बिजनेस स्टैंडर्ड - नई फसल पर टिकी नजर
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नई फसल पर टिकी नजर

संजीव मुखर्जी /  03 01, 2018

कृषि

बिजनेस स्टैंडर्ड नई फसल पर टिकी नजर

साल 2008 ने तो पूरी दुनिया की तस्वीर बदल दी थी। मंदी के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था की सूरत ही नहीं बदली थी बल्कि भारतीय कृषि में भी उस दौरान कई ठोस बदलाव आए थे। भारतीय कृषि क्षेत्र वर्ष 2005-06 से वर्ष 2007-08 के दौरान 4.9 फीसदी की दर से बढ़ा था, जो पिछले कुछ वर्षों में सर्वाधिक विकास दर थी। उस दौरान खाद्य पदार्थों की कीमतों में गजब की तेजी भी आई थी, जिससे उपभोक्ताओं और किसानों के एक वर्ग पर गहरा असर हुआ। इन सबके बीच मंदी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को अपनी चपेट में ले लिया जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था और भारतीय कृषि भी प्रभावित हुई। वर्ष 2008-09 में कृषि की विकास दर में 1 फीसदी की गिरावट आई और वर्ष 2009-10 में यह 0.17 फीसदी गिर गई। जाहिर है कि वैश्विक मंदी का झटका भारतीय कृषि क्षेत्र को भी लगा था।

सूखे की मार

लेकिन आलोचकों का कहना है कि भारतीय कृषि क्षेत्र को वैश्विक मंदी के बजाय दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की चोट ज्यादा लगी थी। 2008-09 में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून में 10 फीसदी कम बारिश हुई थी और 2009 में 20 फीसदी कमी रही। इतना ही नहीं, 2009 का सूखा उससे पहले के तीन दशकों में सबसे भीषण सूखा था, जब 600 में से करीब 300 जिलों में सामान्य से कम बारिश हुई थी। बारिश के अभाव में तमाम राज्यों में फसलें बरबाद हो गईं और बड़े इलाके में बुआई ही नहीं हो पाई। वैश्विक मांग के दम पर उस समय तक तो भारतीय कृषि क्षेत्र फलफूल रहा था लेकिन मांग में गिरावट का सीधा असर उस पर दिखा और कृषि क्षेत्र का दम फूलना शुरू  हो गया। भारतीय खेती के सुनहरे दौर का खात्मा हो रहा था।

कर्ज माफी के छींटे

इन विषम परिस्थितियों में मनमोहन सिंह की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने 2009 के आम चुनावों से ऐन पहले वित्त वर्ष 2008-09 के लिए किसानों का कृषि ऋण माफ करने का ऐलान कर दिया। इस तरह केंद्र ने छोटे और सीमांत किसानों का करीब 71,000 करोड़ रुपये का कर्ज माफ कर उन्हें भारी राहत दे दी। यह योजना प्रत्यक्ष कृषि ऋण पर लागू हुई। ये अल्पावधि के उत्पादन ऋण और निवेश ऋण थे, जो सीधे किसानों को कृषि उद्देश्यों के लिए दिए गए थे।

योजना के तहत सीमांत और छोटे किसानों का ऋण पूरी तरह माफ कर दिया गया और दूसरे किसानों को एकमुश्त कर्ज चुकाने पर 25 फीसदी छूट दे दी गई। उस योजना से करीब 3.68 करोड़ किसानों को फायदा हुआ और कुल 65,318 करोड़ रुपये माफ कर दिए गए। जो राशि माफ की गई थी, वह कृषि और संबंधित क्षेत्रों के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की लगभग 8.5 फीसदी थी। कर्ज माफी का कृषि में निजी निवेश पर व्यापक असर हुआ और इसमें अचानक तेजी आ गई। जब 2007-08 में वैश्विक आर्थिक मंदी की सुगबुगाहट शुरू हुई थी तो कृषि में सरकारी निवेश 23.04 हजार करोड़ रुपये था जो 2008-09 में बढ़कर 24.5 हजार करोड़ रुपये हो गया। यह वह दौर था जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी का प्रभाव सबसे ज्यादा था। वर्ष 2008-09 में कृषि में निजी निवेश में 20 फीसदी की तेजी आई।बिजनेस स्टैंडर्ड नई फसल पर टिकी नजर

