बिजनेस स्टैंडर्ड - समस्या का सबब बनरहा है इंटरनेट?
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समस्या का सबब बनरहा है इंटरनेट?

अजित बालकृष्णन /  March 20, 2018

दुनिया भर में डिजिटल साम्राज्यवाद के खिलाफ तमाम आवाज उठ रही हैं। इससे निकलने की क्या राह हो सकती है। इस संबंध में  विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजित बालकृष्णन 

 
पिछले दिनों जब मैंने सम्मानित और प्रतिष्ठिïत ब्रिटिश समाचार पत्र द टेलीग्राफ में यह खबर पढ़ी कि जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल और फ्रांस के राष्ट्रपति एमेनुएल मैक्रां डिजिटल साम्राज्यवाद के खिलाफ चेतावनी जारी कर रहे हैं तो मुझे सहसा यकीन नहीं हुआ। यह खबर कुछ सप्ताह पहले दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच से आई थी। वहां दोनों नेताओं ने यूरोप के शेष देशों को यह चेतावनी दी थी कि वे डिजिटल साम्राज्यवाद के खिलाफ संयुक्त बचाव की तैयारी करें। चेतावनी यह थी कि अमेरिकी कारोबारी दिग्गजों और चीन के बीच सूचना क्रांति को लेकर जो जंग छिड़ी थी उसमें यूरोपीय संघ के हित कहीं बहुत पीछे छूट सकते थे?
 
इस खबर को पढऩे के बाद मुझे अपने आप को यह यकीन दिलाने में काफी वक्त लगा कि यह सपना या मेरे मन की कल्पना नहीं बल्कि हकीकत थी। फ्रांस जो कुछ अरसा पहले तक दुनिया के सबसे बड़े उपनिवेशवादी देशों में से एक था, वह दूसरों को नई तरह के उपनिवेशवाद के खिलाफ चेतावनी दे रहा था। वहीं जर्मनी, जिसने 20वीं सदी का शुरुआती हिस्सा दो विश्वयुद्घों में बिताया वह दुनिया को साम्राज्यवाद के खिलाफ चेतावनी दे रहा था? 
 
यह बयान उस वक्त सामने आया है जब यूरोपीय आयोग ने गूगल पर 2.7 अरब डॉलर का जुर्माना लगाया है। यह जुर्माना गूगल शॉपिंग सर्च के दौरान किए गए मानक उल्लंघन से संबंधित है। यूरोपीय संघ के अनुसार गूगल ने निहायत व्यवस्थित ढंग से अपनी तुलनात्मक शॉपिंग सेवा को प्रमुखता प्रदान की जबकि प्रतिद्वंद्वी शॉपिंग सेवाओं को उसने अपने खोज परिणामों में सही ढंग से नहीं दिखाया है। इसके चलते प्रतिद्वंद्वी तुलनात्मक शॉपिंग सेवाएं औसतन गूगल के खोज नतीजों में चौथे पन्ने पर नजर आतीं। 
 
अन्य कंपनियां तो और भी नीचे नजर आती हैं। इस बीच एक अन्य चौंकाने वाली घटना सामने आई है। इंटरनेट को पैदा करने और दुनिया भर में उसे प्रसारित करने वाले देश अमेरिका में कम से कम आधा मुल्क इस बात पर यकीन करता है कि पिछले राष्ट्रपति चुनाव जिसमें डॉनल्ड ट्रंप जीते, उसमें रूस ने इंटरनेट की मदद से प्रभावशाली हस्तक्षेप किया। यह हस्तक्षेप डॉनल्ड ट्रंप के पक्ष में किया गया था, वरना हिलेरी क्लिंटन आज अमेरिकी राष्ट्रपति होतीं। 
 
उधर एक बुरी खबर यह भी है कि श्रीलंका में बौद्घ और मुस्लिम एक दूसरे के खिलाफ जंग छेड़े हुए हैं। देश में चरमपंथी ङ्क्षहसा को काबू करने के लिए सरकारी अधिकारियों ने कुछ सोशल नेटवर्क वेबसाइटों को बंद करने के आदेश दिए हैं। इस आदेश से फेसबुक, इंस्टाग्राम, वाइबर और व्हाट्सऐप जैसी सोशल साइटें खासतौर पर प्रभावित हुई हैं।  यह जानकारी देने वाली वेबसाइट एंगैजेट का यह भी कहना है कि अतीत में तुर्की ने भी यही काम किया था। उसने भी ट्वीट्स पर सेंसरशिप लागू की थी और सोशल मीडिया को समाज के लिए खराब बताते हुए इसकी जमकर आलोचना की थी। पिछले साल के अंत में कॉन्गो ने भी विरोध प्रदर्शन पर रोक लगाने के लिए इंटरनेट और एसएमएस की सेवाओं पर रोक लगाई थी। उस घटना के बमुश्किल एक दिन बाद ही ईरान के अधिकारियों ने इंस्टाग्राम और टेलीग्राम जैसी सोशल मीडिया सेवाओं पर रोक लगा दी थी। 
 
