बिजनेस स्टैंडर्ड - सरपट दौड़ते पहियों में कौंधेगी बिजली
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सरपट दौड़ते पहियों में कौंधेगी बिजली

अजय मोदी /  03 01, 2018

वाहन

देसी वाहन उद्योग पूरे शबाब पर है, लेकिन बदलती नीतियों के मुताबिक
ढलना औैर इलेक्ट्रिक वाहन बनाना है चुनौती

बिजनेस स्टैंडर्ड सरपट दौड़ते पहियों में कौंधेगी बिजली

देसी वाहन उद्योग पिछले एक दशक में तमाम तरह के उतार-चढ़ाव से गुजरकर पहले से अधिक मजबूत हुआ है। यात्री वाहनों -कार, वैन और यूटिलिटी वाहनों के मामले में यह दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा बाजार है। स्कूटरों की बढ़ती पैठ के साथ यह दोपहिया वाहनों का सबसे बड़ा बाजार बन गया है। अगर इस उद्योग का पिछले एक दशक का सफर देखें तो काफी कुछ दिलचस्प सामने आता है।

हालिया घटनाओं से शुरुआत करते हैं। 22 साल से भारतीय बाजार में अपनी उपस्थिति बढ़ाने की कोशिश कर रही अमेरिकी वाहन कंपनी जनरल मोटर्स ने आखिरकार पिछले साल यहां से अपना कामकाज समेटने का फैसला कर लिया। भारत में हर साल करीब 30 लाख कार बेची जाती हैं, लेकिन जनरल मोटर्स इसमें 1 फीसदी हिस्सा ही हासिल कर पाई। हालांकि कंपनी ने कहा कि वह पुणे के करीब तलेगांव में अपना कारखाना चलाती रहेगी और उसका इस्तेमाल निर्यात के लिए किया जाएगा। गुजरात के हलोल में अपना कारखाना उसने चीन की बड़ी वाहन कंपनी एसएआईसी को बेच दिया। चीन की कंपनी अब एमजी मोटर ब्रांड लेकर भारत में आ रही है। यह बात किसी को भी अजीब लग सकती है कि जिस साल जनरल मोटर्स ने भारत में अपना कारोबार समेटने का फैसला किया, उसी साल दक्षिण कोरिया की किया और फ्रांस की प्यूजो ने यहां कदम रखने का ऐलान कर डाला। किया 7,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश कर आंध्र प्रदेश में अपना कारखाना लगा रही है।

पिछले एक दशक की बात करें तो फ्रांस की प्रमुख वाहन निर्माता कंपनी रेनो की भारत में आमद सबसे अहम घटनाक्रम रही। रेनो ने अपनी वैश्विक साझेदार और जापान की दिग्गज कंपनी निसान के साथ मिलकर 2010 में चेन्नई में कारखाना खोला। निसान के माइक्रा और टरेनो जैसे मॉडल बिकते तो हैं, लेकिन भारतीय बाजार में अभी तक इस कंपनी की छाप नहीं पड़ी है। मगर रेनो ने बेहद कम अरसे में ही आम आदमी की जुबान पर अपना नाम दर्ज करा दिया है। उसकी शहरी मिजाज की एसयूवी डस्टर ने सबसे पहले बाजार में हलचल मचाई थी और छोटी कार क्विड ने तो तहलका मचा दिया। 

एसयूवी जैसी शक्लोसूरत की क्विड 2015 में उतारी गई थी और जल्द ही देसी बाजार में सबसे ज्यादा बिकने वाली 10 कारों की फेहरिस्त में उसने अपना नाम दर्ज करा लिया। क्विड इतनी लोकप्रिय रही कि उसने दिग्गजों को भी अपनी रणनीति पर दोबाराा विचार करने के लिए मजबूर कर दिया। क्विड की तेज दौड़ का ही नतीजा है कि सबसे बड़ी देसी कार कंपनी मारुति सुजूकी भी एसयूवी शैली की छोटी कार ला रही है। यह कार फरवरी में हुए ऑटो एक्सपो में दिखाई भी गई।

बिजनेस स्टैंडर्ड सरपट दौड़ते पहियों में कौंधेगी बिजलीपिछले दशक के दौरान भारतीय कार बाजार में ग्राहकों के मिजाज और पसंद में भी बदलाव आया है। भारत अब छोटी कारों का बाजार नहीं रह गया है, जहां अधिकांश खरीदार छोटी और सस्ती कारों से खुश हों। ज्यादातर खरीदार अब कार पर 5 लाख रुपये खर्च करने को तैयार हैं। हाल में मारुति सूजुकी बलेनो, हुंडई आई20 और होंडा जैज के प्रति खरीदारों के बढ़ते आकर्षण ने यह बात साबित भी की है। मारुति ब्रेजा और हुंडई क्रेटा जैसे मॉडलों की सफलता से यह बात सामने आई है कि लोगों के बीच स्पोट्र्स यूटिलिटी वाहनों (एसयूवी) की लोकप्रियता बढ़ रही है। किसी जमाने में एसयूवी श्रेणी में महिंद्रा ऐंड महिंद्रा और टाटा मोटर्स का दबदबा था लेकिन अब लगभग हर कंपनी इसमें कूद गई है। यात्री वाहन बाजार में एसयूवी की हिस्सेदारी 20 फीसदी पहुंच चुकी है, जबकि कुछ साल पहले यह 10 फीसदी से भी कम थी।

