपीपी अभी तक चालू नहीं हो पाई हैं।

यूएमपीपी योजना ने खरीद करार पर हस्ताक्षर, जमीन हासिल करना, मंजूरी हासिल करना, बोली पाना जैसे निर्माण से पहले के जोखिम समाप्त करने का प्रयास किया। सासन और मुंद्रा परियोजनाओं की बदौलत बिजली उत्पादन क्षमता में 8,000 मेगावॉट का इजाफा हुआ है, जो 10वीं पंचवर्षीय योजना के आखिरी साल 2006-07 में बढ़ी उत्पादन क्षमता 2,042 मेगावॉट का करीब चार गुना है। इस समय देश में 3,30,861 मेगावॉट की बिजली उत्पादन क्षमता पूरी तरह तैयार है, जिसमें निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 1,47,125.06 मेगावॉट यानी 44 फीसदी है। ये दो यूएमपीपी बिजली तो बनाने लगे, लेकिन इन दो परियोजनाओं की प्रवर्तक टाटा पावर और आर पावर को बिजली खरीदने वाली वितरण कंपनियों के साथ कई विवादों से दो-चार होना पड़ा।

बिजनेस स्टैंडर्ड बुनियाद को चाहिए मजबूत हाथइक्रा की नवंबर की रिपोर्ट के मुताबिक निजी स्वतंत्र बिजली उत्पादकों  की जमात में 600 गीगावॉट के ताप बिजली संयंत्र कर्ज में डूबे हैं। इनमें 26 गीगावॉट के संयंत्र इसलिए फंसे हैं क्योंकि लंबी अवधि के बिजली खरीद करार नहीं हो रहे हैं। 12 गीगावॉट के संयंत्र इसलिए फंसे हैं क्योंकि देश में गैस की किल्लत होने और आयातित कोयला महंगा होने के कारण बिजली उत्पादन की लागत बढ़ गई है और महंगी बिजली खरीदने को कोई तैयार नहीं है। इक्रा की रिपोर्ट में कहा गया कि प्रतिस्पर्धी बोली के जरिये लंबी खरीद के करार भी सुस्त पड़ गए हैं क्योंकि सरकारी वितरण कंपनियों की माली हालत कमजोर है। पिछले तीन साल में महज 1.4 गीगावॉट के लंबी अवधि के बिजली खरीद करार किए हैं।

हालांकि सरकार कोयला आवंटित कर और बिजली की मांग को एक साथ जोड़कर बेकार पड़े संयंत्रों को फिर चालू करने की कोशिश में है, लेकिन उसका जोर नवीकरणीय या अक्षय ऊर्जा पर है। पहले 2022 तक 174 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता तैयार करने का लक्ष्य था, जिसे अब 2020 में ही हासिल करने का प्रयास किया जा रहा है। फिलहाल देश में 60 मेगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन की क्षमता है। नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादन में भी कई दिक्कतें हैं। बिजली की खरीद नहीं होना सबसे बड़ा मसला है क्योंकि पवन ऊर्जा और सौर ऊर्जा की कीमत 4 रुपये प्रति यूनिट से कम होने मगर चीन और इंडोनेशिया से आए सौर उपकरणों पर 70 फीसदी शुल्क लगाने का प्रस्ताव करने से बिजली बहुत महंगी हो गई।

एसऐंडपी ग्लोबल के मुताबिक अगले दशक में नवीकरणीय ऊर्जा में और बढ़ोतरी होगी, जिसे बैटरी स्टोरेज तकनीक में सुधारों से मदद मिलेगी। विकासशील देशों में बिजली की मांग में बढ़ोतरी जारी रहेगी, जबकि विकसित देशों में मांग सपाट ही रहेगी। इलेक्ट्रिक वाहन आने से यह रुझान तेज होगा और बिजली की मांग में भी इजाफा होगा। बिजली की मांग पल-पल बदलेगी क्योंकि विकसित बाजारों में स्मार्ट मीटर आने से किसी एक समय मांग और कीमत के बारे में बेहतर संकेत मिल सकेंगे। घरों में उपकरणों के डिजिटल समायोजन से यह प्रक्रिया और तेज होगी। इसने कहा है, 'खुद बिजली पैदा करने से कुछ जगहों पर स्थानीय वितरण प्रणाली शुरू हो सकती है, लेकिन हमें नहीं लगता कि खुद बिजली पैदा करना सभी जगह संभव होगा।'

