बिजनेस स्टैंडर्ड - रुपहले पर्दे की बदली चाल और ढाल
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रुपहले पर्दे की बदली चाल और ढाल

उर्वी मलवाणिया /  03 01, 2018

फिल्म

पिछले एक दशक में फिल्म उद्योग की सूरत बिल्कुल बदल गई है। अंतरराष्ट्रीय छौंक के साथ तकनीक के बेहतर इस्तेमाल ने भारतीय फिल्म जगत को नए मुकाम पर पहुंचा दिया है

बिजनेस स्टैंडर्ड रुपहले पर्दे की बदली चाल और ढाल

क दशक का समय लंबा होता है, लेकिन फिल्म उद्योग की बात हो तो यह और भी लंबा लग सकता है। भारतीय सिनेमा के 100 वर्षों से अधिक के कालखंड में से 2008-2018 का दशक सर्वाधिक निर्णायक रहा है। इस दौरान भारतीय सिनेमा नित नए बदलावों का गवाह बना, लेकिन कुछ पहलू अब भी पुराने दौर की तरह अपनी जड़ें जमाए हुए हैं।

संभवत: पिछले दशक में हुआ सबसे अहम बदलाव यह है कि फिल्म कारोबार में अब कॉर्पोरेट जगत भी खुलकर शामिल हो चुका है। एक सदी से अधिक पुराना उद्योग होते हुए भी भारतीय सिनेमा के प्रति कॉर्पोरेट जगत का भरोसा पिछले दशक में ही कायम हो पाया है। इस दिशा में पहला कदम वर्ष 2011 में उठाया गया था, जब अमेरिका की दिग्गज मनोरंजन कंपनी वाल्ट डिज्नी ने रोनी स्क्रूवाला की यूटीवी सॉफ्टवेयर को खरीदा था। वैसे फिल्म एवं मनोरंजन जगत से कॉर्पोरेट घरानों का जुड़ाव इसके भी पहले शुरू हो चुका था। टीवी18 ने वर्ष 2006 में ही फिल्म निर्माण में कदम रख दिया था और उसके दो साल बाद फॉक्स स्टार स्टूडियोज ने भी भारत में अपने कदम रख दिए थे। डिज्नी तो 2008 से ही भारतीय फिल्म उद्योग में मौजूद थी।

फिल्म कारोबार में बड़ी कंपनियों के प्रवेश करने से बहुतेरे लोगों के लिए बहुत कुछ बदल गया। कुछ लोग मानते थे कि वैश्विक मनोरंजन कंपनियों के भारत में आने से यहां की घरेलू फिल्म निर्माण कंपनियों के लिए तगड़ा खतरा पैदा हो जाएगा। कुछ लोगों ने इसे भारत में फिल्म उद्योग के प्रसार और विस्तार के मौके के तौर पर देखा। बहरहाल भारतीय मनोरंजन उद्योग के कॉर्पोरेट स्वरूप अख्तियार करने के एक दशक बाद यह नजर आता है कि यशराज फिल्म्स और धर्मा प्रोडक्शंस जैसे घरेलू बैनरों के साथ ही डिज्नी, फॉक्स स्टार और वायकॉम18 जैसे कॉर्पोरेट स्टूडियो के लिए भी पर्याप्त गुंजाइश मौजूद है।

उनके गठजोड़ से ऐसा कारोबारी मॉडल विकसित हुआ जिसमें कॉर्पोरेट ने खुद को फिल्मों के वितरण एवं विपणन तक सीमित रखा जबकि रचनात्मक मोर्चे पर घरेलू निर्माताओं को खुली छूट होती है। यह मॉडल कुछ समय तक कारगर साबित हुआ और कुछ मजबूत कारोबारी रिश्ते भी विकसित हुए, लेकिन जल्द ही कॉर्पोरेट को अहसास हो गया कि बॉलीवुड के भीड़ भरे बाजार में अपनी पकड़ बनाने के लिए उन्हें भी खुलकर उतरना होगा, हाशिये पर रहने से काम नहीं चलेगा।

फॉक्स स्टार स्टूडियो इसी तरह का उदाहरण है। वर्ष 2015 में इस स्टूडियो को कुछ फिल्मों के निर्माण में कदम रखने के बाद काफी नुकसान उठाना पड़ा था। हालांकि उस साल कमाई के मामले में दूसरी सबसे सफल फिल्म प्रेम रतन धन पायो उसके ही बैनर से आई थी लेकिन शानदार और बॉम्बे वेलवेट की नाकामी ने उसे तगड़ी चोट पहुंचाई थी। उस सबक को याद रखते हुए फॉक्स स्टार ने यह तय किया कि वह हरेक साल अलग-अलग तरह की फिल्में लाएगी।

