बिजनेस स्टैंडर्ड - उथलपुथल भरे 10 साल
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उथलपुथल भरे 10 साल

ए के भट्टाचार्य /  03 01, 2018

आवरण कथा

भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार एक दशक में बहुत बढ़ा है, लेकिन उसकी चुनौतियां भी उतनी ही बढ़ गई हैं। बुनियादी ढांचा, सेवा क्षेत्र, प्रौद्योगिकी में प्रगति उजले पक्ष हैं, लेकिन आय में असमानता, ऊर्जा क्षेत्र, राज्यों की वित्तीय ढिलाई चुनौती उत्पन्न कर रही है

बिजनेस स्टैंडर्ड उथलपुथल भरे 10 साल

क दशक बहुत लंबा अरसा होता है और इसमें बहुत कुछ बदल सकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था भी इसकी अपवाद नहीं है। पिछले 10 वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार तीन गुना से भी अधिक हो गया है। सन 2007-08 में देश की अर्थव्यवस्था का आकार 50 लाख करोड़ रुपये था और कहा जा रहा है कि 2017-18 तक यह 167 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगी। ऐसी बहुत कम अर्थव्यवस्थाएं हैं, जो 13 फीसदी की असमायोजित सालाना वृद्धि दर से बढ़ी हों। 10 वर्ष पहले भारत दुनिया में 12वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश था। आज वह सातवें पायदान पर खड़ा है। भारत की प्रति व्यक्ति आय अब भी कम है और बढ़ा-चढ़ाकर बोलें तो भी उसे अल्प-मध्य आय वाला देश ही कहा जा सकता है। पिछले 10 वर्ष में 12 फीसदी की समेकित वृद्धि दर के साथ भारत की प्रति व्यक्ति आय वर्ष 2007-08 की 35,825 रुपये से बढ़कर 2017-18 में 1,12,764 रुपये हो गई।

देश में गरीबों की तादाद में कमी आई है लेकिन यह इतनी ज्यादा नहीं है कि अधिकतर भारतीय पर्यवेक्षक अथवा राजनेता इससे संतुष्ट हो सकें। वैश्विक आर्थिक महाशक्तियों के बीच स्थान की आकांक्षा रखने वाले किसी भी अन्य देश के साथ भारत की प्रति व्यक्ति आय की तुलना करें तो पता चलता है कि भारत को अभी लंबा सफर तय करना है।

अगर देश के बीते 10 साल के सफर को आर्थिक समानता के नजरिये से देखा जाए तो तस्वीर और भी बुरी नजर आती है। बीते एक दशक में आय की असमानता का स्तर बहुत बिगड़ गया है। जाने माने अर्थशास्त्रियों लुकास चांसेल और थॉमस पिकेटी द्वारा हाल ही में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक आज देश में सर्वाधिक आय वाले एक फीसदी लोगों का देश की कुल आय के 22 फीसदी हिस्से पर कब्जा है। आय की असमानता का आकलन करने वाले जीनी अनुपात का स्तर भी बीते कुछ वर्ष में गिरा है। भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनावट भी इसका उदाहरण है। देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी बीते 10 वर्ष में बहुत कम घटी है। अब यह 17 फीसदी से घटकर 16 फीसदी रह गई है। लेकिन कृषि पर निर्भर लोगों की तादाद में आने वाली गिरावट इसके समतुल्य नहीं है। सन 2008 में देश की आबादी का करीब दो-तिहाई हिस्सा कृषि पर निर्भर था। आज यह हिस्सा घटकर केवल 55 फीसदी रह गया है।

कृषि की विकास दर सकल अर्थव्यवस्था की विकास दर से कम है। इससे कृषि पर निर्भर लोगों तथा अन्य लोगों के बीच आर्थिक असमानता बढ़ रही है। इसके अलावा आजीविका के प्राथमिक स्रोत के रूप में कृषि पर अत्यधिक निर्भरता के कारण कृषि में तकनीक का बहुत कम इस्तेमाल हो रहा है और उसका सीधा असर उत्पादकता पर पड़ रहा है। उसी कारण कृषि के क्षेत्र में निराशा पसरी हुई है और किसानों की आय बढ़ाने की मांग जोर पकड़ती जा रही है।