मनरेगा और भूमि अधिग्रहण

चुनावी वर्ष होने के कारण संप्रग सरकार ने मनरेगा योजना का विस्तार कर इसे देश के सभी राज्यों में लागू कर दिया और उसे दुरुस्त भी किया। वर्ष 2005 में यह योजना 200 जिलों में शुरू की गई थी लेकिन 2008 में सभी जिलों को इसमें शामिल कर लिया गया। 2005 में शुरू हुई इस योजना के तहत पहले 10 साल में 313,844.55 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जिसमें 71 फीसदी खर्च मजदूरों को हुए भुगतान पर रहा। योजना के तहत 65 फीसदी से अधिक काम कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों से संबंधित था। लेकिन मनरेगा भी विवादों से परे नहीं रही। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की वर्ष 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2009-10 से वर्ष 2011-12 के दौरान इस योजना के तहत आवंटित राशि में से बिहार, महाराषट्र और उत्तर प्रदेश के लिए  केवल 20 फीसदी राशि ही जारी की गई जबकि इन राज्यों में देश की करीब 46 ग्रामीण आबादी बसती है।

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के अध्यक्ष अशोक गुलाटी ने एक अध्ययन में बताया कि 2006-07 के बाद कृषि मजदूरी में सालाना करीब 6.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, लेकिन कुल जीडीपी, कृषि जीडीपी और विनिर्माण जीडीपी का प्रभाव मनरेगा से करीब 4 से 6 फीसदी अधिक रहा। मनरेगा के खर्च में वर्ष 2010-11 और वर्ष 2013-14 के दौरान उतार-चढ़ाव आया, जबकि ग्रामीण मजदूरी में नियमित गिरावट आई और यह वर्ष 2010-11 में 20.61 फीसदी से घटकर वर्ष 2013-14 में 10.12 फीसदी रह गई।

अलबत्ता मनरेगा की उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता है। एनसीएईआर द्वारा 2015 के कराए गए एक अध्ययन के मुताबिक मनरेगा के कारण 2004-05 से 2011-12 के दौरान गरीबी में उल्लेखनीय कमी आई। वर्ष 2014 में राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के कार्यभार संभालने के बाद इस पर खतरे के बादल मंडराने लगे। लेकिन 2014 और 2015 के सूखे ने तस्वीर बदल दी और केंद्र सरकार ने इसे जारी रखते हुए 2017-18 में इसका बजट 54,000 करोड़ रुपये कर दिया। इस योजना के तहत यह सर्वाधिक राशि थी।  साथ ही योजना में भी कुछ बुनियादी बदलाव भी किए गए। मजदूरी के समय पर भुगतान और निर्माण की गुणवत्ता पर भी जोर दिया गया।

वर्ष 2008 और 2009 के बाद औद्योगीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए जमीन की कमी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरी। पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम और सिंगुर में भूमि विवाद के अलावा हरियाणा और दूसरे स्थानों पर हुए किसान आंदोलनों के कारण देश में अलग भूमि अधिग्रहण कानून की जरूरत महसूस हुई। संप्रग सरकार ने 2014 के आम चुनावों से पहले भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 पारित कर दिया। इस कानून के तहत किसानों को तय मूल्य की गारंटी दी गई थी जो बाजार मूल्य से अधिक था और कुछ मामलों में तो सर्किल रेट से करीब 4 गुना ज्यादा था।

इस कानून ने ग्रामीण इलाकों में किसानों को सशक्त बनाया, लेकिन कई राज्यों और कंपनियों का कहना था कि इसके कारण देश में विकास गतिविधियां रुक गई हैं और इससे भूमि अधिग्रहण बुरी तरह प्रभावित हुआ है। राजग सरकार ने सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्रियों की सलाह पर इस कानून के कुछ सख्त प्रावधानों में संशोधन का फैसला किया। केंद्र सरकार ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के लिए दिसंबर 2014 में एक अध्यादेश जारी किया और कुछ क्षेत्रों में सामाजिक प्रभाव आकलन तथा सहमति के प्रावधानों में संशोधन का प्रस्ताव रखा। हालांकि बाद में सरकार ने सभी 13 क्षेत्रों को भूमि कानून का फायदा देने का फैसला किया। पहले विकास कार्यों में तेजी लाने के लिए इन क्षेत्रों को छूट देने फैसला किया था।

विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने इन संशोधनों का विरोध किया और आरोप लगाया कि राजग सरकार किसानों से भूमि छीनने के लिए प्रावधानों में संशोधन की कोशिश कर रही है। आखिरकार भाजपा की अगुआई वाली सरकार ने प्रस्तावित बदलावों को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला किया और 13 केंद्रीय कानूनों को भूमि अधिग्रहण कानून के दायरे में लाने का फैसला किया ताकि खरीदारों को समान लाभ मिल सकें।

गांवों पर चौतरफा मार

ग्रामीण भारत का हौसला यूं ही नहीं गिरा है। प्रमुख कृषि उत्पादों की कीमतों में तेज गिरावट, गेहूं और धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में मामूली बढ़ोतरी, 2015 में रबी की खड़ी फसलों को भारी नुकसान और उसके बाद खरीफ के उत्पादन में कमी ने ग्रामीण भारत के कुछ इलाकों में नकारात्मक धारणा बनाने में योगदान दिया। भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधनों ने भी इस धारणा को बनाने में अपनी भूमिका अदा की। हालांकि अनाज, दाल, मांस, दूध और प्रोटीन सहित सभी कृषि जिंसों का उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहा था लेकिन किसानों को उनकी लागत नहीं मिल पा रही थी। नोटबंदी और जीएसटी का भी कृषि पर प्रभाव पड़ा और इससे मांग सबसे ज्यादा प्रभावित हुई। फसल बरबाद होने के कारण किसानों के आत्महत्या करने के मामलों में तेजी आई, जिस पर विपक्ष को भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने का मौका मिल गया।

संप्रग सरकार के अंतिम वर्षों और राजग सरकार के शुरुआती वर्षों पर नजर डालें तो पता चलता है कि इस दौरान काम प्रगति पर ही रहा। वर्ष 2012-13 तक संप्रग सरकार ने गेहूं और धान के एमएसपी में भारी बढ़ोतरी की। लेकिन इसके बाद गेहूं और धान के एमएसपी में करीब ठहराव आ गया लेकिन तिलहन और दलहन की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। इशारा साफ था कि किसान गेहूं और धान के बजाय दलहन और तिलहन की खेती करें। इससे लंबी अवधि में देश की विदेशी मुद्रा बचेगी क्योंकि भारत तिलहन और दलहन का सबसे बड़ा आयातक है।

सरकार बदली हालत नहीं

मोदी सरकार ने फसल नष्ट होने पर किसानों का मुआवजा 50 फीसदी से अधिक बढ़ाया और मुआवजे के लिए पात्रता की शर्तों को भी नरम किया। इससे लाखों किसानों को प्रत्यक्ष लाभ होने की उम्मीद है। साथ ही सरकार ने सभी खेतों को पानी पहुंचाने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है, किसानों के लिए नई फसल बीमा योजना पर काम चल रहा है और किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड देने की योजना चरणबद्घ तरीके से आगे बढ़ रही है। साथ ही उसने देश की सभी मंडियों को इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म से जोडऩे के लिए एक कार्यक्रम शुरू किया है।

अलबत्ता इनमें से कई उपाय कृषि के लिए दीर्घावधि समाधान हैं। पिछले कुछ सालों से जमीनी स्तर पर स्थिति बद से बदतर हो रही है क्योंकि कृषि उत्पादों की कीमतों में सुधार के कोई संकेत नहीं दिखाई दे रहे हैं। साथ ही साथ 2014 और 2015 के सूखों ने किसानों की कमर तोड़ दी है जिससे कृषि संकट बढ़ा है। मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों पर गोलीबारी ताबूत में आखिरी कील साबित हुई। इसमें 6 किसान मारे गए। गुजरात विधानसभा चुनावों में भाजपा का खासकर ग्रामीण इलाकों में खराब प्रदर्शन राजग सरकार के लिए खतरे की घंटी थी।