बेहतर परिवहन ढांचे से संपर्क में सुधार

सभी सरकारों का बेहतर परिवहन पर जोर रहता है। यही वजह है कि क्षमता कम होने, 2008 में मंदी आने और 2017-18 में जीडीपी की वृद्धि 6.5 फीसदी रहने के अनुमान के बावजूद इस क्षेत्र से जुड़ी परियोजनाएं बेअसर रही हैं। लेकिन 2008 से पहले के दौर से इतर अब बुनियादी ढांचे का विकास मुख्य रूप से सरकारी निवेश पर निर्भर है। ज्यादातर कंपनियां अपने ठेकों के लिए सरकारी वित्त पोषित परियोजनाओं पर निर्भर हैं।

रेलवे में अल्सटॉम और जीई को डीजल और बिजली इंजनों के ठेके देने के अलावा सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) जोर नहीं पकड़ पाई है। राजमार्ग क्षेत्र में 2008 से पहले भरपूर निजी निवेश हो रहा था, लेकिन अब इसमें भी हाइब्रिड एन्यूइटी मॉडल (हम) अपनाया जा रहा है। हम को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जनवरी, 2016 में मंजूरी दी थी। इसमें सरकार निर्माण कार्य शुरू होने के समय पूंजीगत लागत के एक हिस्से का भुगतान करती है। इस तरह निजी कंपनी को वाणिज्यिक परिचालन से पहले ही कमाई होने लगती है। यह परंपरागत एन्यूइटी मॉडल से अलग है, जिसमें सरकार परियोजना शुरू होने के बाद हर छह महीने में भुगतान करती है।

बिजनेस स्टैंडर्ड बुनियाद को चाहिए मजबूत हाथअब सड़क परिवहन मंत्रालय भारतमाला कार्यक्रम शुरू करने जा रहा है, जिसमें जहाजरानी और राजमार्ग क्षेत्रों की कई परियोजनाएं एक साथ आ जाएंगी। इससे सरकारी फैसले आनन-फानन में लिए जाने के आसार हैं। भारतमाला कार्यक्रम और वर्तमान योजनाओं को वित्त वर्ष 2017-18 से 2021-22 तक जो बजट सहायता मिलेगी, उसमें केंद्रीय सड़क कोष से 2,37,024 करोड़ रुपये, बजट आवंटन के रूप में 59,973 करोड़ रुपये, टीओटी के जरिये 34,000 करोड़ रुपये और एनएचएआई द्वारा टोल-स्थायी सेतु शुल्क कोष के रूप में इकट्ठे किए गए 46,048 करोड़ रुपये शामिल हैं।

कार्यक्रम का पहला चरण एनएचएआई, एनएचआईडीसीएल, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और राज्य लोक निर्माण विभाग के जरिये लागू किया जाएगा। इसके अलावा एक नया प्रस्ताव भी रखा गया है। पीपीपी के जरिये बनने वाली जिन बिल्ट-ऑपरेट-ट्रांसफर (टोल) परियोजनाओं में ठेकेदार को कोई अनुदान नहीं मिलता और निर्माण एवं मरम्मत का खर्च टोल के जरिये हुई कमाई से निकाला जाता है, उनके आकलन और मंजूरी का अधिकार एनएचएआई को होगा। एनएचएआई द्वारा शुरू की जाने वाली सभी ईपीसी परियोजनाओं को एनएचएआई का बोर्ड उनके उचित आकलन के बाद मंजूरी देगा। एनएचएआई का बोर्ड आकलन और मंजूरी की अपनी शक्तियां एचएचएआई में किसी अन्य को सौंपने के लिए अधिकृत होगा।