इसी अवधि में अर्थव्यवस्था में उद्योग जगत की हिस्सेदारी 27 फीसदी से बढ़कर 29 फीसदी हो गई। यह भी चिंता का विषय है। लेकिन बड़ी चिंता का विषय है अर्थव्यवस्था में विनिर्माण के योगदान में आया ठहराव। विनिर्माण अर्थव्यवस्था का अहम क्षेत्र है और इसमें तेज वृद्धि न केवल समावेशी वृद्धि के लिए जरूरी है बल्कि लाखों लोगों को रोजगार दिलाने के लिए भी यह आवश्यक है। हर वर्ष 1.2 करोड़ भारतीय कामगार तैयार होते हैं। अगर मजबूत और तेजी से विकसित होता विनिर्माण बाजार लोगों को रोजगार मुहैया नहीं करा सकता तो समावेशी वृद्धि का लक्ष्य पीछे रह जाएगा और कृषि क्षेत्र पर लोगों की निर्भरता भी बरकरार रहेगी। इससे आर्थिक वृद्धि में असमानता बढ़ेगी और शहरों तथा गांवों के बीच खाई पहले से चौड़ी हो जाएगी।

तकनीकी प्रगति और उद्योग जगत में इसे अपनाया जाना भी अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौती है। इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमता और स्वचालन के विस्फोट को आप चौथी औद्योगिक क्रांति भी कह सकते हैं। उसने भारतीय उद्योग जगत को अजीब दोराहे पर खड़ा कर दिया है। अगर वह नई तकनीक अपनाता है या चौथी औद्योगिक क्रांति को आत्मसात करता है तो उसे सस्ते श्रम का फायदा मिलना बंद हो जाएगा और वह रोजगार भी तैयार नहीं कर पाएगा। लेकिन तकनीक नहीं अपनाई तो देसी-विदेशी बाजार में चल रही प्रतिस्पर्धा में वह पिछड़ जाएगा। निश्चित रूप से इसका भी वृद्धि पर नकारात्मक असर होगा। देश की अर्थव्यवस्था के 10 साल के सफर को देखें तो आकार में बढ़ोतरी बेशक हुई है, लेकिन गुणवत्ता और संरचना चिंता की वजह बनी हुई हैं कई नई चुनौतियां पेश कर रही हैं।

सरकारी वित्त

अर्थव्यवस्था और सरकारी वित्त के बीच का रिश्ता हमेशा मजबूत रहा है। बीते 10 साल में जैसे-जैसे देश की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ा, वैसे-वैसे ही सरकार के वित्त में गुणात्मक और मात्रात्मक बदलाव भी आया। सरकारी व्यय में 12 फीसदी की समेकित सालाना वृद्धि हुई और यह 2007-08 के 7.13 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2017-18 में 22.18 लाख करोड़ रुपये हो गया।

परंतु इतनी तेज वृद्धि के लिए राजकोषीय अनुशासन की बलि देनी पड़ी। वर्ष 2000 के बाद से ही जीडीपी की तुलना में सरकार का राजकोषीय घाटा कम हो रहा था और यह लुढ़ककर 2.7 फीसदी रह गया था। परंतु सन 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट ने सरकार की वित्तीय स्थिति पर असर डाला और सरकार को मजबूर होकर ज्यादा खर्च करना पड़ा। इससे राजकोषीय घाटा बढऩे लगा और वर्ष 2009-10 में यह जीडीपी के 6.5 फीसदी तक जा पहुंचा। सरकार 2011-12 में राजकोषीय घाटे को घटाकर 4.8 फीसदी करने में कामयाब रही, लेकिन आर्थिक प्रोत्साहन दिए जाने के चक्कर में अगले वर्ष यह पुन: बढ़कर 5.8 फीसदी हो गया।

तब से अब तक हर वर्ष सरकार का राजकोषीय घाटा कम होता रहा है। 2012-13 में यह जीडीपी का 4.9 फीसदी था। 2013-14 में 4.4 फीसदी, 2014-15 में 4.1 फीसदी, 2015-16 में 3.9 फीसदी और 2016-17 में 3.5 फीसदी रहा। चालू वित्त वर्ष में भी यह 3.5 फीसदी पर ही बरकरार रहा।

अगर सरकार का राजकोषीय घाटा पिछले कुछ सालों से लगातार घट रहा है तो इसका श्रेय पिछले एक दशक में रही सरकारों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को भी मिलना चाहिए। तेल की कीमतें 2014 से 2017 तक बहुत कम रहीं और सरकारों को उस दौरान अपने वित्त को लेकर सख्ती बरतने का मौका मिल गया।