बेहतर कीमत की जुगत

इससे जागी केंद्र सरकार अब किसानों के हितों के संरक्षण के लिए शुल्क नीति को और सख्त बनाने, तिलहन और दलहन जैसी नकदी फसलों की खरीद बढ़ाने और कृषि उत्पादों की मांग बढ़ाने के लिए वितरण के ज्यादा तरीके शुरू करने पर विचार कर रही है। इसके लिए खाद्य कानून के तहत ज्वार-बाजरा का वितरण और मार्केटिंग के बुनियादी ढांचे के विकास पर ज्यादा निवेश की योजना शामिल है। हालांकि केंद्र सरकार किस हद तक कीमतों को बढ़ा सकती है इसकी एक सीमा है लेकिन वह इसके लिए सभी विकल्पों को तलाशने में कोई कोताही नहीं बरतेगी। पिछले कुछ महीनों में तिलहन और दलहन की गिरती कीमतों को थामने के लिए केंद्र सरकार ने कच्चे खाद्य तेलों के आयात पर शुल्क दोगुना कर दिया है और प्रसंस्कृत किस्मों के लिए इसमें उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है। साथ ही दलहनों के आयात पर शुल्क बढ़ाया गया है और करीब एक दशक बाद सभी तरह की दलहनों के निर्यात की अनुमति दी गई है। इसी तरह गेहूं पर आयात शुल्क बढ़ाया गया है और साथ ही अन्य कृषि उत्पादों का निर्यात शुरू किया गया है।

किसान जुड़ें बाजार से

बिजनेस स्टैंडर्ड नई फसल पर टिकी नजरसरकार किसानों को अपने उत्पादों की मार्केटिंग के ज्यादा अवसर देने के लिए कदम उठाना चाहती है। इनमें अनुबंध कानून में संशोधन और एक नई योजना मार्केट एश्योरेंस स्कीम (एमएएस) शामिल है। इस योजना के जरिये राज्यों को किसी भी कृषि उत्पाद की कीमत, खरीद, भंडारण और वितरण की आजादी मिल जाएगी। केंद्र सरकार साथ ही मध्य प्रदेश और हरियाणा द्वारा शुरू की गई भावांतर योजनाओं में भी भागीदारी सुनिश्चित करने पर काम कर रही है। एमएएस के तहत केंद्र किसी फसल के एमएसपी पर 40 फीसदी नुकसान वहन कर सकता है।

यह योजना गेहूं और धान सहित उन सभी फसलों पर लागू होगी जिनका एमएसपी केंद्र तय करता है। राज्यों की खरीद पर कोई सीमा नहीं होगी। प्याज, टमाटर और आलू जैसी खराब होने वाली सब्जियों को फिलहाल इस कार्यक्रम के दायरे में नहीं रखा गया है। राज्यों को फसलों की खरीद, भंडारण और बिक्री में होने वाले नुकसान की भरपाई केंद्र वहन करेगा। उदाहरण के लिए चने की एमएसपी 2017-18 रबी फसल के लिए प्रति क्विंटल 4,400 रुपये तय की गई है। अगर राज्य को इसकी खरीद, भंडारण और वितरण में नुकसान होता है तो केंद्र प्रति क्विंटल के हिसाब से 1,760 रुपये मुआवजा देगा। बाकी खर्च राज्य सरकार को वहन करना होगा। इस योजना का एक बड़ा फायदा यह है कि इससे राज्यों को कृषि बाजारों में ज्यादा अधिकार मिलेंगे और वे केंद्र सरकार से औपचारिक मंजूरी मिलने का इंतजार किए बगैर सीधे किसानों से खरीद कर सकेंगे।

