बिजनेस स्टैंडर्ड - बढ़ता जाए सोने-चांदी का निखार
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बढ़ता जाए सोने-चांदी का निखार

सुशील मिश्र /  03 01, 2018

सोना-चांदी
 दौर कैसा भी रहा हो, प्रतिफल की कसौटी पर दोनों कीमती धातु एकदम खरी उतरी है

बिजनेस स्टैंडर्ड बढ़ता जाए सोने-चांदी का निखार

वैश्विक अर्थव्यवस्था एक दशक पहले आर्थिक मंदी के झंझावात में फंसी थी और निवेश के ज्यादातर विकल्प उसकी मार से औंधे पड़े थे। उस वक्त सोना ही निवेशकों को इकलौता सहारा लगा, लेकिन उसकी कीमत भी उतार-चढ़ाव से गुजरती रही। बाद में सोना सरकारी सख्ती, आयात शुल्क की बेड़ी, पैन कार्ड के अंकुश और नोटबंदी की मार से अछूता नहीं रह सका। कई बार वह मंदी के मकडज़ाल में भी फंसा, लेकिन हर बार उसकी चमक और भी निखर गई, उसके प्रति निवेशकों का भरोसा और भी बढ़ गया।

दुनिया में सबसे मजबूत मानी जाने वाली अमेरिकी अर्थव्यवस्था 2008 के मध्य में लीमन ब्रदर्स के ढहने से हिली तो पूरी दुनिया में इसकी जुंबिश महसूस की गई और वैश्विक अर्थव्यवस्था अब तक उसके असर से पूरी तरह नहीं उबर पाई है। निवेश के दूसरे विकल्प धराशायी हुए तो सोने पर भी काली छाया पड़ी। इसके बावजूद सोने ने पूरे दशक में निवेशकों को औसतन 10 फीसदी प्रतिफल दिया। 2008 में सोने का औसत भाव 13,435 रुपये प्रति 10 ग्राम था, जो इस समय 30,000 रुपये के करीब है। 2013 से 2015 के बीच का दौर छोड़ दें तो सोना हर साल निवेशकों की उम्मीदों पर खरा उतरा है। 2008 में सोने की कीमत 26 फीसदी, 2009 में 24 फीसदी, 2010 में 23 फीसदी, 2011 में 32 फीसदी, 2012 में 12 फीसदी, 2016 में 12 फीसदी और 2017 में करीब पांच फीसदी बढ़ीं। 2013 में सोना करीब 4 फीसदी, 2014 में 9 फीसदी और 2015 में 7 फीसदी लुढ़का।

उधर चांदी ने सोने के बराबर प्रतिफल भले नहीं दिया हो, लेकिन पूरे दशक की बात करें तो औसतन 7 फीसदी प्रतिफल तो निवेशकों के हिस्से आ ही गया। 2008 में चांदी के भाव 7.5 फीसदी तक लुढ़क गए थे, लेकिन अगले ही साल उसने 52 फीसदी की उछाल भरी। 2010 में चांदी पर 72 फीसदी का ऐतिहासिक प्रतिफल हासिल हुआ। उसके अगले साल चांदी 8 फीसदी और 2012 में 13 फीसदी चढ़ी। अलबत्ता 2013 में चांदी के दाम 24 फीसदी लुढ़क गए। उसके अगले साल 15 फीसदी और 2015 में 10 फीसदी गिरावट के साथ चांदी ने भी निवेशकों के प्रति सोने की तरह बेरुखी दिखाई। मगर 2016 फिर खुशखबरी लाया, जब चांदी ने 19 फीसदी का प्रतिफल दिया।