बीते कुछ वर्ष में अगर सरकार की वित्तीय स्थिति पर दबाव बना तो वह काफी हद तक नरेंद्र मोदी सरकार के विमुद्रीकरण के फैसले और देश के सबसे अहम कर सुधारों में से एक वस्तु एवं सेवा कर के लागू होने से हुआ। 8 नवंबर, 2016 को लागू नोटबंदी के कारण देश की 86 फीसदी प्रचलित मुद्रा बंद हो गई थी। नोटबंदी और जीएसटी दोनों ने अर्थव्यवस्था की गति को प्रभावित किया और आर्थिक वृद्धि पर बुरा असर डाला।

नोटबंदी का असर अब समाप्त हो रहा है लेकिन जीएसटी का प्रभाव अर्थव्यवस्था में अभी तक महसूस हो रहा है क्योंकि उसके क्रियान्वयन की दिक्कतें पूरी तरह दूर नहीं हो सकी हैं। उपभोक्ताओं, कारोबारियों, विनिर्माताओं और सेवा प्रदाताओं पर इसका प्रभाव पड़ रहा है। लेकिन आगे जाकर जीएसटी का असर सकारात्मक ही होगा और अप्रत्यक्ष कर की सहज व्यवस्था तथा अधिक करदाताओं के कारण सरकारी वित्त को भी फायदा होगा। देश में करदाताओं का दायरा कम होने की समस्या भी जीएसटी से हल होती दिख रही है। पहली बार जीडीपी में केंद्रीय कर का अनुपात 12 फीसदी के पार जा रहा है। यह बड़ी उपलब्धि होगी। यह अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने, कर दायरा बढ़ाने और आम लोगों तथा कारोबारियों के बीच कर अनुपालन बढ़ाने से जुड़े सरकारी प्रयासों का ही नतीजा है।

बिजनेस स्टैंडर्ड उथलपुथल भरे 10 सालबहरहाल वित्त के मामले में सरकार के सामने बड़ी चुनौती खजाने को मजबूत बनाना है। यह सच है कि केंद्र ने वर्ष 2021 तक राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3 फीसदी तक गिरा लाने का संकल्प किया है। उसने 2025 तक अपने कर्ज को भी जीडीपी के 40 फीसदी तक करने का लक्ष्य तय किया है। परंतु अतीत में सरकारें अपना घाटा कम करने में जिस तरह विफल रही हैं, उसे देखते हुए लगता नहीं कि यह हो पाएगा।

सरकार ने राजस्व घाटे का लक्ष्य तय करने की अवधारणा समाप्त करने की योजना बनाई है, जो अपने आप में चिंतित करने वाली बात है। राजस्व घाटे के लक्ष्य के बिना सरकार राजस्व व्यय के मोर्चे पर शिथिल पड़ सकती है और वह उसे ऐसे स्तर पर नहीं रख पाएगी, जहां बिना बाह्य पूंजीगत प्राप्तियों के सीधे राजस्व प्राप्तियों से ही उसकी भरपाई हो जाए। केंद्र सरकार राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के मोर्चे पर जो शिथिलता बरतेगी, उसका नुकसान यह है कि राज्य सरकारें भी अपव्ययी हो सकती हैं। पहले ही 29 राज्यों का साझा बजट केंद्र सरकार से बड़ा है। जिन राज्यों से राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी के 3 फीसदी के अंदर बनाए रखने की उम्मीद थी, उन्होंने घाटा बढ़ाना शुरू कर दिया है। अगर केंद्र और राज्य दोनों राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के अपने उल्लिखित लक्ष्य पर कायम नहीं रह पाते हैं तो इसका प्रभाव सही नहीं होगा। अर्थव्यवस्था के लिए यह बहुत नुकसानदेह साबित हो सकता है। इससे वृहद आर्थिक असंतुलन का खतरा तो है ही, इसका दबाव ब्याज दरों और कीमतों पर भी पड़ेगा।