बिजनेस स्टैंडर्ड बुनियाद को चाहिए मजबूत हाथअलबत्ता रेलवे के पास निवेश बढ़ाने का कोई स्पष्ट खाका नहीं है। हालांकि यह साफ है कि निवेश में बढ़ोतरी काफी हद तक उधारी और आंतरिक नकदी सृजन पर निर्भर होगी क्योंकि सरकारी खजाने के पास निवेश करने की गुंजाइश नहीं होगी। जब सुरेश प्रभु रेल मंत्री थे तो रेलवे ने 2015 से पांच वर्ष तक कुल 8,56,020 करोड़ रुपये के निवेश की योजना बनाई थी। इसमें एक तिहाई उधारी से आना था। वर्तमान रेल मंत्री पीयूष गोयल का कहना है कि बजट आवंटन पर निर्भरता खत्म कर दी जाएगी यानी उधारी पर ज्यादा जोर होगा क्योंकि किसी भी सार्वजनिक परिवहन सेवा की आंतरिक स्तर पर संसाधन पैदा करने की क्षमता सीमित होती है।

सुरक्षा पर ज्यादा जोर देने का मतलब है निवेश भी ज्यादा चाहिए। रेल सुरक्षा का खयाल रखते हुए इंटीग्रल कोच फैक्टरी (आईसीएफ) द्वारा डिजाइन किए गए डिब्बों का निर्माण बंद कर दिया गया है क्योंकि ये डिब्बे दुर्घटना के समय एक-दूसरे के ऊपर चढ़ जाते हैं। लेकिन ऐसे 40,000 डिब्बों को रेलवे बेड़े से एक साथ बाहर करना मुमकिन नहीं है क्योंकि 90 फीसदी डिब्बे ऐसे ही हैं और उन्हें बाहर करने के लिए बड़ी धनराशि चाहिए। कुछ डिब्बे अब भी चलने की स्थिति में हैं। सुरक्षा के लिए उनमें कपलर जोड़े जा रहे हैं। टूटी पटरियों का पता लगाने के लिए रेल फ्रैक्चर डिटेक्शन सिस्टम लगाया जा रहा है। नई पटरियां प्राथमिकता के साथ बिछाई जा रही हैं। जहां दुर्घटनाओं का जोखिम ज्यादा है और रेल पटरियों का नवीकरण नहीं हुआ है, वहां नई पटरियां बिछाने की अधिक जरूरत है। ये उपाय इसलिए जरूरी हैं क्योंकि डिब्बों से लेकर पटरियों तक रेलवे का बुनियादी ढांचा खस्ताहाल है। खस्ताहाल इसलिए है कि बतौर रेल मंत्री नीतीश कुमार ने 2001 में जो रेल सुरक्षा कोष बनाया था, उसे खत्म कर दिया गया।

फरवरी, 2017 में रेल बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 'राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष' बनाने की घोषणा की थी। 1 लाख करोड़ रुपये के इस कोष से सुरक्षा संबंधी अहम कार्यक्रमों के लिए रकम दी जानी थी। यह बात अलग है कि निवेश का असर दो साल बाद ही दिखेगा।

फिलहाल रेलवे के लिए सबसे अहम बुलेट ट्रेन परियोजना है। गोयल ने 1.10 लाख करोड़ रुपये की परियोजना पूरी करने की अवधि घटाकर अगस्त, 2022 कर दी है। अहमदाबाद-मुंबई परियोजना के लिए आवश्यक 1.10 लाख करोड़ रुपये के कुल निवेश में से जापान 88,000 करोड़ रुपये का कर्ज 0.01 फीसदी ब्याज पर दे रहा है। जापान ने 6,000 करोड़ रुपये की पहली किस्त दे भी दी है। यह गुजरात में साबरमती स्टेशन बनाने और हाई स्पीड रेल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट स्थापित करने के लिए है।

