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तनातनी कहें या ग्लासनोस्त? सरकारी पहल से होगा तय

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  March 20, 2018

बैंकिंग नियमन को स्वामित्व के लिहाज से तटस्थ बनाए जाने की जरूरत पर बल देने वाले भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर ऊर्जित पटेल के बयान को रिजर्व बैंक और केंद्रीय वित्त मंत्रालय के बीच तनातनी मानना इसका सरलीकरण ही कहा जाएगा। पटेल ने पिछले हफ्ते जो कुछ कहा है उसकी अहमियत तनातनी से कहीं अधिक है। यह सच है कि पटेल का यह बयान केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के उस बयान के बाद आया है जिसमें जेटली ने बैंक नियामक को ही पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) में हुए 129 अरब रुपये के गारंटी पत्र (एलओयू) घोटाले के लिए जिम्मेदार ठहराया था। जेटली ने यह भी कहा था कि रिजर्व बैंक को बैंकों की समुचित निगरानी के लिए एक तीसरी आंख रखने की जरूरत है।

 
दोनों पक्षों से आए बयानों के बावजूद इसे तनातनी मानना ठीक नहीं होगा। इसके बजाय यह मोदी सरकार के तहत वित्तीय क्षेत्र में घटित हो रहे एक तरह के ग्लासनोस्त (सुधार) का परिचायक है। आम तौर पर तनातनी का नतीजा गतिरोध के रूप में सामने आता है जिसमें अमूमन राजनीतिक नेतृत्व ही विजेता बनकर उभरता है। लेकिन ग्लासनोस्त प्रक्रिया में नतीजा अलग होता है और सुधारों का एजेंडा रफ्तार पकड़ सकता है। आने वाले महीनों में वित्त मंत्रालय और आरबीआई में होने वाले बदलावों की प्रकृति ही यह बताएगी कि यह महज तनातनी है या फिर ग्लासनोस्त।
 
फिलहाल यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि यह कोई तनातनी नहीं है। भारत में केंद्रीय बैंक के गवर्नर शायद ही कोई ऐसा सार्वजनिक बयान देते हैं जो उन्हें सरकार या वित्त मंत्री के सामने खड़ा कर दे। आखिरकार रिजर्व बैंक गवर्नर की नियुक्ति केंद्र सरकार ही करती है और उसकी स्वायत्तता या स्वतंत्र हैसियत काफी हद तक इस बात से तय होती है कि वह सरकार की इच्छा होने तक ही अपने पद पर बना रह सकता है। अगर रिजर्व बैंक गवर्नर की सोच  सरकार से अलग है तो वह आम तौर पर उसे सार्वजनिक नहीं करता है और अपने मतभेदों के बारे में वित्त मंत्री या प्रधानमंत्री से मिलकर निजी तौर पर चर्चा करता है।
 
लिहाजा यह मुमकिन है कि रिजर्व बैंक गवर्नर का गांधीनगर में दिया गया यह भाषण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के नियमन से संबंधित  सुधारों को आगे बढ़ाने की कोशिश है। वित्त मंत्री का बैंक नियामक की भूमिका के बारे में स्पष्टवादी आकलन और रिजर्व बैंक गवर्नर का बैंक नियमन को स्वामित्व-तटस्थ बनाने के लिए जरूरी बदलाव करने की अहमियत पर बल देना असल में बैंक सुधारों पर अधिक चर्चा का माहौल बनाने की कवायद हो सकती है। इसके पीछे यह सोच होगी कि बैंकों के स्वामित्व में बदलाव की पहल का राजनीतिक प्रतिरोध पूरी तरह नगण्य नहीं तो कम हो सकता है।
 