फॉक्स स्टार इंडिया के प्रमुख विजय सिंह कहते हैं कि अब उनका स्टूडियो परियोजना पूरी होने तक चुप नहीं रहता। वह कहते हैं, 'अब हम परियोजना में अधिक जुड़े रहते हैं। शुरू से अंत तक इस बात का ध्यान रखते हैं कि स्क्रिप्ट के मुताबिक बजट को नियंत्रित रखा जाए।' नतीजा यह हुआ कि वर्ष 2016 से फॉक्स स्टार को भारतीय कारोबार में कहीं अधिक स्थिरता देखने को मिली है। लेकिन वर्ष 2016 में ही डिज्नी इंडिया ने खुद को बॉलीवुड से अलग करने का ऐलान कर दिया था। पहली नजर में भले ही यह फैसला चौंकाने वाला लगा हो लेकिन फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों को इसने उतना अचरज में नहीं डाला। विशेषज्ञों का कहना था कि फिल्म में अधिक रकम लगाने से ही कारोबार नहीं बढ़ सकता। बॉलीवुड से अपने कदम पीछे खींचने के बारे में पूछे जाने पर डिज्नी इंडिया के एक प्रवक्ता ने कहा, 'स्थानीय फिल्म उद्योग में निवेश के लिए वर्तमान आर्थिक मॉडल चुनौती भरा है। इसीलिए हम भारत में हॉलीवुड फिल्मों के प्रदर्शन पर ध्यान लगा रहे हैं।'

बिजनेस स्टैंडर्ड रुपहले पर्दे की बदली चाल और ढालहालांकि 2014 में डिज्नी इंडिया की पीके 340 करोड़ रुपये की कमाई के साथ सबसे सफल फिल्म साबित हुई थी, लेकिन उसके बाद नतीजे मिले-जुले ही रहे। डिज्नी की 2015 में आई फिल्में एबीसीडी-2 और बागी लागत के लिहाज से काफी सफल रही थीं। एबीसीडी-2 में 50 करोड़ रुपये खर्च हुए और 105 करोड़ रुपये की कमाई हुई। 38 करोड़ रुपये में बनी बागी ने 76 करोड़ रुपये कमाए थे। लेकिन उसकी तमाशा (2015), फितूर और साला खड़ूस (2016) अपनी लागत भी नहीं वसूल पाईं। कंपनी ने दक्षिण भारत से कारोबार दो साल पहले ही समेट लिया था क्योंकि दक्षिण भारतीय फिल्म बाजार उसके मुताबिक नहीं चल रहा था।

डिज्नी को सबसे बड़ा झटका हृतिक रोशन की फिल्म मोहेंजो दारो ने दिया था। 120 करोड़ रुपये में बनी फिल्म महज 56 करोड़ रुपये कमा पाई। फिल्म उद्योग से जुड़े एक सूत्र के मुताबिक सितारों की ऊंची फीस ने फिल्म की लागत बढ़ा दी, लेकिन विषय लोगों को पसंद नहीं आया। वह कहते हैं, 'बड़े बजट की फिल्मों के साथ हमेशा खतरा होता है और मोहेंजो दारो इसकी एक मिसाल है।'

डिज्नी इंडिया अपवाद है और बॉलीवुड तथा क्षेत्रीय सिनेमा में कॉर्पोरेट निवेश जारी है। फिल्मकार विक्रम भट्ट को लगता है कि अलग-अलग तरह के दर्शकों को देखकर पैसा लगाया जा रहा है। वह कहते हैं, 'मल्टीप्लेक्स आने के साथ ही दर्शकों को सिंगल स्क्रीन एवं मल्टीप्लेक्स में बांट दिया गया। नतीजतन आज हम ऐसे दौर में हैं, जब सिनेमाघरों से होने वाली कमाई की तुलना में फिल्मों के निर्माण पर हम कहीं अधिक पैसे लगा रहे हैं।'