बाहरी क्षेत्र

ऐसे वृहद आर्थिक असंतुलन और राजकोषीय अपव्यय से देश का बाह्य क्षेत्र भी नहीं बच सकेगा। बीते दशक में देश के निर्यात क्षेत्र का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है। निर्यात में कुछ वर्षों में हुई दो अंकों की वृद्धि को छोड़ दिया जाए तो वर्ष 2012-13 के बाद से निर्यात या तो कम हुआ है या फिर उसमें मामूली इजाफा हुआ है। कच्चे तेल की कीमतें भी देश के निर्यात प्रदर्शन में कमजोरी की वजह हैं। परंतु पारंपरिक रूप से मजबूत क्षेत्रों में भी भारत का निर्यात इस अवधि में कमजोर रहा है। व्यापार घाटा नियंत्रण में इसीलिए रहा क्योंकि कच्चे तेल की कमजोर कीमतों ने हमें बचाए रखा। अब जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं तो निर्यात पर भी दबाव बढ़ेगा।

अब तक देश का चालू खाते का घाटा नियंत्रण में रहा है। ऐसा विदेशों में रहने वाले भारतीयों द्वारा भेजे जाने वाले धन और सेवा निर्यात से होने वाली आय के चलते हुआ। इस कठिन वक्त में (याद कीजिए इस दौरान विश्व अर्थव्यवस्था तगड़े संकट से गुजरी। वर्ष 2008 के वित्तीय संकट के बाद वृद्धि दर बेहद कम रही) देश का भुगतान संतुलन इसलिए काबू में रहा क्योंकि देश के द्वितीयक पूंजी बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशक निवेश करते रहे। यह आवक स्थिर बनी रही और देश के भुगतान संतुलन को किसी तरह की परेशानी नहीं हुई। परंतु निरंतर चलते सुधार, भारतीय शेयर बाजार का लुभावनापन और मजबूत होती देसी अर्थव्यवस्था इसे प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों के अधिक अनुकूल बना रहे हैं। ये सब भी मौजूदा लाभ को बरकरार रखने में मददगार हैं। अगर निर्यात में इजाफा होता है और भारत बढ़े सीमा शुल्क के रूप में संरक्षणवाद से दूरी बरतता है तो देश के बाहरी क्षेत्र से कोई संकट उत्पन्न नहीं होगा।

बुनियादी ढांचा

यहां एक चेतावनी है। घरेलू अर्थव्यवस्था और बाहरी क्षेत्र दोनों काफी हद तक इस बात पर निर्भर हैं कि देश के बुनियादी ढांचे का प्रदर्शन कैसा रहता है। बिना बुनियादी क्षेत्र में मजबूत निवेश के और क्षमता सुधार के बिना देश की अर्थव्यवस्था की संभावनाएं बहुत बेहतर नहीं नजर आ रहीं। बीते 10 सालों के दौरान बुनियादी क्षेत्र का प्रदर्शन तो गड्डमड्ड रहा। आर्थिक क्षेत्र की बुनियादी सुविधाएं मसलन बिजली, सड़क, रेलवे, नौवहन और विमानन आदि में महत्त्वपूर्ण सुधार हुए। न केवल इनकी क्षमता बढ़ी बल्कि ये पहले के मुकाबले अधिक किफायती भी हुए। परंतु इनकी मांग इतनी तेजी से बढ़ रही है कि आपूर्ति पिछड़ जाती है।

इस प्रकार आंकड़ों में देखें तो देश का बुनियादी ढांचा बीते 10 सालों में अच्छी तरह बढ़ा है लेकिन जीवन की सुगमता या कारोबारी सुगमता की अपेक्षाओं पर वह खरा नहीं उतर सका। उसी अंतर को पाटना आगे चलकर चुनौती बनेगा। उस चुनौती से पार पा लिया गया तभी देश की अर्थव्यवस्था अपनी पूरी क्षमता से विकास कर सकेगी।

परंतु इतना ही पर्याप्त नहीं होगा। बुनियादी क्षेत्र की भौतिक कमियों को दूर करने के साथ-साथ सरकार को क्षमता निर्माण और कौशल विकास पर ध्यान देना होगा तथा सामाजिक बुनियादी ढांचे को भी मजबूत करना होगा। स्वास्थ्य, शिक्षा, जल और जलवायु परिवर्तन आदि ऐसे ही कुछ क्षेत्र हैं। स्वस्थ, शिक्षित और कुशल भारतीयों के बिना तथा साफ पानी और हवा के बिना देश के आर्थिक सुधार का सफर अधूरा ही रह जाएगा।