यह रेल लाइन 508 किलोमीटर लंबी है। महाराष्ट्र में इसका 156 किलोमीटर, गुजरात में 351 किलोमीटर और दादर नगर हवेली में 2 किलोमीटर हिस्सा होगा। इसमें 21 किलोमीटर का सबसे लंबी सुरंग होगी, जिसमें 7 किलोमीटर लंबी सुरंग ठाणे में समुद्र के नीचे होगी। इस ट्रेन के 12 स्टेशन - मुंबई, ठाणे, विरार, बोइसर, वापी, बिलिमोरा, सूरत, भरूच, वडोदरा, आणंद, अहमदाबाद और साबरमती होंगे। यह बुलेट ट्रेन 320 से 350 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से दौड़ेगी। शुरुआती चरण में इस मार्ग पर 35 ट्रेन चलेंगी और हरेक में 10 डिब्बे होंगे। वर्ष 2023 तक ट्रेनों की संख्या बढ़ाकर 105 कर दी जाएगी।

बुलेट ट्रेन को टक्कर देंगी विमानन कंपनियां

हालांकि 1.10 लाख करोड़ रुपये की बुलेट ट्रेन परियोजना में किराये का खाका अभी तैयार नहीं किया गया है। लेकिन शुरुआती अनुमानों के मुताबिक इसका किराया सामान्य ट्रेन में फस्र्ट क्लास एसी के किराये का 1.5 गुना हो सकता है। अहमदाबाद-मुंबई, मार्ग पर एसी फस्र्ट क्लास के वर्तमान किराये 1,700 से लेकर 2,300 रुपये तक हैं, जबकि हवाई टिकट 2,000 रुपये से शुरू होते हैं। इसका मतलब है कि यात्रियों को बुलेट ट्रेनों से सफर के लिए हवाई टिकट से ज्यादा दाम चुकाने होंगे।

इस परियोजना का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इस मार्ग पर यात्रा का समय 8 घंटे से घटकर महज 2 घंटे 58 मिनट रह जाएगा। इस मार्ग पर हवाई सफर में केवल एक घंटा 20 मिनट लगता है। इससे हवाई यात्रा ज्यादा किफायती बन जाती है और इसमें बुलेट ट्रेन की तुलना में समय भी कम लगता है।

आगे की राह

जेटली ने 2017-18 में बुनियादी ढांचे के सृजन और सुधार के लिए 3,96,135 करोड़ रुपये का बजट रखा था। अगले वित्त वर्ष के लिए उन्होंने 5.97 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया है। एसऐंडपी ग्लोबल के मुताबिक बुनियादी ढांचे पर निवेश ज्यादा रहेगा क्योंकि देश में सभी उप-क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का अभाव है। लेकिन ज्यादातर निवेश सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम करेंगे। इसमें टोल रोड शामिल हैं, जिनमें विवादों और भुगतान में देरी के कारण निजी क्षेत्र की भागीदारी घटी है।

इसने हाल की एक रिपोर्ट में कहा, 'निजी क्षेत्र की कंपनियां विद्युत क्षेत्र, विशेष रूप से तेजी से बढ़ते नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में ज्यादा सक्रिय हैं। सरकारी कंपनियों ने बंदरगाहों और हवाई अड्डों में बड़ा निवेश करने की योजना बनाती हैं, लेकिन देरी ऐसे प्रयासों की धार कुंद कर देती है। मजबूत वृद्धि और ऊंचा मार्जिन होने के बावजूद कुछेक निजी कंपनियां ही बंदरगाह और हवाई अड्डों में निवेश करती हैं। इसकी वजह यह है कि इनमें ज्यादा पूंजी की जरूरत होती है और नियामकीय अनिश्चितता भी बनी रहती है।'

भारतीय बुनियादी ढांचा क्षेत्र की कंपनियों की हैसियत में बहुत अधिक अंतर है। इससे पता चलता है कि विभिन्न उप-क्षेत्रों में नियामकीय और प्रतिस्पर्धी माहौल भी अलग-अलग है। एसऐंडपी ने कहा, 'मजबूत नियमन देश की नियमित कंपनियों की हमारी निवेश ग्रेड रेटिंग को सहारा देते हैं। मजबूत नियमनों से नकदी आवक में स्थायित्व आता है। इसके विपरीत हवाई अड्डों के लिए समयबद्ध या स्थायी नियमनों का अभाव नकदी आवक के नजरिये को धुंधला बनाता है, जिसका क्षेत्र की रेटिंग पर असर पड़ता है।'

