बिजनेस स्टैंडर्ड - रिजर्व बैंक गवर्नर के बयान पर चंद प्रश्न
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रिजर्व बैंक गवर्नर के बयान पर चंद प्रश्न

देवाशिष बसु /  March 22, 2018

आरबीआई ने सूचना के अधिकार को लेकर अदालत की जो अवमानना की है उसका मुख्य लाभ सरकारी बैंकों को मिलेगा। जबकि आरबीआई का दावा रहा है कि उन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं। बता रहे हैं देवाशिष बसु 

 
आमतौर पर चुपचाप रहने वाले भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर ऊर्जित पटेल ने गत सप्ताह अपनी चुप्पी तोड़ी। यह चुप्पी उस समय टूटी जब सरकारी बैंकों में  धोखाधड़ी के मामले में आरबीआई की ओर अंगुली उठने लगी। उन्होंने कहा कि सरकारी बैंकों के नियमन को लेकर केंद्रीय बैंक के अधिकार निजी बैंकों के नियमन की तुलना में सीमित हैं। पटेल के भाषण में कुछ और अहम तथा महत्त्वपूर्ण तथ्य शामिल थे परंतु उनकी यह दलील चकित करने वाली थी कि आरबीआई के पास सरकारी बैंकों के नियमन की शक्ति नहीं है। 
 
जाहिर है यह सुर्खियों में रही। जिन लोगों को बैंकों की आरबीआई को होने वाली रिपोर्टिंग की पूरी जानकारी है उन्हें उसकी शक्तियों के बारे में अच्छी तरह पता है।  गर्वनर पटेल की तीन प्रमुख दलील हैं। पहली, सरकारी बैंकों का नियमन भारत सरकार द्वारा तीन अधिनियमों के अधीन होता है। दूसरा, सरकारी बैंकों के कॉर्पोरेट प्रशासन पर आरबीआई की शक्तियां पूरी तरह समाप्त हैं और तीसरा, आरबीआई सरकारी बैंकों के निदेशकों को नहीं हटा सकता है और न ही वह उनके प्रबंधन में बदलाव कर सकता है। एक दिन के भीतर वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने उन पर पलटवार किया और कहा कि कुछ विशिष्टï ऋण अथवा बैंकों के अन्य जोखिम पर केवल आरबीआई का ही अधिकार है। आरबीआई ही सरकारी बैंकों ऋण नीतियों तथा अन्य व्यवहार की सालाना समीक्षा करता है।
 
इस सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप के कुछ ही दिन बाद मेरी मुलाकात एक सेवानिवृत्त बैंक चेयरमैन से हुई। उन्होंने मुझसे कहा, 'हकीकत में आरबीआई के पास बहुत अधिक शक्तियां हैं। यह कहना सही नहीं है कि आरबीआई के पास सरकारी बैंकों पर कोई अधिकार ही नहीं है। अगर आरबीआई किसी बैंक चेयरमैन को बुलाकर प्रभार दूसरे को सौंपने को कहता है तो उसे ऐसा करना होगा। कई मामलों में आरबीआई ने मामला वित्त मंत्रालय के हवाले करके बैंक अधिकारियों को हटवाया भी है।' इस पूर्व बैंक चेयरमैन के पास इस बात का प्रमाण था कि कैसे आरबीआई के एक कार्यकारी निदेशक ने (जो गवर्नर और डिप्टी गवर्नर से नीचे थे) एक राजनीतिक संपर्क वाले बैंक चेयरमैन एम गोपालकृष्णन को आड़े हाथों लिया था। गोपालकृष्णन उस वक्त इंडियन बैंक के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक थे। कार्यकारी निदेशक ने उनकी गड़बडिय़ों को फाइल में दर्ज करते हुए टिप्पणी की थी कि यह मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंपा जाना चाहिए। गोपालकृष्णन और दो अन्य लोगों को धोखाधड़ी का दोषी माना गया और सन 2013 में उन्हें एक साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। 
 