थोड़ी खुशी और थोड़े गम में फंसा रहा वित्तीय क्षेत्र

पिछले 10 वर्षों में वित्तीय बाजारों में कई बड़े बदलाव देखने को मिले। भारतीय शेयर बाजारों में तेजी से सुधार और विकास हुआ है। भारतीय खुदरा निवेशकों ने म्युचुअल फंड की मदद से देश के शेयर बाजार में जमकर भागीदारी की। सोने और अचल संपत्ति के मूल्य में आई गिरावट ने भी शेयर बाजार को अधिक आकर्षक बनाया है। परंतु भारतीय शेयर बाजार भी बीते एक दशक में वृद्धि, सुधारों और बेहतर नियमन के गवाह बने हैं। इस अवधि में किसी घोटाले का कोई झटका भी नहीं लगा।

लेकिन वित्तीय क्षेत्र की कहानी थोड़ी अलग रही। बैंकों का फंसा हुआ कर्ज, खासतौर पर सरकारी बैंकों का कर्ज ऐसे स्तर पर पहुंच गया कि बैंक ऋण देने की स्थिति में ही नहीं रह गए, जबकि यह उनका प्राथमिक काम है। विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे विवादास्पद कर्जदारों को जिस तरह की सुविधाएं प्रदान की गईं, उनके कारण पिछले कुछ वर्षों में एक के बाद एक घोटाले सामने आए। इनके चलते बैंकिंग की स्थिति में सुधार की संभावना और कम हो गई।

बैंकों के फंसे हुए कर्ज की समस्या का एक और पहलू है भारी भरकम कर्ज वाला कंपनी जगत। इसे भारतीय अर्थव्यवस्था की दोहरी बैलेंस शीट की समस्या कहा जाता है। देश की अर्थव्यवस्था में निवेश की दर में कमी आने के साथ ही वृद्धि की संभावनाएं सीमित होने लगीं।

दशक के अंतिम वर्षों में इस व्यवस्था में साफ-सफाई के जो प्रयास हुए हैं, वे उल्लेखनीय हैं। संकटग्रस्त परिसंपत्तियों के निस्तारण के लिए बने कानूनों में संशोधन से भी मदद मिली है। ऋणग्रस्त कंपनियों के मालिकाना हक में बदलाव की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया गया है। बैंकों का नियमन दुरुस्त होगा और ऋणग्रस्त कंपनियों के प्रवर्तकों को कीमत अपनी कंपनी के रूप में चुकानी होगी। कहने का मतलब आने वाले दिनों में देश में कम दबाव वाले बैंकों के साथ एक स्वस्थ कारोबारी जगत नजर आ सकता है। बीते 10 साल में वित्तीय क्षेत्र में उठाया गया एक अन्य अहम कदम है मुद्रास्फीति को निशाना बनाने की व्यवस्था और एक ज्यादा स्वतंत्र तथा पारदर्शी मौद्रिक नीति समीक्षा प्रक्रिया।

अब रिजर्व बैंक पर सांविधिक दायित्व है कि वह सुनिश्चित करे कि देश की खुदरा महंगाई 4 फीसदी के 2 फीसदी ऊपर या नीचे के दायरे में रहे। दूसरे शब्दों में कहें तो केंद्रीय बैंक अब मुद्रास्फीति को 2 फीसदी से 6 फीसदी के दायरे रखेगा। अगर इससे कोई भी विचलन होता है तो उसे संसद के समक्ष स्पष्ट करना होगा। हालांकि विशेषज्ञों ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं लेकिन केंद्रीय बैंक द्वारा मुद्रास्फीति को लक्षित करना हाल के दिनों में अर्थनीति से जुड़ी एक बड़ी घटना है।

इसी तरह मौद्रिक नीति समीक्षा का काम अब आरबीआई गवर्नर की अध्यक्षता वाली एक समिति करती है। गवर्नर के अलावा समिति में आरबीआई के दो प्रतिनिधि और तीन स्वतंत्र प्रतिनिधि होते हैं जिनकी नियुक्ति एक सरकारी समिति द्वारा की जाती है। मौद्रिक नीति समिति 2016 में अस्तित्व में आई। यह समिति मौद्रिक नीति से जुड़े कदमों पर विचार करती है और अंतिम निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है। यह देश के वित्तीय क्षेत्र में बीते एक दशक में हुआ बड़ा सुधार है।

बिजनेस स्टैंडर्ड उथलपुथल भरे 10 साल
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