आराम की सवारी मेट्रो

बिजनेस स्टैंडर्ड बुनियाद को चाहिए मजबूत हाथइस समय देश में 8 मेट्रो रेल नेटवर्क चालू हैं, जिनकी कुल लंबाई 370 किलोमीटर है। इनमें दिल्ली मेट्रो भी शामिल है, जो दिसंबर, 2002 में शुरू किया गया था। दिल्ली मेट्रो को 8.3 किमी लंबी लाइन के साथ शुरू किया गया था। अब इसका नेटवर्क कुल 231 किमी लंबा हो गया है, जिसमें 173 चालू मेट्रो स्टेशन हैं। तीसरा चरण पूरा होने के बाद इसका नेटवर्क कुल 375 किमी लंबा हो जाएगा। दिल्ली मेट्रो में इस समय कुल 227 ट्रेन चल रही हैं। इनमें से 128 ट्रेन छह डिब्बे वाली हैं, 58 आठ डिब्बों वाली और 41 ट्रेन चार डिब्बों वाली हैं। इस तरह दिल्ली मेट्रो की 227 ट्रेनों में कुल 1,500 डिब्बे हैं।

फरवरी, 2011 में दिल्ली मेट्रो की एयरपोर्ट लाइन भी शुरू कर दी गई। उस समय करीब 10,000 लोग रोजाना इसका इस्तेमाल करते थे। तकनीकी दिक्कतों के कारण इस लाइन को 7 जुलाई, 2012 से 22 जनवरी, 2013 के बीच बंद रखा गया। पहले इस लाइन का परिचालन एक निजी कंपनी के हाथ में था, लेकिन 2013 में ही दिल्ली मेट्रो रेल निगम (डीएमआरसी) ने इसकी बागडोर अपने हाथ ले ली। अब रोजाना करीब 50,000 लोग एयरपोर्ट लाइन पर सफर करते हैं। 17 अक्टूबर, 2017 को सबसे ज्यादा मुसाफिरों ने सफर किया था। उस दिन इसके यात्रियों की संख्या 62,958 रही थी।

डीएमआरसी ने अब रेल-डिब्बों का आयात बंद कर दिया है। उसकी सभी ट्रेनें देश में ही बनी हैं और उनका उत्पादन अहमदाबाद तथा बेंगलूरु में किया जा रहा है। पहले डिब्बों का आयात किया जाता था और उन्हें आपस में जोड़कर ट्रेन बना दी जाती थी। लेकिन अब यह काम बंद हो चुका है।

दिल्ली मेट्रो की सुरक्षा का जिम्मा 13 अप्रैल, 2007 को केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) ने संभाल लिया था। शुरुआत में इस बल के 1,633 कर्मचारियों को तैनात किया गया था। अब दिल्ली मेट्रो में सीआईएसएफ के लगभग 7,000 कर्मी तैनात हैं और किसी भी तरह की अवांछित घटना से निपटने के लिए उनके पास सभी तरह के बंदोबस्त हैं।

दिल्ली मेट्रो ने 2 अक्टूबर, 2010 को 'महिला डिब्बा' शुरू किया था। प्रत्येक ट्रेन का पहला डिब्बा महिलाओं के लिए आरक्षित रहता है। इसके अलावा सामान्य डिब्बों में भी उनके लिए सीटें आरक्षित हैं। प्लेटफॉर्म के जिस हिस्से से महिलाएं इस डिब्बे में चढ़ती हैं, उस हिस्से पर गुलाबी रंग के निशान बनाए गए हैं।

बिजनेस स्टैंडर्ड बुनियाद को चाहिए मजबूत हाथ
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