आगे की बात करें तो देसी-विदेशी अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेतों के बीच कच्चे तेल के बढ़ते दाम और डॉलर में कमजोरी तथा सोने के उत्पादन में कमी की आशंका निवेशकों के लिए अच्छा पैगाम है। यदि आपने सोने में रकम लगाई है तो खुश हो जाइए क्योंकि आने वाले समय में सोने की चमक और भी निखर सकती है। सराफा कारोबार के जानकार नवीन माथुर के हिसाब से तेजी और मंदी का चक्र होता है और सोना-चांदी मंदी का चक्र पार कर चुके हैं।

मुंबई ज्वैलर्स एसोसिएशन के सचिव कुमार जैन को भी आगे अच्छे की उम्मीद है। वह कहते हैं कि प्रतिकूल हालात के कारण मांग में कमी आई थी, लेकिन अब उठापटक खत्म हो चुकी है। इसीलिए पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ते कारोबार में सोने की मांग तथा कीमत सुधर सकती है।

सोने के लिए पिछले एक दशक में कम आफत नहीं रहीं। व्यापार संतुलन के बिगड़ते समीकरण को बचाने के लिए सरकार ने सोने पर आयात शुल्क की चाबुक चलाने का फैसला लिया। सोने के निर्यात को हतोत्साहित करने के लिए सरकार ने 17 जनवरी, 2012 को आयात शुल्क बढ़ाकर 2 फीसदी कर दिया, जबकि इसके पहले प्रति 10 ग्राम सोने के आयात पर 300 रुपये आयात शुल्क देना पड़ता था। इससे सोने के आयात पर कोई फर्क नहीं पड़ा तो तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने तीन महीने बाद 17 मार्च को आयात शुल्क बढ़ाकर 4 फीसदी कर दिया। 21 जनवरी, 2013 को उसे 6 फीसदी, 5 जून, 2013 को 8 फीसदी और 13 अगस्त, 2013 को 10 फीसदी कर दिया गया। इससे सराफा कारोबारियों को कारोबार बरबाद होता दिखा और दुकानें बंद कर वे सड़कों पर उतर गए। लंबे आंदोलन के बाद भी सरकार ने देश हित के नाम पर आयात शुल्क वापस लेने से इनकार कर दिया।

 बिजनेस स्टैंडर्ड बढ़ता जाए सोने-चांदी का निखारइस बीच सोने के आयात शुल्क ने राजनीति चमकाने का मौका भी दूसरी पार्टियों को दिया। भारतीय जनता पार्टी ने सराफों से वायदा किया कि सत्ता में आने पर वह आयात शुल्क हटा देगी। लेकिन सत्ता हासिल करते ही नरेंद्र मोदी सरकार वायदे से मुकर गई और आयात शुल्क में कमी नहीं की गई। शुल्क की मार से 2013-14 में सोने का आयात 43 फीसदी गिर गया। 2015-16 में इसमें 2 फीसदी और 2016-17 में 11 फीसदी गिरावट आई। हालांकि बीच के तीन साल छोड़ दें तो सोने की मांग साल-दर-साल बढ़ती ही रही है। चालू वित्त वर्ष में सोने का आयात करीब 50 फीसदी और चांदी की मांग करीब 83 फीसदी अधिक रहने का अनुमान लगाया जा रहा है।

सराफा कारोबारियों के मुताबिक देश में सोने की मांग कभी कम हुई ही नहीं थी। आयात शुल्क बढ़ा तो तस्करी के जरिये मांग पूरी होती रही। सराफा कारोबार के जानकार हार्दिक हुंडिया कहते हैं कि सरकार अपनी आंखों पर पट्टïी बांधकर दूसरों की आंखों में धूल झोंक रही है। देश में हर साल करीब 900 से 1,000 टन सोने की खपत होती है और 2016-17 में करीब 650 टन सोना आयात हुआ। ऐसे में साफ है कि बाकी 350 टन सोना तस्करी के रास्ते ही आया। उद्योग से जुड़े लोग बताते हैं कि हर हफ्ते शुक्रवार और शनिवार को कंटेनरों में भरकर सोना प्रमुख बंदरगाहों में पहुंचता है और वहां से तस्करों के एजेंट उसे देश भर में पहुंचा देते हैं। तस्करी रोकनी है तो आयात शुल्क में कटौती ही इकलौता रास्ता है। इसीलिए सरकार को आयात शुल्क में कटौती शुरू कर देनी चाहिए।