भले ही बॉक्स ऑफिस से कमाई में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इसकी वजह महंगे टिकट हैं। साथ ही फिल्मों के प्रदर्शन के तरीके भी इस दशक में बदले हैं। सिनेमाघरों में फिल्म देखने आए दर्शकों को नया अनुभव दिलाने के लिए आईमैक्स और 4डीएक्स जैसे नए फॉर्मेट आए हैं। मुक्ता आर्ट्स लिमिटेड के प्रबंध निदेशक राहुल पुरी कहते हैं, 'पिछले 10 वर्षों में मल्टीप्लेक्स की संख्या तेजी से बढ़ी है। दूसरी श्रेणी के शहरों में भी अब मल्टीप्लेक्स की अच्छी खासी संख्या है जिससे दर्शकों को फिल्म देखने का नया अनुभव हो रहा है। फिल्मों का विषय भी बड़ी तेजी से बदला है। बिना किसी बड़े सितारे की छोटी बजट वाली फिल्में भी कामयाब हो रही हैं। न्यूटन जैसी फिल्म के निर्माता भी बॉक्स ऑफिस नतीजों से काफी खुश हैं। अक्षय कुमार जैसे बड़े अभिनेता भी अब टॉयलेट एक प्रेम कथा और स्पेशल 26 जैसी अलहदा विषय वाली फिल्में करने लगे हैं। दर्शकों को भी रोजमर्रा की मसाला फिल्में के बजाय अलग विषय वाली फिल्में पसंद लगी हैं।'

ऐसा होने से निर्माताओं ने भी नई-नई तकनीकों को हाथों-हाथ लेना शुरू कर दिया क्योंकि इससे कम बजट की कंटेंट आधारित फिल्में बन जाती हैं। फिल्मों में वीएफएक्स और एनिमेशन का इस्तेमाल भी नई तकनीक से ही संभव हुआ है। हॉलीवुड हरेक साल कई एनिमेशन फिल्में बनाता है और भारत में भी वे फिल्में अच्छा खासा कारोबार करती हैं।

मल्टीप्लेक्स में बिकने वाले खाने-पीने के सामान से मिलने वाले राजस्व में लगातार तेजी देखी जा रही है। इससे मल्टीप्लेक्स मालिकों को कमाई का एक और जरिया मिला है। हॉल के भीतर दिखाए जाने वाले विज्ञापन भी कमाई के स्रोत हैं। अतिरिक्त आय का जरिया बढ़ा है। इसी तरह हॉल के भीतर दिखाए जाने वाले विज्ञापन भी कमाई के अच्छे स्रोत हैं। विज्ञापनों एवं मार्केटिंग में नए तरह के प्रयोग होने का मतलब है कि विज्ञापनदाता और ब्रांड नए दर्शकों की तलाश में हैं और उन्हें मल्टीप्लेक्स और शॉपिंग मॉल्स से बेहतर जगह भला कहां मिल सकती है।

बीते दशक में सिनेमाघरों में मिलने वाली ढांचागत सुविधाओं में भी जबरदस्त बदलाव देखे गए हैं। आरामदेह रिक्लाइनर सीटों के इस्तेमाल से लेकर दर्शक की सीट पर ही खाने-पीने का सामान पहुंचाने और सीट में ही मोबाइल चार्जिंग पॉइंट की सुविधा जैसे कदम उठाए गए हैं। फिल्म देखने की तकनीक भी 70एमएम के पुराने दौर से निकलते हुए बड़ी तेजी से आईमैक्स के रास्ते लेजरप्लेक्स, 4डीएक्स और अब पीएक्सएल तक जा पहुंची है। दर्शक खुशी से इन बदलावों को स्वीकार कर रहे हैं। इन दिनों फिल्म निर्माता भी इन तकनीकों को ध्यान में रखते हुए ही अपनी फिल्में बना रहे हैं। मसलन आईमैक्स फॉर्मेट में बनी फिल्म को इस तकनीक वाले सिनेमाघर में ही देखा जा सकता है। दर्शक भी इन तकनीकी बदलावों से अनजान नहीं हैं और फिल्म देखने का फैसला करते समय इन सभी पहलुओं पर गौर करने लगे हैं। फिल्में देखने का अनुभव बेहतर होने के साथ ही ध्वनि तकनीक भी डॉल्बी डिजिटल से आगे बढ़ते हुए 7.1 सराउंड साउंड, ईसीएक्स, डॉल्बी एटमॉस और हरमन के क्वांटम लॉजिक तक जा पहुंची है।