मैं आंखे मल-मल कर इन बातों का तात्पर्य समझने का प्रयास कर रहा था। क्या इन जगहों पर वाक स्वतंत्रता को दबाया जा रहा था जैसा कि एंगैजेट की ओर से अटकल लगाई जा रही थी, या फिर यह दुनिया के अलग-अलग देशों में यह विरोध प्रदर्शन समाज का अत्यधिक पश्चिमीकृत छोटा सा तबका कर रहा था। या फिर क्या संचार के कुछ चैनलों की मौजूदगी के चलते समाज के कुछ तबकों का विरोध प्रदर्शन बाकी की तुलना में कहीं अधिक मुखर और तेज हो जाता है। 
 
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग भी भारत मैट्रीमोनी द्वारा लगातार एक दशक से किए जा रहे प्रयासों के बाद जागा और उसने कहा कि गूगल ने अपनी रसूखदार स्थिति का दुरुपयोग किया और उसने गूगल पर जुर्माना लगाया। यह जुर्माना वर्ष 2015 तक के तीन वर्ष तक गूगल के औसत भारतीय राजस्व का 5 फीसदी तय किया गया। यह राशि करीब 1.35 अरब रुपये ठहरती है। यह राशि 60 दिन के भीतर जमा करनी है। प्रतिस्पर्धा आयोग ने कहा कि कंपनी को खोज के मामले में पूर्वग्रह से ग्रस्त होकर काम करते पाया गया और ऐसा करके वह अपने प्रतिस्पर्धियों और उपयोगकर्ताओं दोनों को ही नुकसान पहुंचाने का काम कर रही थी। टिम बर्नर्स ली जिन्होंने वल्र्ड वाइड वेब (डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू) का आविष्कार किया उन्होंने इन तमाम गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए गत सप्ताह ब्रिटेन के समाचार पत्र द गार्जियन में लिखा, 'वेब का इस्तेमाल हथियार के रूप में किया जा सकता है और इस पर रोक लगाने के लिए हम बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों पर निर्भर नहीं रह सकते। चुनिंदा कंपनियों का विचारों के साझा होने की प्रक्रिया पर नियंत्रण करना बहुत खतरनाक है। ऐसे में एक नियामक की जरूरत पड़ सकती है। ये दबदबे वाले मंच प्रतिस्पर्धियों के लिए मुश्किल खड़ी करके अपनी स्थिति को मजबूत बनाने में सक्षम हैं। वे स्टार्टअप के रूप में चुनौती देने वाले उपक्रमों को खरीद लेते हैं, नवाचारों पर वे नियंत्रण कर लेते हैं और उद्योग जगत की शीर्ष प्रतिभाओं को भी वे अपने यहां नियुक्त कर लेते हैं। अगर इसमें उनके यूजर डेटा के कारण उनको मिलने वाली बढ़त को शामिल कर दिया जाए तो यही आशा करनी चाहिए कि आने वाले 20 साल पिछले 20 सालों की तुलना में कम नवाचार वाले होंगे।'
 
वह कहते हैं, 'आज मैं हम सभी को चुनौती देना चाहता हूं कि हम वेब को लेकर कहीं अधिक महती आकांक्षाएं पालें। मैं चाहता हूं कि वेब हमारी आकांक्षाओं को परिलक्षित करे और हमारे सपनों को पूरा करें, बजाय कि हमारे भय को बढ़ाने और हमारे बीच के भेद को गहरा करने के। अब जरूरत इस बात की है कि हम कारोबारी, प्रौद्योगिकी, सरकार, नागरिक समाज, कला और अकादमिक जगत के श्रेष्ठï मस्तिष्क को अपने साथ जोड़ें और वेब के भविष्य से उपजी चुनौतियों का सामना करें। वेब फाउंडेशन में हम सभी इस मिशन में अपनी-अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं ताकि ऐसा वेब बना सकें जैसा हम चाहते हैं। इसे संभव बनाने के लिए हमें मिलकर काम करना चाहिए।'
Keyword: digital, war, France,,
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