बिजनेस स्टैंडर्ड - बहुपक्षीय व्यवस्था पर जोर
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बहुपक्षीय व्यवस्था पर जोर

संपादकीय /  March 22, 2018

विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का दो दिवसीय आयोजन पिछले दिनों नई दिल्ली में समाप्त हुआ। इस आयोजन में प्रसन्न होने जैसा कुछ भी निकलकर नहीं आया। दरअसल 50 से अधिक सदस्य देशों के प्रतिनिधियों की शिरकत वाले इस आयोजन का उद्देश्य था समान मानसिकता का माहौल तैयार करना। तकरीबन सभी देशों ने अमेरिकी आयात शुल्क का संदर्भ लेते हुए यह चिंता जताई कि व्यापार को लेकर ऐसे एकतरफा कदमों से डब्ल्यूटीओ को गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। आयोजन के अंत में मीडिया को संबोधित करते हुए डब्ल्यूटीओ के महानिदेशक रॉबर्टाे अजेवेदो ने चेतावनी दी कि विभिन्न देश अगर अमेरिका के ऐसे मनमाने कदम का विरोध करते हैं तो एक किस्म की व्यापारिक जंग की शुरुआत होने की आशंका है। परंतु यह भी दुखद था कि डब्ल्यूटीओ ने खुलकर स्वीकार किया कि वह ऐसी स्थितियों से निपटने के क्रम में कुछ खास नहीं कर सकता। अजेवेदो ने कहा कि डब्ल्यूटीओ अंतरराष्टï्रीय कारोबार का शासन संभालने वाला संगठन नहीं है और इसलिए उसने कोई कदम नहीं उठाया। हालांकि वह अमेरिकी कदमों को लेकर काफी चिंतित नजर आए। यह इस बात का संकेत था कि डब्ल्यूटीओ में भी शायद बहुपक्षीय व्यापार के बचाव का बहुत अधिक माद्दा नहीं बचा है। 

 
ऐसा अकारण नहीं हो सकता है क्योंकि डब्ल्यूटीओ को लगभग हर रोज विभिन्न देशों की शिकायतों से निपटना पड़ रहा है जहां वे धमकी देते हैं कि वे भी अमेरिका के कदमों का प्रतिरोध करेंगे। उदाहरण के लिए ताजा खबरों के मुताबिक डब्ल्यूटीओ की वस्तु व्यापार परिषद जिसकी इस सप्ताह बैठक होनी है, उसके एजेंडे में 15 संभावित व्यापारिक झगड़े निपटाने का काम है। इनमें से कई अमेरिका, चीन और यूरोपीय संघ से ताल्लुक रखते हैं।  ऐसे में कहा जा सकता है कि अजेवेदो बहुत अवांछनीय स्थिति में हैं। तात्कालिक वजह जरूर अमेरिका के कदम हैं लेकिन सच तो यह है कि बहुपक्षीय व्यापारिक रुख रखना सभी सदस्य देशों का कर्तव्य है। बड़े देशों पर यह बात उतनी ही ज्यादा लागू होती है। इनमें अमेरिका भी शामिल है। अगर वे इससे बाहर रहने का फैसला करते हैं और डब्ल्यूटीओ के मानकों को मानने से इनकार करते हैं तो छोटे व्यापारिक साझेदार तो स्वत: इससे बाहर हो जाएंगे क्योंकि हर देश की अपने नागरिकों के प्रति कुछ जवाबदेही होती है। उदाहरण के लिए भारत को खाद्य सुरक्षा के लिए खाद्यान्न का भंडारण करने की आवश्यकता है। अगर बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश डब्ल्यूटीओ जैसी बहुपक्षीय संस्था को लेकर अविश्वास मत रखते हैं तो उसका अस्तित्व ही संकट में आ जाएगा। डब्ल्यूटीओ के लिए तो यह वक्त खासतौर पर बुरा है क्योंकि कई देश उसकी व्यवहारिकता पर सवाल उठा रहे हैं। दोहा दौर की वार्ता भी अंतहीन ढंग से खिंची चली जा रही है। 
 
बीते दो दशकों में डब्ल्यूटीओ कुछ खास प्रगति नहीं कर पाया है और इसके लिए कई वजह जिम्मेदार रही हैं। फिर चाहे वह मूल समझौतों की एकतरफा प्रकृति हो, अमीर और गरीब देशों का विभाजन हो या सब्सिडी, कृषि और खाद्य सुरक्षा में सब्सिडी को लेकर एक के बाद एक बैठकों में उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों का आक्रामक रुख। डब्ल्यूटीओ की विवाद निस्तारण व्यवस्था को पंगु बनाने के प्रयासों को लेकर भी चिंता जताई गई है। अमेरिका ने सर्वोच्च व्यापार विवाद निस्तारण संस्था में तीन नियुक्तियों की चयन प्रक्रिया को बार-बार बाधित किया है। विश्लेषकों ने भी चेतावनी दी है कि इस गतिरोध को अगर समाप्त नहीं किया गया तो इससे दिसंबर 2019 आते-आते अपीलीय संस्था निष्क्रिय हो सकती है। इसके बावजूद डब्ल्यूटीओ को व्यापारिक बहुपक्षीयता के लिए समर्थन जुटाना चाहिए क्योंकि सभी देशों को बाजार पहुंच और सीमा शुल्क आदि के क्षेत्र में साझा सहमति वाले अनुशासन की आवश्यकता है।
Keyword: WTO, india, summit,,
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