धर्मा प्रोडक्शंस के मुख्य कार्याधिकारी अपूर्व मेहता का कहना है कि फिल्मों के विषय में विविधता आने के साथ डिजिटल तकनीकों के इस्तेमाल ने निश्चित रूप से फिल्म उद्योग की कारोबारी संभावनाओं को नया आयाम दिया है। मेहता कहते हैं, 'आज एक बढि़या फिल्म की कामयाबी के लिए एक अच्छी स्क्रिप्ट का होना सबसे ज्यादा जरूरी है। इसी तरह फिल्मों का संगीत भी पहले से काफी बदला है।' एक दशक पहले की तुलना में आज फिल्म में गानों को जबरदस्ती नहीं डाला जाता है। अब गानों को इस तरह पिरोया जाता है कि वे कहानी को आगे बढ़ाने का जरिया बनें। फिल्म कारोबार के मामले में भी इस दशक में नए प्रतिमान देखने को मिले। इसी समय में 100 करोड़ी क्लब का जन्म हुआ और अब तो 200 करोड़ रुपये की कमाई भी नया मापदंड बन चला है।

मेहता कहते हैं, 'दूसरे बैनरों, ब्रांडों और लोगों के साथ गठजोड़ करना मौजूदा दौर में काफी हद तक आम हो चला है। इसकी वजह यह है कि हर कोई अच्छी गुणवत्ता वाला काम करने का इरादा लेकर चल रहा है।' इसका मतलब है कि हर तरह के अभिनेताओं के लिए काम मौजूद है। चाहे वह मस्तमौला किरदार निभाने वाले रनबीर कपूर हों या उड़ता पंजाब और हाईवे में अलग किस्म की भूमिकाएं करने वाली आलिया भट्ट हों, ऐसा लगता है कि नए दौर के कलाकारों के पास अलग-अलग मिजाज की फिल्में चुनने का विकल्प मौजूद है।

इसका यह भी मतलब है कि इरफान खान और नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे स्थापित कलाकारों के साथ ही राजकुमार राव, आयुष्मान खुराना, राधिका आप्टे और ऋचा चड्ढा जैसे नए कलाकारों के लिए भी काम के तमाम अवसर उपलब्ध हैं। इस श्रेणी के लगभग हरेक अभिनेता-अभिनेत्री को पहले के दौर में चरित्र भूमिकाओं या 'समानांतर सिनेमा' में कैद कर दिया जाता था, लेकिन आज ये फिल्मों में मुख्य किरदार निभा रहे हैं। विशेषज्ञ एकमत हैं कि नई प्रतिभाओं के सामने आने और उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलने को बेहतरी की तरफ उठाया गया कदम माना जा सकता है।

पिछले दशक में अर्थव्यवस्था को मंदी के दौर से भी गुजरना पड़ा। फिल्म कारोबार के जानकारों का कहना है कि फिल्म उद्योग भी मंदी से अछूता नहीं रहा था। पुरी कहते हैं, 'मंदी के दौर में कोई भी व्यक्ति अपनी जरूरतों पर खर्च करता है, मनोरंजन उसकी प्राथमिकता में नहीं होता है। लेकिन ऐसा देखा गया है कि बढिय़ा विषय पर बनी अच्छी फिल्म को दर्शक मिल ही जाते हैं।

मेहता कहते हैं, 'मेरी नजर में मंदी का समय हरेक उद्योग के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। मंदी के दुष्प्रभाव फिल्म निर्माण, वितरण और मार्केटिंग से जुड़ी सभी गतिविधियों की लागत बढ़ा देते हैं। लेकिन अगर अच्छी तरह तैयारी की गई हो तो उद्योग इस मुश्किल दौर से भी बाहर निकल सकता है। मसलन, आप अच्छे विषय पर कम बजट वाली फिल्म बना सकते हैं। जहां तक दर्शकों का सवाल है तो उन्हें भी अच्छी फिल्म का इंतजार रहता है।'

मनोरंजन पर होने वाले खर्च में कटौती के बावजूद भारतीय फिल्म उद्योग को संभालने में क्षेत्रीय फिल्मों और हॉलीवुड फिल्मों को मिली कामयाबी संभवत: मददगार रही थी। फिल्मों के प्रदर्शन की जगहों का विस्तार होने से क्षेत्रीय फिल्मों को भी सिनेमाघरों में प्रदर्शित कर पाना थोड़ा आसान हो गया है। सिनेमाघरों के डिजिटल होने का मतलब है कि किसी फिल्म के प्रदर्शन में वितरकों, निर्माताओं और थिएटर मालिकों को कम निवेश करना पड़ रहा है। इसके अलावा क्षेत्रीय फिल्में नए मिजाज वाली कहानियों को पेश करने में सफल रही हैं।