डेढ़ गुना एमएसपी

इसी का खयाल करते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस साल आम बजट पेश करते हुए किसानों को लागत से 50 फीसदी अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दिलाने का मोदी सरकार का वायदा एक बार फिर दोहराया। साथ ही उन्होंने फसल की खरीद सुनिश्चित करने की प्रक्रिया ईजाद करने का वायदा भी किया। जेटली ने जलीय जीवों के पालन तथा पशुपालन के लिए लगभग 10,000 करोड़ रुपये का समर्पित कोष अलग से बनाने की घोषणा भी।

कृषक उत्पाद कंपनियों के लिए भी बजट बहुत अच्छा रहा क्योंकि 100 करोड़ रुपये से अधिक के मुनाफे पर कर में पांच साल के लिए 100 फीसदी छूट का ऐलान किया गया। छूट अगले वित्त वर्ष से ही शुरू हो जाएगी। इसके अलावा जैविक खेती को बढ़ावा देने तथा 22,000 ग्रामीण हाटों को ग्रामीण एग्रीकल्चर मार्केट (ग्राम) में तब्दील करने में भी इन कंपनियों की मदद ली जाएगी। इसके लिए 2,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। आलू, प्याज और टमाटर उत्पादकों को इन कंपनियों के जरिये ढुलाई, भंडारण तथा परिवहन की सुविधा मुहैया कराने के लिए 'ऑपरेशन ग्रीन्स' नाम का विशेष कार्यक्रम भी शुरू किया गया है, जिसके लिए 500 करोड़ रुपये मुहैया कराए गए हैं। इन सब उपायों से ग्रामीण जनता के बीच मोदी सरकार की छवि कितनी चमकेगी और यह अगले आम चुनावों में अहम मुद्दा बनेगा या नहीं, यह देखना अभी बाकी है। लेकिन अगर स्थिति को संभालने के लिए कुछ कड़े उपाय नहीं किए गए और अगर गुजरात चुनावों से कोई संकेत मिलता है तो ग्रामीण इलाकों में राजग की जमीन खिसक सकती है।

खेती की लगी बीमारी

नकदी फसलों सहित अधिकतर खरीफ फसलों की कीमतें सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से भी नीचे गिर गई हैं।
लगातार दो साल 2014 और 2015 में आए सूखे ने ग्रामीण संकट और बढ़ा दिया।
राजग सरकार के पहले तीन वर्ष में भारतीय कृषि क्षेत्र की रफ्तार संप्रग सरकार के अंतिम 3 वर्षों की तुलना में सुस्त रही।
सरकार की आयात और निर्यात नीति का मकसद मुख्यत: महंगाई कम रखने के लिए उपभोक्ताओं का संरक्षण करना है।
इससे किसानों पर बुरा असर पड़ा है और जबरदस्त उत्पादन होने के बावजूद भारत को करीब 50 लाख टन दलहन का आयात करना पड़ा।
कृषि जिंसों की सरकारी खरीद कुछ फसलों तक ही सीमित है।
कृषि बाजार का अभी तक पूरी तरह एकीकरण नहीं हो पाया है और ई-नाम जैसी योजनाओं पर अभी काम चल रहा है।

किसानों के संरक्षण के लिए सरकार अब आयात और निर्यात शुल्कों में तेजी से बदलाव पर विचार कर रही है।
मध्याह्न भोजन योजना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत ज्वार-बाजरा और मोटे अनाज के वितरण से कृषि उपजों के लिए अतिरिक्त मांग पैदा करना।
इससे वैश्विक बाजार में मांग कम होने और निर्यात सुस्त होने के कारण इकट्ठा अतिरिक्त अनाज भी खप जाएगा।
राष्ट्रीय स्तर पर किसानों की कर्ज माफी से इनकार क्योंकि यह सरकार की घोषित नीति के खिलाफ है।
स्थानीय बाजार बनाने के लिए ज्यादा निवेश और एमएसपी में ज्यादा बढ़ोतरी।
मध्य प्रदेश की भावांतर योजना पर नजर ताकि उसका दायरा बढ़ाया जा सके। साथ ही बाजार आश्वासन योजना की शुरुआत।

बिजनेस स्टैंडर्ड नई फसल पर टिकी नजर
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