उद्योग संगठन फिक्की की रत्न एवं आभूषण समिति के अध्यक्ष संजीव अग्रवाल कहते हैं कि आयात शुल्क 3 फीसदी से नीचे कर दिया गया तो सोने की तस्करी रुक जाएगी। आयात शुल्क 10 फीसदी होने के बाद से नशे से ज्यादा तस्करी सोने की हुई है। अनुमान है कि हर साल 100-150 टन से ज्यादा सोने की तस्करी होती है, जो देश के लिए खतरनाक है।

आभूषण कारोबारियों के लिए पिछले एक दशक में सबसे ज्यादा हैरान करने वाला साल 2017 रहा। काले धन के खिलाफ जंग का ऐलान करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी का ऐलान किया। इससे बाजार में नकदी की जबरदस्त किल्लत हो गई, जिसकी सबसे तगड़ी चोट सोने के कारोबार पर पड़ी। हालांकि नोटबंदी वाले दिन तो जेवरात कारोबारियों की दुकानों पर दीवाली हो गई थी। एक ही दिन में हजारों करोड़ रुपये की खरीदारी कर ली गई, लेकिन दूसरे दिन खरीदार नदारद हो गए। उसके बाद आयकर विभाग ने सख्ती शुरू की, जिससे पूरा उद्योग हिल गया। नोटबंदी के बाद एक साल तक इस कारोबार की चमक फीकी ही रही। सोने की मांग कम हुई तो सरकार के इस दावे को बल मिला कि सोना खरीदने में काले धन का इस्तेमाल होता है।

बिजनेस स्टैंडर्ड बढ़ता जाए सोने-चांदी का निखारऑल इंडिया जेम्स ऐंड ज्वैलरी ट्रेड फेडरेशन के चेयरमैन नितिन खंडेलवाल के मुताबिक नोटबंदी के बाद के कुछ महीनों में कारोबार करीब 75 फीसदी गिर गया। बाद में नकदी की आपूर्ति बढ़ी तो मांग भी सुधरी, लेकिन 2016 के मुकाबले पिछले साल मांग 25 फीसदी कम रही। उसी साल सरकार ने सोने को काले धन का ठिकाना मानते हुए खरीद पर पैन कार्ड अनिवार्य कर दिया तो आभूषण विक्रेताओं में हाहाकार ही मच गया। हालांकि बाद में 50,000 रुपये के बजाय 2 लाख रुपये तक की खरीद पर पैन कार्ड की अनिवार्यता खत्म होने से उन्हें राहत मिली।

मंदी की आंधी अब थम चुकी है और सोना-चांदी तमाम झंझावातों को पार कर परिपक्व हो रहे हैं। सराफा कारोबारी समीर जैन कहते हैं कि सोना हाजिर से वायदा और विकल्प तक का सफर तय कर चुका है। सरकार की नीतियां स्पष्ट हो चुकी हैं और बदलाव को बाजार ने स्वीकार कर लिया है। ऐसे में सोने की चमक दिन-ब-दिन निखरने ही जा रही है। सरकार का ध्यान कौशल विकास और रोजगार सृजन पर है और उससे जुड़ी घोषणा किसी भी समय हो सकती है। जल्द ही स्वर्ण बोर्ड भी बन सकता है ताकि सोने को 7-8 नियामकीय संस्थाओं से मुक्ति मिल जाए। चीन और तुर्की की तरह गोल्ड स्पॉट एक्सचेंज की घोषणा भी हो सकती है, जो इस उद्योग के लिए अच्छी खबर होगी।

बिजनेस स्टैंडर्ड बढ़ता जाए सोने-चांदी का निखार
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