पुरी कहते हैं, 'प्रयोगधर्मी सिनेमा को दर्शक अब पसंद करने लगे हैं। हॉलीवुड के अलावा क्षेत्रीय फिल्मों का स्थानीय भाषाओं में डब संस्करण भी दर्शक खूब पसंद कर रहे हैं। बड़े फिल्म स्टूडियो भी छोटे बजट की फिल्मों, क्षेत्रीय फिल्मों और नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहित कर रहे हैं। इन फिल्मों के वितरण एवं मार्केटिंग में बड़े स्टूडियो की भागीदारी ने उनका दायरा बढ़ा दिया है। क्षेत्रीय फिल्मों की कामयाबी में उनकी बढिय़ा कहानी का प्रमुख योगदान रहा है। अगर कंटेंट अच्छा नहीं है तो बड़े सितारों से सजी फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाएगी। लेकिन शानदार कहानी और बेहतर प्रस्तुति वाली छोटे बजट की फिल्म अनजान चेहरों के बावजूद दर्शकों का प्यार और समर्थन पा सकती है। पिछले दो-तीन वर्षों में हम बॉक्स ऑफिस पर लगातार ऐसा देख रहे हैं।'

दक्षिण भारतीय फिल्मों के हिंदी रीमेक का जो सिलसिला वांटेड, भूलभूलैया, साथिया और नायक जैसी फिल्मों के साथ शुरू हुआ था, वह अब चलन बन गया है। हरेक साल कई ऐसी हिंदी फिल्में बनती हैं जो क्षेत्रीय फिल्मों पर आधारित होती हैं। लेकिन अब बॉलीवुड रीमेक के लिए चार दक्षिणी राज्यों तक ही सीमित नहीं रह गया है। बांग्ला और मराठी फिल्मों के हिंदी रीमेक भी आ रहे हैं। यह नए कारोबारी मॉडल की शुरुआत का इशारा करता है।

मेहता का कहना है कि शानदार कहानी एवं प्रस्तुति के बलबूते क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में खूब फल-फूल रही हैं। क्षेत्रीय फिल्मों की कहानियों को हिंदी-भाषी दर्शकों के लिहाज से दोबारा बनाया जा रहा है। एक बार फिर कई तरह के नए गठजोड़ देखे जा रहे हैं, विभिन्न प्रोडक्शन हाउस कलात्मक एवं वाणिज्यिक रूप से बढि़या विषय सामग्री तैयार करने के लिए हाथ मिला रहे हैं। दूसरी तरफ हॉलीवुड को भारत में अंग्रेजी का प्रसार होने से मदद मिली है। इसके अलावा ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म और वीडियो स्ट्रीमिंग सेवाओं ने भी हॉलीवुड को विस्तार दिया है। हॉलीवुड में सफल फिल्मों का फ्रैंचाइजी बनाने से भी स्टूडियो को मार्केटिंग में सहूलियत होती है।

बिजनेस स्टैंडर्ड रुपहले पर्दे की बदली चाल और ढालसोनी पिक्चर्स एंटरटेनमेंट इंडिया के प्रबंध निदेशक विवेक कृष्णानी कहते हैं कि फ्रैंचाइजी फिल्में दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने में सफल होती हैं वहीं स्थानीय पहलुओं को तरजीह देने से भी दर्शक जुटाने में मदद मिलती है। वह कहते हैं, 'हमारे लिए पिछला साल काफी अच्छा रहा। हॉलीवुड की पांच सबसे सफल फिल्मों में से दो हमारे स्टूडियो की ही थीं। स्पाइडरमैन: होमकमिंग और जुमान्जी की डबिंग में हमने भारतीय भाषाओं के खास मिजाज और जुबान को तरजीह दी। इस तरह वे फिल्में दर्शकों को विदेशी नहीं लगती हैं, एक हद तक दर्शक उनसे जुड़ाव महसूस करने लगते हैं। जुमांजी के प्रदर्शन के तीसरे हफ्ते में हमें 25 नए सिनेमाघरों में इसे प्रदर्शित करना पड़ा।'