गोपालकृष्णन कांग्रेस के वरिष्ठï नेता जीके मूपनार के बहुत करीबी थे। उनके जरिये उनकी करीबी तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव तक थी। इसलिए कैबिनेट सचिव से लेकर हर कोई उनको प्रसन्नतापूर्वक सेवा विस्तार देता था। इसके बावजूद आरबीआई के अधिकारी ने जनहित में कदम उठाया और उसे इसका परिणाम भी मिला। दूसरी ओर, ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब फंसा हुआ कर्ज एक बड़ी समस्या था। तब भारतीय स्टेट बैंक के चेयरमैन आरबीआई गवर्नर से मिलने तक में असहज महसूस करते थे और झूठे बहाने से डिप्टी गवर्नर के पास टरकाए जाते थे। आरबीआई गवर्नर के पास देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक के चेयरमैन के लिए वक्त नहीं था। इससे यह सबक मिलता है कि पटेल ने आरबीआई को लेकर जो बात कही है वह कानून और अधिनियम संबंधी प्रावधानों के लिहाज से तो उचित है लेकिन हकीकत अलग है। आरबीआई को कुछ सामान्य से सवालों का जवाब देना होगा: 
 
क्या सरकारी बैंक, आरबीआई के पर्यवेक्षण और उसकी निगरानी के दायरे से बाहर हैं?
 
क्या सरकारी बैंकों को आरबीआई के समक्ष निजी बैंकों के तर्ज पर रिटर्न और वक्तव्य नहीं पेश करने पड़ते? आरबीआई में इनको कौन पढ़ता है और इनका क्या होता है?
 
आरबीआई के निरीक्षक सरकारी बैंकों की व्यवस्थित दिक्कतों को दूर करने में क्यों नाकाम रहे?
 
वित्त मंत्रालय ने किसी बैंक चेयरमैन के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के आरबीआई के सुझाव की कब अनदेखी की? 
 
एक अपेक्षाकृत कमजोर आरबीआई ने एक के बाद एक ऐसी योजनाओं की शृंखला कैसे जारी की जिनकी मदद से बैंक अपने फंसे हुए कर्ज से निपट सकते थे और जिन्हें लेकर समय-समय पर उपयुक्त कदम भी उठाए गए। 
 
क्या सरकारी बैंकों के बोर्ड में आरबीआई के निदेशक नहीं हैं? उनकी क्या भूमिका है? क्या हर बड़े ऋण के निर्णय में उनकी भूमिका नहीं रही? 
 
क्या आरबीआई ने अधिक प्रभावी बैंकिंग पर्यवेक्षक बनने के लिए ज्यादा अधिकारों की मांग की और उस अनुरोध को ठुकरा दिया गया?
 
अपने पूर्ववर्तियों तथा अन्य डिप्टी गवर्नरों की तरह पटेल ने नीतिगत खामियों को उजागर करने के लिए एक विधि विश्वविद्यालय के भाषण की मदद क्यों ली? जबकि वे इसके लिए एक शोधयुक्त और मजबूत नीतिगत पत्र की मदद ले सकते थे जिसमें बहस और प्रतिपुष्टिï का मार्ग प्रशस्त होता?
 
इसके अलावा आरबीआई सूचना का अधिकार अधिनियम को लागू करने के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को नकार कर भ्रष्टï और अक्षम लोगों का साथ क्यों दे रहा है? सरकारी बैंकों में सूचना के अधिकार को नकार कर आरबीआई द्वारा अदालत की जो अवमानना की जा रही है उसका सबसे अधिक लाभ उन्हीं बैंकों को होगा जिनके बारे में उसका कहना है कि उसका कोई नियंत्रण ही नहीं है। 
 
यह न्याय का उपहास है। बहरहाल अगर सरकारी बैंकों की कमियों का ठीकरा आरबीआई पर फूटता है तो वित्त मंत्रालय के कर्मचारी भी कम अधिकार संपन्न नहीं हैं। हालांकि वे अपने अधिकारों का जनहित में शायद ही कभी कोई इस्तेमाल करते हों। बल्कि वे मंत्रियों और अन्य नेताओं की बात सुनने में ज्यादा रुचि रखते हैं। इसे रोकने का केवल एक तरीका है। आरोप-प्रत्यारोप की जगह जरूरी कदम उठाने की आवश्यकता है।
Keyword: bank, loan, debt, RBI,,
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