फरवरी के मध्य में पीएनबी का एलओयू घोटाला उजागर होने के तत्काल बाद नियामक के सुशासन सुनिश्चित करने और विवेकपूर्ण कारोबारी तरीके अपनाने में नाकाम रहने की बातें कही जाने लगी थीं। लेकिन जल्द ही यह चर्चा सार्वजनिक बैंकों का स्वामित्व ढांचा बदलने की जरूरत पर केंद्रित हो गई। भारत में बैंकिंग प्रणाली का करीब 70 फीसदी हिस्सा सार्वजनिक बैंकों के ही पास है। वित्त मंत्री ने अपनी शुरुआती टिप्पणियों में सार्वजनिक बैंकों के निजीकरण की संभावना से इनकार नहीं किया था लेकिन यह भी कहा था कि अभी सियासी माहौल स्वामित्व ढांचे में ऐसे बदलाव के अनुकूल नहीं है।
 
तमाम विशेषज्ञ एवं बैंकर बैंकों के निजीकरण से जुड़े अच्छे-बुरे पहलुओं पर चर्चा करते रहे लेकिन रिजर्व बैंक गवर्नर ने इस पर कुछ नहीं कहा था। इस तरह बैंक स्वामित्व पर पिछले हफ्ते आया बयान इस बारे में उनकी पहली प्रतिक्रिया है। उन्होंने निजीकरण पर बात नहीं की। वह बैंकों को कारोबारी नियमों के मुताबिक चलाने की प्रतिबद्धता जताने के साथ ही एक कदम आगे भी बढ़ गए और बैंक नियमन को स्वामित्व से तटस्थ करने के लिए कानूनी सुधार करने की वकालत की। आखिर इस बयान का मतलब क्या है?
 
गवर्नर ने बैंकिंग नियमन अधिनियम में संशोधनों का जिक्र करते हुए कहा कि सार्वजनिक बैंकों का नियमन सात बिंदुओं में अन्य बैंकों के नियमन से अलग होता है। रिजर्व बैंक सार्वजनिक बैंकों के बोर्ड के फैसलों को पलट नहीं सकता है। रिजर्व बैंक सार्वजनिक बैंकों के चेयरमैन और प्रबंध निदेशकों को न तो हटा सकता है और न ही इन बैंकों के विलय पर फैसला कर सकता है। बैंकिंग गतिविधियों के लिए रिजर्व बैंक से लाइसेंस लेने की जरूरत नहीं होने से सार्वजनिक बैंकों के लाइसेंस को निरस्त भी नहीं कर सकता है। रिजर्व बैंक सार्वजनिक बैंकों में तरलता बढ़ाने का भी फैसला नहीं कर सकता है। 
 
ऐसे में रिजर्व बैंक के गवर्नर किस तरह के बदलाव के पक्ष में हैं? निजी बैंकों की तुलना में सार्वजनिक बैंकों की बाजार अनुशासन प्रणाली को कमजोर बताते हुए पटेल ने बैंकिंग नियमन अधिनियम में समुचित परिवर्तन करने का सुझाव दिया है। इस तरह सार्वजनिक बैंकों के नियमन में भी इन सात बिंदुओं  में बदलाव कर रिजर्व बैंक को निजी बैंकों के नियमन जैसी शक्तियां दे दी जाएं। गवर्नर ने बैंकिंग नियमन अधिनियम में बदलाव को 'सभी विकल्पों में सबसे सुगम' बताया है।
 
सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण करना बेहद महत्त्वाकांक्षी कदम हो सकता है और अगले आम चुनाव में 14 महीने का समय बाकी रह जाने से ऐसा करना मोदी सरकार के लिए राजनीतिक तौर पर भी जोखिम वाला काम हो सकता है। गवर्नर ने सार्वजनिक बैंकों के नियमन में सुधार के लिए ऐसी जमीन तैयार की है जो राजनीतिक रूप से कम जोखिम वाली और लागू करने में भी अपेक्षाकृत सरल है। यह तभी पता चल पाएगा जब आने वाले महीनों में सरकार इस दिशा में अपने कदम आगे बढ़ाती है। उस समय तक सरकार और रिजर्व बैंक के बीच तनातनी की अटकलों पर लगाम लगाई जा सकती है।
Keyword: bank, loan, debt,,
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