स्थानीयकरण की ताकत 2016 में पूरी शिद्दत से देखने को मिली थी, जब डिज्नी की फिल्म जंगल बुक ने कई भारतीय फिल्मों को मात देते हुए बॉक्स ऑफिस पर 188 करोड़ रुपये की कमाई कर ली थी। 100 करोड़ रुपये से अधिक तो उसके हिंदी संस्करण ने ही कमा लिए। पिछले वर्ष स्थानीयकरण का असर और भी बढ़ा। फिल्म स्टूडियो ने भारतीय दर्शकों की पसंद और मिजाज को ध्यान में रखते हुए फिल्मों के डब संस्करण को अधिक स्मार्ट बनाने की कोशिश की। सोनी ने स्पाइडरमैन का ट्रेलर 10 भाषाओं में जारी कर इसकी झलक  दिखा दी थी।

भारत के कुल बॉक्स ऑफिस कारोबार में हॉलीवुड फिल्मों की हिस्सेदारी 2017 में बढ़ते हुए 13 फीसदी पर जा पहुंची। फिल्म कारोबार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि एक दशक पहले तक भारतीय बाजार में हॉलीवुड को केवल 5 फीसदी कमाई मिलती थी। दर्शकों की पसंद-नापसंद और भाषा को ध्यान में रखते हुए हॉलीवुड फिल्मों को स्थानीय कलेवर में ढाले जाने से भारतीय बॉक्स ऑफिस में हॉलीवुड की हिस्सेदारी बढ़ी है। बॉलीवुड फिल्मों के प्रदर्शन में आई गिरावट का भी हॉलीवुड का प्रदर्शन बेहतर होने में थोड़ा योगदान रहा है।

मेहता का मानना है कि आने वाले समय में वीडियो स्ट्रीमिंग और ओटीटी प्लेटफॉर्म भारतीय फिल्म उद्योग के विकास में अहम भूमिका निभाएंगे। मेहता कहते हैं, 'स्ट्रीमिंग सेवाओं के आगाज ने वैश्विक सिनेमा और क्षेत्रीय सिनेमा में नई जान फूंक दी है। आज के दर्शक कहानी और विषय को लेकर प्रयोग करने के पक्षधर हैं और उनकी दिली चाहत होती है कि उन्हें गुणवत्तापरक फिल्में देखने को मिलें। स्ट्रीमिंग सेवाएं भविष्य में क्रॉस-प्लेटफॉर्म गठजोड़ के नए मौके पैदा करेंगी। बढ़‍िया कंटेंट वाली शॉर्ट फिल्मों की अहमियत बढ़ेगी क्योंकि दर्शक भी छोटी अवधि भी फिल्में देखना चाहते हैं जिन्हें चलते-फिरते देखा जा सके। इसके चलते भविष्य में बनने वाली फिल्मों का स्वरूप और कारोबार का ढांचा भी बदल सकता है।'

पिछले दो वर्षों में भारतीय मनोरंजन परिदृश्य ओटीटी में सक्रिय कंपनियों की बढ़ोतरी से ढका रहा है। डिट्टो जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म की शुरुआत 2015 से पहले ही हो गई थी। उसी साल फरवरी में हॉटस्टार ने दस्तक दी और फिर 2016 में नेटफ्लिक्स और एमेजॉन के आने से पूरी परिदृश्य ही बदल गया। आज के समय करीब 30 ओटीटी प्लेटफॉर्म किसी न किसी तरह का ऑनलाइन मनोरंजन मुहैया करा रहे हैं। वर्ष 2017 में तो केवल बांग्ला भाषी मनोरंजन पर केंद्रित प्लेटफॉर्म होइचोय शुरू किया गया था।

वैसे ओटीटी कारोबार को चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा है। खासकर प्लेटफॉर्म के जरिये होने वाली कमाई ओटीटी कंपनियों के लिए बड़ी चिंता साबित हुई है। रेडियो, टीवी और प्रिंट जैसे विज्ञापन केंद्रित संचार माध्यमों की तुलना में ओटीटी प्लेटफॉर्म को विज्ञापन राजस्व जुटाने में समस्या हो रही है। दरअसल डिजिटल विज्ञापन की दरें परंपरागत मीडिया की विज्ञापन दरों की तुलना में काफी कम हैं जिसके चलते की राजस्व मॉडल सामने आए हैं। कुछ प्लेटफॉर्म पूरी तरह विज्ञापन-आधारित हैं तो नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम जैसे प्लेटफॉर्म पूरी तरह पेड हैं। कुछ प्लेटफॉर्म फ्रीमियम मॉडल पर काम कर रहे हैं जिसमें कुछ सामग्री तो विज्ञापनों के साथ मुफ्त में मिलती है जबकि विज्ञापन-रहित कुछ सामग्री देखने के लिए दर्शक को भुगतान करना होता है।

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