पिछले एक दशक में कंपनियों की स्थिति में भी काफी बदलाव आया। टाटा मोटर्स के हाथ से देश की दूसरी सबसे बड़ी कार कंपनी का स्थान छिन गया और इस पर कोरियाई कंपनी हुंडई मोटर्स काबिज हो गई। मानेसर कारखाने में हिंसा के कारण 2013-14 में मारुति सूजुकी की बाजार हिस्सेदारी घटी, लेकिन बाद में उसने एक बार फिर अपना परचम लहरा दिया। दिलचस्प है कि यात्री वाहन बाजार में कंपनी की अब 50 फीसदी हिस्सेदारी है, जबकि बाकी 50 फीसदी बाजार के लिए दर्जन भर से अधिक कंपनियां होड़ कर रही हैं। भारत में मारुति के अलावा हुंडई की हिस्सेदारी ही दो अंकों में (करीब 16 फीसदी) है। बाकी सभी कंपनियों की हिस्सेदारी केवल एक ही अंक में है।

खरीदारों की बढ़ती आय और बदलती पसंद के कारण पिछले कुछ वर्षों में वॉल्वो, जेएलआर और लेक्सस जैसी लक्जरी कार निर्माता कंपनियों ने भारत में प्रवेश किया है। मर्सिडीज बेंज, बीएमडब्ल्यू और ऑडी पहले ही भारत में आ चुकी थीं। इस दशक में दिल्ली जैसे शहरों में डीजल वाहनों के खिलाफ नियामकीय कार्रवाई भी हुई। डीजल के दाम को बाजार के हवाले करने से उसकी कीमत बढ़ी, जिससे डीजल कारों में लोगों की दिलचस्पी कम हो गई। बिक्री में डीजल कारों की हिस्सेदारी अब 25 फीसदी से भी कम रह गई है, जबकि कुछ साल पहले यह 50 फीसदी से अधिक थी। वाहनों से निकलने वाले धुएं के पर्यावरण पर प्रभाव के बारे में भी लोग जागरूक हुए हैं। इसीलिए बीएस-3 और बीएस-4 वाहनों के लिए उत्सर्जन मानक सख्त बनाए गए। सरकार ने बीएस-5 के बजाय 2020 से सीधे बीएस-6 मानक लागू करने का फैसला भी किया है।

सरकार ने साथ वाहन कंपनियों को जल्द से जल्द इलेक्ट्रिक वाहन निर्माण की ओर बढऩे को कहा है। उसने 2030 तक देश को पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहन बाजार बनाने का संकेत दिया है। सरकार की मंशा भांपकर तमाम कंपनियां इलेक्ट्रिक वाहन बनाने की योजना पर काम भी करने लगी हैं। इनमें मारुति सूजुकी, हुंडई और टोयोटा शामिल हैं। महिंद्रा ऐंड महिंद्रा और टाटा मोटर्स कुछ इलेक्ट्रिक वाहन उतार भी चुकी हैं। बस बनाने वाली कंपनियां भी इलेक्ट्रिक बसें उतारने की तैयारी कर रही हैं।

इस दशक में वाहनों की मार्केटिंग में डिजिटल प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल बढ़ा है। अब ज्यादा से ज्यादा खरीदार वाहन खरीदने से पहले ऑनलाइन छानबीन करते हैं और कई तो वहीं बुकिंग भी करा देते हैं। कारदेखो और कारवाले जैसे प्लेटफॉर्म और कई ऑनलाइन पोर्टल आने से खरीदार गाडिय़ों की कीमतों और खूबियों के बारे में ऑनलाइन छानबीन कर रहे हैं। कंपनियों ने भी ऑनलाइन माध्यम की अहमियत को समझा है और कुछ ने तो खरीदारों को कंपनी के पोर्टल या ऐप से बुकिंग की सुविधा भी दे दी है। अब कारों की सर्विस बुक कराने के लिए भी इस माध्यम का इस्तेमाल किया जा रहा है। एमेजॉन, पेटीएम और ड्रूम जैसे प्लेटफॉर्म ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा दे रहे हैं। अब आप कलपुर्जे और एक्सेसरीज ऑनलाइन खरीद सकते हैं और घर पर ही इन्हें मंगा सकते हैं। क्विकर और कारट्रेड जैसे प्लेटफॉर्म से पुरानी कारों की खरीदफरोख्त भी ऑनलाइन होती जा रही है। ओला और उबर जैसे कैब एग्रीगेटरों ने लोगों की आवाजाही का तरीका बदल दिया है। ये कंपनियां कारों की बड़ी खरीदार बनकर भी उभरी हैं।

वाहनों में सुरक्षा के मामले में भी पिछले एक दशक में काफी प्रगति हुई। बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं को देखते हुए अधिकतर कारों में अब एयरबैग जैसे सुरक्षा के इंतजाम किए जा रहे हैं। टोयोटा जैसी कंपनियां पिछले दो साल से एयरबैग के बगैर कोई कार नहीं बेच रही हैं। मारुति ने ऑल्टो और वैगन आर जैसी शुरुआती स्तर की कारों के लिए एयरबैग को वैकल्पिक बनाया है। सरकार ने भी सुरक्षा संबंधी नियमों को सख्त बनाया है। बाजार में आने वाली हरेक नई कार के लिए एयरबैग अनिवार्य बना दिया गया है। कैलेंडर वर्ष 2019 की अंतिम तिमाही से सभी मौजूदा मॉडलों को एयरबैग के साथ बनाया जाएगा। वाहन निर्माता कंपनियां यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही हैं कि एयरबैग की लागत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी न हो।

हाल के वर्षों में भारत से कारों के निर्यात में भी तेजी आई है और 100 से भी ज्यादा देशों को इनका निर्यात किया जा रहा है। भारत हर साल करीब 8 लाख कारें निर्यात करता है। अमेरिकी कार कंपनी फोर्ड सबसे बड़ी निर्यातक है और उसके बाद हुंडई तथा मारुति का नंबर है। निर्यात से कंपनियों को क्षमता का उपयोग बढ़ाने में मदद मिली है क्योंकि देश में बिक्री मनचाहे तरीके से नहीं बढ़ी है। निर्यात पर ध्यान केंद्रित करने वाली कंपनियों में फोर्ड, निसान और फोक्सवैगन शामिल हैं।

बिजनेस स्टैंडर्ड सरपट दौड़ते पहियों में कौंधेगी बिजलीपिछले एक दशक में दोपहिया बाजार में भी बहुत कुछ बदला है, जिससे भारत दुनिया का सबसे बड़ा दोपहिया बाजार बन गया है। हीरो ने 2010 में जापान की कंपनी होंडा के साथ 26 साल पुरानी साझेदारी खत्म की, जिससे हीरो होंडा ब्रांड का पटाक्षेप हो गया। हीरो अब हीरो मोटोकॉर्प बन गई है और अपनी मोटरसाइकलों के दम पर घरेलू बाजार में सबसे बड़ी दोपहिया कंपनी बनी हुई है। उसकी पुरानी साझेदार होंडा2व्हीलर्स का लगभग 2 करोड़ वाहन सालाना के इस बाजार में दूसरा स्थान है। शहरों में आवाजाही के लिए स्कूटरों को बहुत पसंद किया जा रहा है और उस बाजार में होंडा ही अव्वल नंबर है। इस बाजार में उसकी आधे से अधिक हिस्सेदारी है। टीवीएस ने भी इस बाजार का अच्छा खासा हिस्सा कब्जा लिया है।

देश में बिकने वाले कुल दोपहिया वाहनों में स्कूटर की हिस्सेदारी करीब एक तिहाई है। होंडा, टीवीएस और यामाहा जैसी कंपनियों की बिक्री में मोटरसाइकल से ज्यादा स्कूटर की हिस्सेदारी है। बड़ी संख्या में महिलाएं अब स्कूटर का इस्तेमाल करती हैं। अलबत्ता कभी स्कूटर बाजार में दबदबा रखने वाली बजाज ऑटो ने अब तक ऑटोमैटिक स्कूटर बाजार से दूरी बना रखी है। पिछले एक दशक में हार्ली डेविडसन, ट्रायंफ और डुकाती जैसी दिग्गज अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने प्रवेश किया है। ये कंपनियां महंगी बाइक बनाती हैं। लेकिन भारत में उनकी बिक्री अभी बहुत कम है।

बुलेट बनाने वाली कंपनी रॉयल एनफील्ड की किस्मत ने भी इस दशक में पलटा खाया और उसने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई। एक वक्त था, जब उसे अपनी मोटरसाइकलों पर छूट देनी पड़ रही थी, लेकिन अब उसके कई मॉडलों के लिए ग्राहकों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। कंपनी ने अपनी क्षमता बढ़ाई है और देश में दोपहिया वाहन कंपनियों में सबसे ज्यादा मुनाफा वही कमा रही है। रॉयल एनफील्ड की सफलता ने बजाज ऑटो और हीरो मोटोकॉर्प जैसी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों का ध्यान भी इस मोटरसाइकल बाजार की ओर खींचा है।

बिजनेस स्टैंडर्ड सरपट दौड़ते पहियों में कौंधेगी बिजली
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